Saturday, January 3, 2015


क्या आप सामजिक ज्ञान रटाते हैं?
भारत की अधिकाँश स्कूलों में नागरिक शाश्त्र व् सामजिक ज्ञान को वैसे नहीं सिखाया जाता है जैसे सिखाया जाना चाहिए. कैसे सिखाया जाना चाहिए? मैं शुरुआत करता हूँ बाल  संसद से. तिलोनिया (राजस्थान में अलवर में स्थित) में बेयरफुट कॉलेज से जुड़ी रात्रि कालीन स्कूलों में विद्यार्थियों की संसद चलती है. विद्यार्थी अपने प्राइम मिनिस्टर व् अन्य प्रतिनिधि चुनते हैं. लड़कियों के लिए आरक्षण है. विद्यार्थी बाकायदा चुनाव की तयारी करते हैं, चुनाव होता है और फिर बाकायदा संसद की गतिविधियाँ होती है. विद्यार्थी निर्णय  लेने  की प्रक्रिया सीखते  हैं और प्रजातंत्र क्या होता है यह समझते हैं. इस  प्रक्रिया से गुजरने वाले विद्यार्थी बाद में अपने जीवन में प्रजातंत्र को ज्यादा अच्छी तरह से समझ पाते हैं. विद्यार्थी समूह में निर्णय लेना, सबके भले के लिए अपने हित कुर्बान करना और सबके हितों के लिए आवाज उठाना सीखते हैं. विद्यार्थी सच्चाई और न्याय के निर्णय लेना सीखते हैं. अगर किसी अध्यापक से कोई गलती हो जाती है तो विद्यार्थियों की संसद उस पर तुरंत निर्णय लेती है. विद्यार्थी एक दूसरे को समझते हैं और जिम्म्मेदार नागरिक का फर्ज समझते हैं. यही सामाजिग ज्ञान की सच्ची पाठशाला  है. बीकानेर में विद्या कुञ्ज नामक स्कुल में गरीब परिवारों के विद्यार्थी पढ़ने आते हैं लेकिन वे विद्यार्थी प्रजातान्त्रिक व्यवस्थाओं के कारण इतने परिपक्व हो जाते हैं की वे अपने सभी निर्णय स्वयं लेते हैं. स्कुल के सभी आयोजन विद्यार्थी आयोजित करते हैं. जब १५ अगस्त या २६ जनवरी के आयोजन होते हैं तो विद्यार्थियों का आयोजन देखते ही बनता है. कोई भी विद्यार्थी देर से नहीं आता. हर विद्यार्थी खुद अनुशाशन के लिए जिम्मेदार होता है. आप स्कुल में कचरा फेंक कर देखिये - तुरंत कोई विद्यार्थी आएगा और उस कचरे को उठा कर कचरा पात्र में दाल देगा. विद्या कुञ्ज का दूँन स्कुल की तरह नाम या फीस भले ही न हो परन्तु जिस प्रकार से यह स्कुल विद्यार्थियों को सामजिक ज्ञान सिखाती है वह काबिले तारीफ़ है.
 बात करते हैं अलग अलग सामजिक व्यवस्थाओं की. जब राज तंत्र था तब राजा लोग अपने उत्तराधिकारी को वर्षों तक प्रशिक्षण दिलाया करते थे. उनका मकसद यह रहता था की उनके बाद उनका उत्तराधिकारी श्रेष्ठ शाशन करे. राजतंत्र की सफलता इस बात पर होती थी की राजा प्रशासन में कितने दक्ष हैं और राजा प्रशासन को गुरुकुल में जाकर वर्षों तक सीख कर आता था. आज प्रजातंत्र है यानी प्रजा को ही शासन चलना है लेकिन क्या प्रजा इस हेतु प्रशिक्षण ले रही है? प्रशिक्षण का कार्य करवाने की जिम्मेदारी है विद्यालयों और महाविद्यालयों की. क्या वे यह कार्य कर पा रहें हैं? शक्ति को हासिल करने हेतु हर व्यक्ति उतावला है. प्रजातान्त्रिक  व्यवस्था में शक्ति कैसे हासिल की जाए यह भी विद्यार्थी को सीखना चाहिए. शक्ति और सत्ता की लड़ाई  और इसका समाज के विकास हेतु उपयोग ही हमारे जीवन की वास्तविकता है. जातिगत और संकीर्ण दायरों से उठना आसान नहीं हैं. लेकिन पाठशाला तो वही है जहाँ विद्यार्थी इन सब से ऊपर उठ कर सच्चे अर्थों में प्रजातंत्र और देश के निर्माण की तयारी में जुट सकता है. संकीर्ण हितों के चलते आदमी ने आदमी को मारा है और पाठशाला के ज्ञान से  आदमी को आदमी ने ऊपर उठाना सीखा है. रवांडा नामक एक देश में १९९४ में १० लाख लोगों की हत्या कर दी गई थी - यह सब संकीर्ण सोच  और सत्ता संघर्ष का नतीजा था. आज उसी देश में ज्ञान की पाठशाला के कारण लोग हिल मिल कर विकास की बात सोच रहें हैं.  
एक महाविद्यालय के प्राचार्य ने चुनाव व्यवस्था और छात्र राजनीति को व्यवस्थित करने की बात सोची लेकिन उसको सबसे यही जवाब मिला की यह सर्फ गुंडा गर्दी की व्यवस्था है इस में कोईहस्तक्षेप नहीं करना है. जो कार्य बुनकर रॉय और उनके साथी तिलोनिया में कर सकते हैं उसको करने के लिए एक विश्वास और इच्छा शक्ति चाहिए. अगर हम यह नहीं कर सकते हैं तो फिर आने वाले वर्षों में हमें नेतृत्व का अकाल झेलना पड़ेगा और गुंडा गर्दी और अराजकता को सहन करना पड़ेगा. हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी यही है की हम हमारे स्कुल और कॉलेज में प्रजातान्त्रिक व्यवस्थाओं और सामाजिक चेतना को सिखाएं न की रटायें .
आजादी से भी ज्यादा जरुरी है आजादी को इस्तेमाल करने की कला और उस  हेतु प्रशिक्षण. आजादी से भी ज्यादा जरुरी है की हम आजादी को सृजनशीलता में प्रयोग में लाएं. एक कला सीखने के लिए एक मंच चाहिए. गूगल कंपनी में हर कर्मचारी को यह छूट होती है की वह अपने २०% समय को ऐसे कार्य में लगाए जो उसका मनपसंद हो. गूगल कम्पनी के अधिकांश आविष्कार इन्ही २०% कार्य-घंटों से आते हैं. कर्मचारी खुश और संगठन को अत्यधिक मुनाफा. गिजुभाई बधेका ने अपनी स्कुल में विद्यार्थियों को यह छूट दे रखी थी की वे वो विषय पढ़ें जो वे पढ़ना चाहते हैं. हर स्कुल और कॉलेज को विद्यार्थियों को यह मंच देना चाहिए. जिस दिन विद्यार्थी अपनी मर्जी से किसी सृजनशील कार्य को करने लग जाएंगे उस दिन से वे आजादी के मालिक बन जाएंगे. हमारे विश्वविद्यालय में हर विद्यार्थी को एक क्लब का सदस्य बनने का मौका मिलता है. उसकी  रूचि के अनुसार वह एक क्लब का सदस्य बन सकता है. उस क्लब में वह वो कार्य करता है जोजो उसका मनपसंद हो. इस हेतु उसको सप्ताह में दो कालांश मिलते हैं. इस प्रकार विद्यार्थी अपनी मनपसंद हॉबी को अपने आप को समर्पित कर पाता  है. हर कॉलेज में राष्ट्रीय सेवा योजना और इस प्रकार के मंच इसी लिए होते हैं ताकि विद्यार्थी अपनी रूचि के कार्य करे. इस प्रकार के मंच का व्यवस्थित सञ्चालन ही सामजिक ज्ञान की शिक्षा है. कई बार हम अपने रूचि के कार्य करते करते उसी में अपने रोजगार को बना लते हैं. कई बार हमारी हॉबी ही हमारा रोजगार बन जाती है. इससे अच्छा क्या होगा. हर स्कुल और कॉलेज समाज सेवा और सामाजिक कार्य को इस प्रकार से प्रस्तुत करे की विद्यार्थी इसकी गहराई तक जा सके और उसको इस कार्य में मजा आने लगे. फिर तो उसका पूरा जीवन की देश के नाम हो जाएगा. संजोय घोष ने राष्ट्रीय सेवा योजना के प्रोजेक्ट के तहत उनलोगों के लिए कार्य किया जिनको उनकी (संजोय घोष की)ज्यादा जरूरत थी. फिर उनके मन में समाज सेवा का जूनून पैदा हो गया. उनका आईआईएम अहमदाबाद आदि सभी प्रतिष्ठित संस्थाओं में चयन हो गया लेकिन उन्होंने आनंद के इंस्टिट्यूट ऑफ़ रूरल मैनेजमेंट में इसी लिए प्रवेश लिया ताकि वे गावों की सेवा कर सकें. फिर उन्होंने बड़ी कंपनियों में काम करने की जगह उरमूल से जुड़ कर गावों के विकास हेतु अपने आप को समर्पित कर दिया.
मेरी पूरी चर्चा से निम्न बातें अगर आप को ठीक लगे तो आगे बढाइये  : -
  • सामजिक ज्ञान उतना ही जरुरी है जितना की अंग्रेजी गणित और विज्ञानं. परंतु जिस प्रकार विज्ञानं की पढाई प्रयोगशाला के बिना संभव नहीं होती है वैसे ही सामजिक ज्ञान की पढाई को जीवन में उतारने हेतु उसके व्यवहारिक पक्ष को मजबूत बनाना पड़ेगा ताकि विद्यार्थी उसको अपने जीवन में उतारना सीखे
  • प्रजातंत्र, शक्ति, सत्ता, और सामूहिक कार्य शैली हम सबको सीखनी चाहिए और जिस स्कुल में ये सब सिखाये जाते हैं वही सच्चे अर्थ में प्रजातंत्र की पाठशाला है.
  • विद्यार्थी को अपनी आजादी को सृजनशील कार्य में लगाना सीखना चाहिए. जिस दिन हॉबी ही आजीविका का जरिया बन जायेगी, वह विद्यार्थी पूरी जिंदग़ी जूनून से कार्य करेगा और सफलता के उच्छ्तम् शिखर तक पहुँच पायेगा. 
कैसे सिखाते हैं आप अंग्रेजी : डरा कर या प्रोत्साहन से

