Thursday, April 23, 2015

ऊर्जा और जोश



जीवन के संग्राम के लिए असली विटामिन:  ऊर्जा और जोश 

जीवन में अगर हम उत्साह, जोश, और ऊर्जा से भरे रहेंगे तो जीवन हमारा है और हमको हर कार्य में सफलता मिलेगी, परन्तु यदि हम हताशा, निराशा, व् हार की मानसिकता से जिएंगे तो ये जीवन भी हमें ठुकरा देगा. आज के दिन हमें हर सांस के साथ अपने अंदर उत्साह और जोश भरने की सीख लेनी है. २२ फरवरी का दिन पूरी दुनिया में बड़ेन पावेल के जन्म दिन के रूप में मनाया जाता है. पूरी दुनिया में स्काउट्स -गाइड्स मूवमेंट के द्वारा उत्साह और जोश से जन सेवा का पैगाम फैलाने वाले पावेल ने देखा की मिलिट्री ट्रेनिंग से लोग जोश और उत्साह से भर जाते हैं और जीवन को एक नए नजरिये से देखते हैं. उन्ही के इस नए नजरिये के लिए ही कई लोग आज के दिन को थिंकिंग डे के रूप में भी मानते हैं यानी अगर हम सभी ज़माने के प्रति अपने नजरिये को बदल लें तो दुनिया का नक्शा बदल सकता है. आज के युवाओं को पावेल के सन्देश की फिर से जरुरत है.
देश सेवा और परिश्रम को जोड़िये युवा शिविरों के द्वारा  
स्काउट्स आंदोलन की तरह ही भारत में नेशनल युथ प्रोजेक्ट है, जिसका सञ्चालन श्री सुब्बा राव करते हैं. श्री राव आज ८५ वर्ष से जयादा की उम्र के हैं लेकिन आज भी वे इतने उत्साहित और जोशीले रहते हैं की वाकई नौजवानों के लिए एक नसीहत है. जब मैं उनसे पिछले और उससे पिछले वर्ष मिला था तो मैं हैरान था ये देख कर कर की वे आज भी कितना शारीरक श्रम करते हैं. उनकी जगह हम हमारे नौजवानों को देखें तो लगता है की हमने इनको  इतना नाजुक बना दिया है की वे लोग कुछ भी नहीं कर सकते हैं (सिवाय फेसबुक और व्हाट्सप्प चलाने के). आज आम शहरी बच्चा न धूप  बर्दास्त कर सकता है, न ठण्ड-गर्म, न रूखी-सुखी खा सकता है न नल का पानी पी सकता है. न वो दौड़ लगा सकता है न वो शारीरिक श्रम कर सकता है, न वो समूह में काम कर सकता है न वो विपत्तियों को झेल सकता है. हमने उनको आराम के नाम पर कमजोरी प्रदान की है. जीवन कोई आराम भरी यात्रा नहीं है. जीवन में कदम कदम पर मुश्किलें आएँगी. जीवन में जो व्यक्ति कठोर परिश्रम और विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार होगा वो ही आगे बढ़ पायेगा. 

आज दिखने में आ रहा है की महानगरों के बच्चे ऑफिस - वर्क के आलावा कोई काम ही नहीं कर सकते हैं. ऐसे बच्चे किस काम आएंगे? ऐसे बच्चों से देश का विकास नहीं हो सकता है. आज फिर से पावेल और सुब्बा राव के रास्ते पर चल कर युवाओं को उत्साह और जोश से भरने की जरुरत है ताकि वे जिंदगी की इस अद्भुत सौगात का पूरा आनंद लेवें और जीवन के हर इन्तिहाँ में सफल हों. मैं हर  विद्यालय - महाविद्यालय से अनुरोध करना चाहता हूँ की विद्यार्थियों को नेशनल युथ प्रोजेक्ट तथा स्काउट्स और गाइड्स मूवमेंट जैसे अवसरों से जोड़ें ताकि विद्यार्थियों का उत्साह और जोश बरकरार रहे और वे समाज को सुधरने और संवारने में अपनी सृजनशील दक्षता का इस्तेमाल करें.  आईआईएम अहमदाबाद के प्रोफेसर अनिल गुप्ता की तरह विद्यार्थियों को  गाव - गाव भ्रमण करवाने और आम लोगों से संवाद करवाने की जरुरत है ताकि वे जीवन की मुश्किलों का समाधान निकालने में दक्ष हो जाएँ और असली भारत (असली भारत अभी भी गावों और छोटे शहरों में बस्ता है) से रूबरू हों. . उत्साह और उमंग हमें फिर से एक नया जीवन देगी ताकि हम अपनी और आने वाली पीढ़ी को एक सकारात्मक कार्य में लगा सकें. 
श्री सेनगुप्ता और श्री अब्दुल कलाम आजाद को नमन 
आज के ही दिन (२२ फरवरी १८८५) को जन्मे श्री यतीन्द्र मोहन सेनगुप्ता को भी याद करना जरुरी है. वे भी जबरदस्त उत्साह और जोश के प्रतिक थे. भारत के बर्मा से विभाजन के विरोध में आवाज उठाने वाले कुछ-एक स्वाधीनता संग्रामियों में से एक श्री सेनगुप्ता ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को एक नयी दिशा देने का प्रयास किया. आज ही श्री अब्दुल कलाम आजाद की पुण्य तिथि भी है. श्री आजाद ने जिस समय और जिस तरह से भारत में कोमी एकता के लिए काम किया, वो सिर्फ एक दिए और तूफ़ान की लड़ाई के सामान है. 

ख़ुशी और बाल-उत्साह का एक अद्भुत त्योंहार



होली  और बसंत ऋतू का स्वागत 


भारतीय संस्कृति में रची बसी अद्भुत गाथाओं में से एक गाथा है प्रह्लाद की. जिस प्रह्लाद की भक्ति के आगे स्वयं ईश्वर  को नरसिम्हा के रूप में अवतार लेना पड़ा और जिस अद्भुत बालक की चेतना के आगे अग्नि को नतमस्तक होना पड़ा. प्रह्लाद एक बालक के रूप में अद्भुत प्रतिभा और अटूट आस्था का प्रतिक है. इस कहानी ने हमें बहुत बड़ी सीख दी है. 
ख़ुशी और बाल-उत्साह का एक अद्भुत त्योंहार 

होली एक ऐसा त्योंहार है जो