एक भाषा का अनावश्यक आतंक  और गुलाम मनोवृति
कहते  हैं की अगर हम एक भाषा में दक्ष हों तो दूसरी भाषा सीखना आसान हो जाता है. भाषा तो जीवन जीने का तरीका है, हर भाषा आसान होती है अगर हम इस को अपनी सोच में उतार सकें. ‘इंग्लिशविंग्लिश’  नामक फिल्म देखते हुआ मुझे अपने बचपन की याद  गयीइस फिल्म में दो बाते दर्शायी गयी है : .अंग्रेजी  जानने पर होने वाला हीन भाव  अंग्रेजी सिखाने वाले अध्यापक द्वारा अंग्रेजी बोलने हेतु प्रोत्साहन देनाऔर एक सरल व्यवस्था से अंग्रेजी सिखाना. पहली बात पर आप सब ने गौर किया होगा लेकिन दूसरी बात है जिस पर गौर देने की खास जरुरत है, खास कर शिक्षा से जुड़े हुए लोगों को तो इस इस पर विशेष जोर देना चाहिए   
जब में कक्षा ११ में था तब मेरे मन में अंग्रेजी के प्रति विद्रोह भरा हुआ थामैं अपने साथी विद्यार्थियों के साथअक्सर बात किया करता था की अगर अंग्रेजी हटा दी जाए तो पठाई कितनी सुगम हो सकती हैहमारी कक्षा कोअंग्रेजी हर साल आधा कर देती थीकई फ़ैल हो जाते थे तो कई हिम्मत हार कर मैदान छोड़ देते थेअंग्रेजी केअध्यापक अंग्रेजी का इतना दर बैठते थे की रटने के आलावा कुछ सूझता ही नहीं थाग्रामर को कितना भी रटलोफिर भी धोखा दे जाती थी११ वि तक की पठाई की बाद भी अंग्रेजी तो कुछ पल्ले ही नहीं पड़ती थीजो बच्चे अंग्रेजीभाषी परिवारों से आते थे उनको  विशेष तबज्जो मिलती थी और वे ही विद्यार्थी आराम से शिखर पर पहुँच जाते थे.अंग्रेजी ने ऐसा खौफ पैदा कर दिया था की आगे पढ़ने की इच्छा ही खत्म हो गयी थीचार्टर्ड अकाउंटेंट बनने कीइच्छा भी इसी कारण दबा दी क्योंकि किताबें अंग्रेजी में थीएकमात्र रहत की आशा यह थी की कॉलेज में अंग्रेजीहमारा पीछा छोड़ने वाली थीअतः हम सभी विद्यार्थी कॉलेज का इन्तजार कर रहे थेराम राम कर के ११वि पूरी हुईऔर कॉलेज में प्रवेश लिया और राहत की सांस ली.
मैंने अपने स्कुल में  अनेक प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को अपना अधिकांश समय अंग्रेजी के साथ जूझते हुए देखा है.जो विद्यार्थी अंग्रेजी के माहौल में रहेउनकी तो चांदी और जो अंग्रेजी सीखना चाहते थे उनके सामने पहाड़ जैसीचुनौतियांअंग्रेजी के अध्यापक उसे इतना मुश्किल बना देते थे की जब भी कुछ बोलो तो मुंह से गलत ही निकलताथाकभी ग्रामर की गलतीकभी उच्चारण की गलतीकभी शब्द ही नहीं मिलते तो कभी
कैसे छूटा मेरा अंग्रेजी से भय
१९८६ में बी.कॉम करने के बाद रामपुरिया कॉलेज में प्रोफ़ेसर एम आर खत्री साहब से मुलाकात हुईउन्होंने ४५ दिनका ( महीने काएक नया कोर्स शुरू किया थायह कोर्स कम्मुनिकेटिव इंग्लिश का थामैंने हिम्मत कर के इसकोर्स में प्रवेश लियाप्रोफ़ेसर खत्री ने चार बातें कही : - अंग्रेजी का भय छोड़ दो,  आप लोग आपस में अंग्रेजी मेंबात करोगलत सही की परवाह मत करो.  डिक्शनरी हमेशा अपनी जेब में रखोरोज २०-३० नए शब्द सीखो  .मन में यह सोचो की आप को अंग्रेजी आती है और आप अंग्रेजी में ही सोचने की कोशिश करोउनकी कक्षाएं आमकक्षाओं से बिलकुल अलग होती थीवे अपना अधिकांश समय हमें प्रेरित करने में लगा देते थे.  वे हमें बहुत बोलनेका मौका देते थेकक्षा भी एक  गोल मेज के चारों तरफ लगती थी और नित नए वाद-विवाद आयोजित होते रहतेथे  व् समूह चर्चा आयोजित होती रहती थीहर - दिन बाद कोई खास मेहमान आता था जिसके साथ हमकोअंग्रेजी में बात करनी होती थीउन्होंने हमको कहा की कोर्स समाप्त होने पर हम सबको १५-२० मिनट तक अंग्रेजीमें लगातार बोलना पड़ेगाएक दिन उन्होंने हमको प्राचार्य प्रोफ़ेसर रवि टिक्कू के सामने अंग्रेजी में - मिनट बोलनेका कार्य भी दे दियाजो काम में स्नातक तक की पढाई में नहीं कर पायावह उन ४५ दिन के कोर्स ने कर डाला४५दिन बाद मेने अपने आपको अंग्रेजी के विद्रोही के रूप में नहींबल्कि अंग्रेजी सिखाने वाला पाया (उनके अगले बेच मेंमेने भी विद्यार्थियों को अंग्रेजी सीखना पढ़ाया). ये ४५ दिन मेरी जिंदगी में पहले  गए होते तो शायद में अपनीस्कुल में ज्यादा अच्छे से पढाई कर पाता और अंग्रेजी की पुस्तकों को पढ़ने में दिक्कत नहीं आतीपुराने अंग्रेजी केगद्य और पद्य जो हमेशा मुश्किल लगते थे अब बड़े अासान लगने लगे  परन्तु अब बहुत देर हो चुकी थी .  मेरेअंदर का सारा डर दूर हो गया और मैंने अपने आप को आत्मविश्वास से भरा पायाउसके बाद मुझे कई विद्यालयोंमें अंग्रेजी शिक्षकों की नियुक्ति हेतु साक्षात्कार लेने का मौका मिलामैंने हमेशा यही प्रश्न किया की क्या आपअंग्रेजी को रुचिकर तरीके से सीखा सकते हैं?
मैं आज भी देश में वही हाल देख रहा हूँ जो मेरे बचपन में थेआज भी मैं विद्यार्थियों को छटपटाते हुए देख रहा हूँमैंआज भी यही सोच रहा हूँ की  हम हमारे विद्यार्थियों की मदद करने के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठातेआपहम सभी को यह कोशिश करनी है की किस प्रकार हम अंग्रेजी की पढाई सरल और सुगम बना सकें ताकिविद्यार्थियों को यह एक बोझ नहीं लगे



जीवन की अर्थशाश्त्र की राजस्थानी पठाई

हर राजस्थानी अपने बच्चों को बचत, संयम, मोलाई, और संतोष से घर खर्च
चलाना और अपने सपनो को जमीन की धरातल पर रखना सिखाता है. राजस्थानी गृहणी
अपने घर खर्च की जिम्मेदारी उठाते उठाते अपने बच्चों को सब्र और इन्तेजार
की शिक्षा देती है. भले ही आप इसको मारवाड़ी कंजूसी कहें, परन्तु यही
सच्चे अर्थों में जीवन की अर्थशाश्त्र की पठाई है. क्या आप घर का बजट
बनाते समय अपने बच्चों को इस प्रक्रिया में शामिल करते हैं. क्या आप
बाजार में खरीददारी करते समय अपने बच्चों को शामिल करते हैं. क्या आप
अपने बच्चों को घर के खर्च के बारे में बताते हैं और उनको निर्णय लेने की
जिम्मेदारी देते हैं?
अनीता किराने की दूकान में सामान लेते लेते अचानक चॉकलेट की फरमाइश का
बैठी. दुकानदार ने चॉकलेट थमाई परन्तु अनीता ने अपनी   जीभ  काटते  हुए
चॉकलेट की जगह एक रजिस्टर की फमाइश की. उसको पता है की घर पर उसके भाई को
रजिस्टर की ज्यादा जरुरत है. उसकी नयी नयी नौकरी लगी है और बचपन से उसने
अपनी माँ को घर के खर्च को चलते हुए देखा है. उसको पता है की घर की
प्राथमिकता क्या है.  दो दो रूपये बचा कर घर खर्च चलाना और अपनी जरूरतों
को आवश्यकताओं की आगे कुर्बान करके खुश होना, यह उसको बचपन से संस्कारों
में मिला है.
एक बहुत ही सफल उद्योगपति ने अपने पुत्र को MBA  करने के लिए विदेश भेजा.
उसके बाद उसने अपने पुत्र को अपने व्यापार की बागडोर संभला दी ये सोच कर
की उसने विदेश में प्रबंध शिक्षण हासिल किया है. फिर उसको बहुत ही अफ़सोस
हुआ यह देख कर की उसके लड़के को व्यवहारिक जीवन का कोई ज्ञान नहीं हैं और
उसकी कम्पनी का प्रबंध तो दूर की बात छोटे छोटे निर्णय भी मुश्किल काम
हैं. उसको मजबूर हो कर व्यापार की बागडोर फिर से अपने हाथ में लेनी पड़ी
और फिर उसने अपने बेटे को स्वयं व्यापर की कला सीखना शुरू किया. फिर उसको
यह समझने में देर नहीं लगी की अर्थशाश्त्र, व्यापर, वाणिज्य और प्रबंध
शाश्त्र  के हर छोटे से छोटे मन्त्र हम अपने रोज की जीवन में काम में
लेते हैं और वे ही हम अपने बच्चों को सीखा सकते हैं. ऐसा नहीं कर के हम
बहुत बड़ी गलती का रहे हैं. हर व्यक्ति को अपने परिवार में घर के आर्थिक
मामलों की चर्चा इस प्रकार करनी चाहिए की बच्चों को बचपन से ही ज्ञान
मिले. राजस्थान में यह परंपरा रही है इसी कारण से राजस्थान के विद्यार्थी
अंग्रेजी में भले ही कमजोर रहें हों लेकिन व्यापर और अर्थ की उनको हमेशा
से अच्छी समझ रही है.

मैं अक्सर सेमिनार में विद्यार्थियों से पूछता हूँ "एक रूपये से आप क्या
कर सकते हैं? " " १०० रुपयों से आप क्या कर सकते हैं? " और मुझे बहुत ही
रुचिकर जवाब मिलते हैं क्योंकि विद्यार्थियों को अपने घर से यह संस्कार
मिले होते हैं की एक एक रूपये की कदर करना सीखो. एक विदेशी प्रोफ़ेसर ने
जयपुर में यह प्रश्न किया की "माल लो आपको १ लाख रूपये दे दिए जाते हैं
तो आप क्या करेंगे? " उन्होंने यही प्रश्न चीन में भी किया था. प्रश्न तो
यही था लेकिन उत्तर में बहुत ज्यादा फर्क था. चीन के विद्यार्थियों ने
आराम और आनंद की कई वस्तुएं गिना  दी लेकिन जयपुर में विद्यार्थियों ने
उन १ लाख रुपयों से और अधिक रूपये कैसे बनायें इस पर ध्यान दिया.
बचपन से ही हम हमारे घर में बचत और संयम की पाठशाला चलाते हैं और घर पर

ही आर्थिक समझ पैदा कर देते हैं. यही हमारे संस्कार है और यही हमारी
"मारवाड़ी संस्कृति". इस संस्कृति का मुकाबला न तो हार्वर्ड की पढाई कर
सकती है और न ही स्टैनफोर्ड डिग्री. इस पढाई के महत्त्व को समझिए आपको
पता चल जाएगा की आजादी के पहले के भारत में हर बिरला, बजाज, और डालमिया
राजस्थान से कैसे निकल कर आया. इसी आर्थिक समझ को बनाये रखने की जरुरत
है. जिस समझ को आप पुराना या परंपरागत मान रहें हैं वही हमारी आर्थिक
ताकत का कारण हैं. इसी आर्थिक समझ के कारण हर घर में आज भी बचत और
संतुलित उपभोग साथ साथ चलते हैं और जीवन में आनंद और खुशियों के लिए
उपभोग नहीं संयम पर जोर दिया जाता है. एक व्यक्ति के लिए घाटा किसी अन्य
व्यक्ति के लिए मुनाफा हो जाता है. लेकिन आप चाहते हैं की हर व्यक्ति को
लाभ हो तो फिर घाटा कौन उठाएगा? सरकार. अतः सरकार को घाटे की
अर्थ-व्यवस्था चलानी है. लेकिन सरकार के तरीकों से अगर आम आदमी अपना घर
चलाना शुरू कर देगा तो फिर लुटिया डूब जायेगी. जिस दिन सरकार हमारे देश
में घर घर में फैली आर्थिक समझ को सलाम करना शुरू कर देगी इस देश का चमन
हो जाएगा (अफ़सोस तो यह है की सरकार को अपनी आर्थिक नीतियां बनाने में
भारत के आम आदमी की नहीं विदेशी सलाहकारों और विदेशी संस्थाओं की ज्यादा
माननी पड़ती है).
एक विख्यात ब्रिटिश राजनितिक शाश्त्री को जब अर्थशाश्त्र की पढाई करने की
जरुरत महसूस हुई, तो पढाई करने के बाद उन्होंने कहा की सही अर्थशाश्त्र
तो गृहणी ही समझती है. अथशास्त्र की शुरुआत घर से ही होती है. जब बालक घर
के अर्थशाश्त्र को समझ जाएंगे, वे बालक भले ही MBA न करें, वे  MBA से कम
नहीं होंगे. जीवन में सही आर्थिक निर्णय लेना १ या २ वर्षों में नहीं
सीखा जा सकता, बल्कि यह तो जीवन की पाठशाला की पठाई है, और इसकी
जिम्मेदारी हर घर को निभानी है.
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Friday, January 2, 2015

शिक्षा : पैसा नहीं इच्छाशक्ति चाहिए 

आखिर हम पढाई से क्या चाहते हैं? 
पढाई जीवन के निर्माण की आधारशिला है या सच्चे अर्थ में नीव है. सभ्यता के अंकुर हम पढाई के माध्यम से ही फैला सकते हैं. दुनिया में जहाँ जहाँ पढाई को रोक गया तबाही हुई और जहाँ जहाँ पढाई को समर्थन दिया गया - प्रगति और उल्लास का माहौल बना. 

जीवन की चुनौतियों की तैयारी
हर शिक्षण संस्था को विद्यार्थियों को जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार करना चाहिए. 
दिल्ली में हाल मैं एक शेर के पिंजड़े में एक आदमी गिर गया और शेर उसको खा गया. कितने दुःख की बात थी की आस पास खड़े लोग कुछ नहीं कर पाये सिवाय हल्ला मचने के या मोबाइल से वीडियो क्लिप बनाने और उसको लोगों को भेजने के. मैंने छोटे छोटे बच्चों को यह पूछा की शेर से बचने के लिए आप क्या कर सकते थे?  एक छोटा बालक बोला - "मेरी गली के पिल्लों को उस गधे में फेंक देता - वे शेर को भोंक भोंक कर उसको परेशान देते". एक अन्य बालक बोला "मैं बेहोश करने वाली पिस्तौल ल कर उसको चला कर शेर को बेहोश कर देता" एक अन्य बालक बोला :" मैं शेर से लड़ने के लिए कोई और जानवर पिंजरे में दाल देता ताकि दोनों लड़ते रहते तब तक इस आदमी को बचने के लिए रस्सी फैंक देता." विद्यार्थियों को इस प्रकार के प्रश्नों से हम जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार कर एक बेहतर भविष्य की नीव रख सकते हैं. 

शिक्षा में निवेश कैसा हो
देश में आधारभूत ढांचे के निर्माण की बात हो रही है, परन्तु विद्यार्थियों की शिक्षा के लिए आधारभूत ढांचे की कोई बात नहीं कर रहा है. आज जरुरत है की हम शिक्षा के महत्त्व, उसकी व्यवस्था और प्रणाली पर निवेश करें. आज जरुरत है की हम फिर से शिक्षा को प्राथमिकता देवें. जब तक हर मोहल्ले, हर गाव, हर गली मैं बाल पुस्तकालय, बाल विज्ञानं-शालाएं, बाल क्रीडांगन व् बाल संसद बनाने की बात लोग नहीं करेंगे तब तक आगे की बात तो हम सोच ही नहीं सकते. विकास की शुरुआत तभी होगी जब हम मुलभुत ढांचे के निर्माण की बात से शुरुआत करेंगे और फिर एक ऐसा माहौल बनाएंगे जिससे लेखकों को बाल कविता, बाल कहानियां और बाल साहित्य सृजन की प्रेरणा मिलेगी और ऐसी परम्पराओं का निर्माण होगा जो बचपन से ही शिक्षा और विकास की नीव रख देगी. इसमें कोई बहुत ज्यादा निवेश नहीं हैं. निवेश है तो हमारी सोच और इच्छा शक्ति का. हाल ही में एक विश्वविद्यालय पर लगभग २५०० करोड़ का निवेश किया जा रहा है जहाँ पर सिर्फ १५ विद्यार्थी और सिर्फ २ पाठ्यक्रम होंगे. मैं ऐसे किसी निवेश की वकालत नहीं करता हूँ. मैं तो गाव में पीपल के गट्टे के पास साइबर-गट्टे की बात करता हूँ जिससे गाव-गाव का बालक अपने गाव के लोक गीत गाकर अपलोड कर सके और दूसरे गाव के बच्चों से बात कर सके और जहाँ पर वो दोस्तों के साथ बैठ कर अख़बार पर चर्चा कर सके. 

शिक्षण की परम्पराओं को बचाईये 
आधुनिकता के नाम पर हमने हमारी पुरानी शिक्षण संस्थाओं को समाप्त कर दिया या उनको इतना नजरअंदाज कर दिया की वे लुप्त हो गयी. अब कहाँ पचि हैं पुरानी ज्ञानशालाएं, पोशालाएं, मार्जा और गुरुकुल. उनके साथ ही शिक्षण की अद्भुत भारतीय परम्पराएँ भी लुप्त हो गयी हैं या धीरे धीरे लुप्त हो रहीं हैं . आधुनिकता के नाम पर शिक्षण की वर्षों से चली आ रही अनेक समृद्ध  परम्पराओं को हम रोज खोते जा रहें हैं. नयी परम्पराएं बना नहीं  प् रहें हैं और पुरानी  परम्पराएं खोते जा रहें. मैं यहाँ पर सिर्फ एक परंपरा की चर्चा करूँगा. जब हम छोटे थे तब राजस्थानी में पहाड़े बोल कर याद किया करते थे. आज वे पहाड़े लुप्त होते जा रहें हैं. उन पहाड़ों को तैयार कर के हमारी पीढ़ी आज भी अपनी रोजमर्रा की जरुरत की जोड़ बाकी कर सकते हैं. लेकिन नयी पीढ़ी को न तो पहाड़े आते हैं न ही " वैदिक गणित" और उनको छोटी छोटी जोड़-बाकी के लिए केलकूटर की जरुरत पड़ती है. 

बचपन - सबसे मजबूत आधारशिला 
हमारा मस्तिष्क हमारी सोच की कार्यशाला है. इसके निर्माण में कई वर्ष लगते हैं. बचपन के अनुभव मस्तिस्क की नीव बनाने वाली परतों का निर्माण करने में सहायक होते हैं. यह एक पुरानी कहावत है की अगर आप किसी बालक को बचपन  से यह सीखते रहते हैं की उसको एक राजा बनना है - तो वह बड़ा हो कर राजा बन के दिखता है. बचपन के संस्कार हमारे जीवन को बनाने में हमें मदद करते हैं. पुराने समय से हमारे यहाँ ऐसे रिवाज हैं जिनका मकसद संस्कार निर्माण हैं और यह संस्कार निर्माण गर्भाधान से शुरू हो जाता है. पुराने समय से ही ऐसी व्यवस्थाएं हैं जिनका मकसद यह है की छोटे बच्चों को पूरा ध्यान, सकारात्मक अभिप्रेरणा और प्रोत्साहन मिले. जो संस्कार बचपन में बन जाते हैं वे कभी बदल नहीं सकते हैं. 
अभी दिल्ली में प्ले स्कुल में हो रही एक घिनौनी घटना के बारे में पढ़ा. अभिभावक निराश हो रहें हैं - कैसे भेजें वे अपने बच्चों को ऐसी प्ले स्कूलों में ? हम किधर जा रहें हैं?  एक मजबूत भारत बनाने के लिए बच्चों के लिए समर्पित शिक्षण संस्थाएं चाहिए. क्या करें उसके लिए? 

भाषा और संस्कृति को बचाईये 
आप एक भाषा में दक्ष हैं तो आप एक शानदार लेखक, रचनाकार, साहित्यकार, कलाकार, और एक सफल व्यक्ति बन सकते हैं. परन्तु आज की दुविधा यह है की हमारे बच्चे न तो मातृ भाषा जानते हैं न ही विदेशी भाषा जानते हैं. आज फिर से जरुरत है की हम विद्यार्थियों को उनकी मातृ भाषा में इतना दक्ष बना देवें की जीवन में हर सफलता उनके कदम चूमे.  
शिक्षा के बिना हर विकास अधूरा 
आज विकास की बात हो रही है लेकिन विकास में मायने सही नहीं हैं. विकास की परिभाषा अगर आप राष्ट्रीय उपभोग के आंकड़ों से ही देखते रहेंगे तो फिर आप विकास को समझ नहीं पाएंगे. असली विकास तभी है जब हर व्यक्ति का विकास हो रहा है और विकास का सबसे अच्छा माप है शिक्षा और प्रशिक्षण. जब आप विकास के पैमाने को शिक्षा और प्रशिक्षण पर तोलते हैं तो फिर सही अर्थों में आप विकास को माप सकते हैं और लोगों में आ रहे बदलाव से विकास को भी देख सकते हैं. जैसे ही शिक्षा फैलती है, लोगों के जीवन में बदलाव शुरू हो जाता है. शिक्षा को जीवन के हर पहलु से जोड़ने की जरुरत है. चाहे वह संस्कृति हो या हमारे त्योंहार, हमें इन सबको शिक्षा से जोड़ना है ताकि हम लोगों को अपनी जिंदगी और बेहतर बनाने में मदद कर सकें. 

यह अत्यंत ख़ुशी की बात है की हमारे देश के नीति निर्धारकों को यह समझ आ गया है की विकास के लिए छोटे छोटे कदम उठाने की जरुरत है, कदम छोटे हों, पर हर व्यक्ति की भागीदारी हो, जान-भागीदारी ही विकास को सुनिश्चित करती है. जिस दिन हर व्यक्ति को विकास नजर आने लगेगा तभी विकास की शुरुआत होगी. 

कैसे मनाएं ये त्योंहार 
त्योंहार वो होता है जो आप में उल्लास और ख़ुशी भर दे. इसको मानते मानते आप अपनों से और जुड़ जाते हैं और जीवन में एक नयी सुबह पाते हैं. आपको अपने रिश्तेदारों से जोड़ने ही तो आते हैं ये त्योंहार. आजकल नए जमानें में हम अपना ज्यादातर समय दफ्तर में बिताते हैं तो अब ये त्योंहार दफ्तर के हमारे साथियों को भी जोड़ सके तो मजा आ जाये. इस बार क्या आप दफ्तर में भी त्योंहार मानाने की सोच सकते हैं? शायद हा - क्योंकि शुरुआत तो हो गयी है. 

तयारी एक अनोखी दिवाली की 
दिवाली आ रही है. दशहरा और दिवाली बुराई पर अच्छे की जीत और प्रगति की तरफ उड़ान की तयारी है. यह सिर्फ एक परंपरा ही नहीं एक सालाना जलसा है जिसका मकसद है कुछ नया करने का ताकि हम अपने काम को और बेहतर बना सकें. इस बार दिवाली के मोके पर कुछ नया शुरू हो रहा है. सबसे बड़ी बात है स्वछता अभियान 

साफ़ सफाई का अद्भुत कार्य
दिवाली पर हर घर में साफ़ सफाई की परंपरा है. हर व्यक्ति अपने घर को नया सा बना लेता है और साफ़ सफाई कर के उसको चमका देता है. इसी से तो जीवन में खुशियां आती है. इस बार भारत के प्रधान मंत्री जी ने हर सड़क, हर मोहल्ले और हर दफ्तर में भी साफ़ सफाई की एक नै शुरुआत कर दी है. अब यह सफाई की व्यवस्था चालू रहनी चाहिए. यही तो असली दिवाली है. इस प्रक्रिया में विद्यार्थियों की भागीदारी जरुरी है. शिक्षण संस्थाओं को मिल कर इस कार्य को अंजाम देना चाहिए. 

हर राष्ट्रीय मिशन  के आयोजन में  शिक्षकों की भागीदारी जरुरी 
स्कूलों की भागीदारी और शिक्षकों के योगदान से हर राष्ट्रीय कार्यक्रम सफल हुआ है. चाहे वह जनगणना हो या चुनाव, शिक्षकों का योगदान अतुलनीय है. शिक्षक सिर्फ ज्ञान ही नहीं देते है उसको अमल में लाना भी सीखते हैं. शिक्षक सिर्फ शिक्षा ही प्रदान नहीं करते, वे लोगों के जीवन को बदलने का काम भी करते हैं. शिक्षा के साथ वे आस पास रहने वाले लोगों की मदद कर के उनके जीवन में एक नया सवेरा लाते हैं. शिक्षण संस्थाएं जब तक समाज से जुड़ कर काम नहीं करेगी, वे समाज के लिए नहीं बल्कि किसी और उद्देश्य के लिए काम करेगी. गुजरात में पोपट भाई देवलुक नामक एक शिक्षक ने एक गाव को बदल कर रख दिया. घोघा तालुका में जूना पदार स्कुल में जब वे गए तो वे अकेले शिक्षक थे और कोई विद्यार्थी नहीं थे. वे घर घर गए और अनुरोध किया और शिक्षा का महत्त्व समझाया. गाव के लोगों की मदद की तब लोगों ने उनकी बात मानी और अपने बच्चों को स्कुल भेजना शुरू किया. फिर तो देखते ही देखते गाव की तस्वीर बदल गयी. जहाँ जहाँ भी शिक्षक किसी कार्यक्रम से जुड़े हैं, वह कार्यक्रम राष्ट्रीय आंदोलन बन गया है.  प्रोफ़ेसर पि सी जैन ने राजस्थान में स्कॉउट कार्यक्रम द्वारा एक दिन में एक घंटे में ११ लाख से ज्यादा पेड़ लगाकर एक अद्भुत कार्य किया था. अब इन्तजार है की इस बार और हर बार दशहरा - दिवाली पर शिक्षक कैसे हर विद्यार्थी को स्वछता आंदोलन से जोड़ पाते हैं. 
शिक्षा  : डूबती नैया का सहारा


टीवी, फिल्मों व् इंटरनेट के द्वारा फैशन और आधुनिकता के नाम पर जहर
परोसा जा रहा है. आप हम सभी मूक दर्शक बने देख रहे हैं. कभी डेटिंग तो
कभी लिविंग - इन रिलेशनशिप तो कभी इनसे भी घिनोनी हरकतों को दिखाया जाता
है और समाज को तहस नहस करने के प्रयास किये जा रहे हैं. हमारे युवा वर्ग
इनकी चपेट में आ रहे हैं. आज इस तबाही के तूफ़ान में भी कोई आशा की किरण
नजर आ रही है तो वह है शिक्षा व्यवस्था. शिक्षा वह अमृत घूंट है जो किसी
भी विष से बचा सकता है. आज जब हम सब मुसीबत मैं हैं तो अपने बच्चों को
संस्कार और अच्छी शिक्षा दे कर हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं की हमारा
समाज और हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा.

कोई स्कुल नहीं सिखाती मीडिया स्किल्स
आज हर विद्यार्थी अपना आधे से ज्यादा समय मीडिया के साथ बीतता है. परन्तु
कोई स्कुल नहीं सिखाती है की मीडिया को कैसे काम में लेवें. कोई भी स्कुल
विद्यार्थियों को टीवी, फिल्म और इंटरनेट के प्रयोग और उसके दुष्परिणामों
के बारे में नहीं बताती. मीडिया तो एक बण्डल है जिसमे अच्छी बातें भी है
और बुरी बाते भी. आप क्या चयन करते हैं वह आप पर निर्भर है. यह एक
प्रशिक्षण का विषय है. बड़ा अफ़सोस है की कोई स्कुल ये सब नहीं सीखते है. न
तो स्कुल न ही घर - कोई नहीं है सीखने वाला - नतीजा - गुमराह होते हमारे
किशोर. स्कुल वर्षों पुराने अपने सिलेबस को नहीं बदलना चाहते. अध्यापक
सिलेबस से अलग पढने की हिम्मत  नहीं करना चाहते. निजी क्षेत्र सिर्फ
आमदनी बढ़ने और शो-बाजी में रूचि लेता है और सरकारी तंत्र के बारे में तो
क्या कहें.
बहुत कुछ सीखा जा सकता है मीडिया से
आप ये न समझे की में टीवी, फिल्म और इंटरनेट के खिलाफ हूँ. इनसे बहुत कुछ
सीखा जा सकता है लेकिन इस हेतु एक माहोल तो बनाना पड़ेगा. गुजरात के नानजी
भाई ने अपनी स्कुल में रेडियो क्लब बनाये और विद्यार्थियों को विज्ञानं
जगत और इस प्रकार के अन्य प्रोग्राम सुनने के लिए प्रेरित किया. वे जिस
जिस गाव में गए वहां पर रेडियो पर आने वाले ज्ञानवर्धक कार्यक्रमों को
लोकप्रिय बना देते थे (उस समय में मोबाइल नहीं थे). बीकानेर में
रामपुरिया महाविद्यालय में बहुत पहले एक फिल्म क्लब था जिसमे कलात्मक
फिल्मो को दिखाया जाता था और उस पर चर्चा होती थी. मीडिया भी जीवन का एक
हिस्सा है. विद्यार्थियों को नहीं पता की उनको मीडिया का इस्तेमाल कैसे
करना है - यह तो उनको सीखना पड़ेगा

कुछ नहीं सिखाते हैं हम अपनी संस्कृति बचने के लिए
आज अधिकांश लोग बहुत दुखी होते हुए आपसे कहेंगे की स्नातक करने के बावजूद
भी विद्यार्थी एक आवेदन तक ढंग से नहीं लिख सकते हैं. मैं भी दुखी हूँ
लेकिन इस कारण से नहीं - इससे भी बड़े कारण से. आवेदन नहीं लिख पाते कोई
बात नहीं. उन्हें अभिवादन करना नहीं आता, बात करना नहीं आता ढंग के कपडे
पहनना नहीं आता, और तो और भोजन करना और पानी पीना भी नहीं आता. छोटे होते
परिवार सारी जिम्मेदारी स्कुल पर दाल देते हैं और स्कुल इनमे से कुछ भी
नहीं सिखाते हैं. क्या बात कर रहें हैं आप आवेदन करने की, यहाँ तो जीवन
जीने की कला भी नहीं सिखाई जाती है. जितनी महँगी स्कुल उतना ही बुरा हाल.
विश्वास नहीं हो तो आजमा कर देख लीजिये. एक गाव की साधारण सी दिखने वाली
स्कुल में जाइए. बिना परिचय के भी उसके विद्यार्थी आपका अभिवादन करेंगे.
एक महंगे स्कुल में जाइए, क्या आपको कोई अभिवादन मिल जाता है. फिर बच्चों
के टिफिन पीरियड में जा कर देखिये - वे क्या कहते हैं और क्या पीते हैं
और कितना भोजन फैंक देते हैं. उनको आजादी दीजिये अपनी मर्जी के कपडे
पहनने की और आपको मजबूर हो कर अपनी आँखे बंद करनी पड़ेगी - क्योंकि वैसे
कपडे किसी भी रूप में सभ्यता के प्रतीक नहीं हैं. उनसे आप एक भजन या एक
देशप्रेम का गाना  गाने को कहिये - नहीं आएगा. उनसे आप एक कविता या कहानी
या एक प्रेरक संस्मरण सुनाने को कहिये - कुछ नहीं बोल पाएंगे. उनसे आप
हमारी कला और संस्कृति के बारे में कुछ बोलने या कुछ कर दिखने का कह कर
देखिये.  ये वही बच्चे हैं जिनको हमारी अद्वितीय संस्कृति को संजो संजो
कर अगली अगली पीढ़ी तक देना हैं.

नशे की गिरफ्त में समाज
एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में २१% किशोर शराब की गिरफ्त में हैं तथा
लगभग ३.५% तो नशे की गिरफ्त में हैं. यह संख्या लगातार बढ़ रही है. देश
में आर्थिक प्रगति के साथ ही नशे की प्रवृति भी बढ़ रही है. जहाँ जहाँ पर
आर्थिक प्रगति ज्यादा हो रही है वहां वहां पर नशे की प्रवृति भी बढ़ रही
है. हमें स्कूलों से ही बच्चों में इतने मजबूत संस्कार देने पड़ेंगे की
नशे की प्रवृति की नौबत ही नहीं आये. आधुनिकता के नाम पर जो संस्कृति
परोसी जा रही है वह शराब और नशे को बढ़ावा दे रही है. आज जरुरत है तो फिर
से एक मजबूत शिक्षा तंत्र बनाने की.
कहाँ गयी समूह में सिखने की प्रवृति
स्कुल हमें समाज में बेहतर जीवन शैली के लिए तैयार करती है. लेकिन
प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत उपलब्धि को प्राथमिकता देती आजकी स्कूलें
हमारे बच्चों को समूह में काम करने की कला से वंचित कर रही है. गुजरात
में गोधरा के अध्यापक रमेश भाई ढोडकिया ने स्कुल की लड़कियों को मोहल्ले
के अनुसार समूह में बाँट दिया. फिर हर समूह को पढ़ने और समूह चर्चा करने
का कार्य सौंपा गया. धीरे धीरे इसे उन्होंने एक प्रोजेक्ट का नाम दे दिया
= प्रोजेक्ट सखी. इस प्रोजेक्ट के कारण छात्राओं को पढ़ने और लिखने का एक
बेहतरीन माहोल मिला और उनके व्यक्तित्व का विकास हुआ साथ ही उनमे समूह
में कार्य करने की कला का विकास भी हुआ. आज कल जहाँ हर जगह टूशन और
कोचिंग का बोलबाला है ऐसे प्रयोग बहुत कम अध्यापक करते हैं. आज फिर से
जरुरत है की विद्यार्थियों को समूह में मिल कर पढ़ने और सीखने की
व्यवस्थाओं की शुरुआत हो.

किसी भी मुसीबत से बचने के लिए आपात प्रबंधन और आपदा प्रबंधन के इतने आदि
हो गए हैं की जब तक मुसीबत नाक - नाक नहीं हो जाती, हम कुछ नहीं करते
हैं. आज भी हम हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं और इन्तजार कर रहें हैं की जब सब
कुछ ख़त्म हो जाएगा तो राहत सामग्री आएगी.

Thursday, January 1, 2015

टॉयलेट मेन (toilet man)   श्री इस्वर भाई पटेल - जिन्होंने गांधी के विचारों को लागू करने का प्रयास किया 



आज पुरे भारत में साफ़ सफाई और स्वतछता की बात हो रही है. अगर आज श्री इस्वर भाई पटेल जिन्दा होते तो वे बहुत खुश होते. दरअसल उन्होंने अपना पूरा जीवन स्वतछता और दलितों के उत्थान को समर्पित किया. उन्होंने अपने जीवन के ७० वर्ष इसी क्षेत्र में कार्य कर लोगों की जिंदगी में बदलाव लाने का प्रयास किया. एक समय था जब भारत में मैला ढ़ोने की घृणित प्रथा प्रचलित थी. श्री पटेल ने इस प्रधा के खिलाफ आवाज उठाई और इसको जड़ से समाप्त किया. इस हेतु उन्होंने गाव गाव जा कर आधुनिक शौचालय स्थापित किये और उनको स्थापित करने के काम को लोकप्रिय बनाया. 

पुरे विश्व में हर वर्ष १९ नवंबर को टॉयलेट डे  मनाया जाता है (यह बात आज स्वतछता के सन्दर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है. इसे भारत में इस्वर भाई पटेल को याद कर के मनाया जाना चाहिए. भारत के टॉयलेट मेन के रूप में श्री ईश्वर भाई पटेल को जाना जाता है. मुझे श्री इस्वर भाई पटेल के साथ रहने का मौका मिला था. श्री ईश्वर भाई के बारे में जितना भी कहा जाए वह काम है. श्री ईश्वर भाई पटेल ने अपना पूरा जीवन हरिजन सेवा को समर्पित कर दिया. वे लगभग ७ वर्ष की उम्र से गांधी जी से जुड़ गए थे. गांधी जी के विचारों को उन्होंने अपने जीवन में उतरा और अन्य लोगों को भी अपनाने  को प्रेरित किया.  उनको इस प्रक्रिया में बहुत सामाजिक विरोध और संघर्ष का सामना करना पड़ा.  १२ साल की उम्र में जब उन्होंने एक दलित महिला से झाड़ू ले कर सफाई की तब उनके घर वालों ने उनको नहला नहला कर स्वच्छ किया. परन्तु इस्वर भाई पटेल तो कुछ और थान चुके थे. उनका मकसद तो दलितों की जिन्दगीको बदलना बन चूका था. उन्होंने गाव गाव जा कर मैला धोने की प्रथा के खिलाफ आवाज उठायी. लेकिन उनको यह देख कर बहुत दुःख हुआ की मैला धोने वाले लोगों ने ही उनका विरोध किया. उनको यह समझ आ गया की मैला धोने वालों की जीवन-यापन के लिए भी साथ में सोचना पड़ेगा. अतः उन्होंने मैला ढ़ोने वालों को रोजगार दिलाने और उनको बेहतर जीवन यापन के लिए प्रेरित करने का काम भी शुरू किया. गाव गाव जा कर शौचालय स्थापित करने के काम में उन्होंने इन लोगों को शामिल किया. उनके इन प्रयासों से गाव गाव में शौचालय षटपिट होने लगे. उन्होंने शौचालय के डिज़ाइन पर भी काफी शोध किया तथा ऐसा डिज़ाइन बनाया जिसमे काम से काम पानी काम में लेना पड़े. उनको पश्चिमी शौचालय भारतीय परिस्थिति के अनुकूल नहीं लगे क्योंकि उनमे पानी ज्यादा चाहिए होता है. अतः उन्होंने नए शौचालय बना कर उसके डिज़ाइन कम्पनियों को दिए और इसका एक म्यूज़ियम भी बनाया.  १९६९ में उन्होंने सफाई विद्यालय (जो की हरिजन सेवक संघ का एक भाग था) के प्रमुख के रूप में कार्य शुरू किया. उन्होंने "सैनिटेशन" की एक व्यवस्थित प्रशिक्षण प्रणाली भी शुरू की और सफाई कर्मियों को प्रशिक्षण देने की लिए व्यवस्थित प्रयास शुरू किये. 

श्री पटेल एक बेहतरीन कार्यकर्त्ता और एक बेहतरीन प्रशाशक थे. उन्होंने एक टीम बनायीं जो उनके साथ मिल कर कार्य करती थी और गाव गाव जा कर गांधी जी के आदर्शों को जन जन में फैलाती थी. उन्होंने साबरमती के आश्रम में अत्यंत सादगी से रहते हुए एक आदर्श जीवन को जी कर बताया और जो भी उनके सम्पर्क में आया वह उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका. पुरे जीवन गांधी जी के आदर्शों को समर्पित करने वाले श्री पटेल आज हम सब के लिए एक आदर्श हैं. १९८५ में उन्होंने एनवायरनमेंट सैनिटेशन इंस्टिट्यूट नमक एक संस्था शुरू की जिसके तहत उन्होंने साफ़, सफाई, स्वतछता, और सैनिटेशन पर कार्य शुरू किया. इसके बाद उन्होंने सफाई कर्मियों के प्रशिक्षण, हरिजनों के प्रशिक्षण और सैनिटेशन के लिए शोध और और नवाचार पर एक व्यवस्थित संस्थागत प्रयास शुरू किया. 

श्री पटेल व्यक्तिगत जीवन में बहुत ही सरल हृदयी, मिलनसार, और हंसी मजाक करने वाले व्यक्ति थे. मैं १९९४ में उनसे मिला था. जब में उनसे मिला तब उनका स्वास्थय ठीक नहीं था फिर भी उन्होंने मुझे पूरा समय दिया. वे अपने शरीर को अपने से अलग मानते थे. अतः जब उनको भयंकर दर्द होता था तोभी मुस्कुराते रहते थे. आखिरी समय में उनको बहुत कष्ट रहा. परन्तु जब डॉक्टर उनका ऑपरेशन करते थे तब भी वे मुस्कुराते रहते थे. भयंकर शारीरक वेदना के समय भी वे मुस्कुरा कर कह देते थे की यह वेदना तो इस नश्वर  शरीर की है. २६ दिसंबर २०१० को श्री पटेल ७७ वर्ष की आयु में  स्वर्गवासी हो गए.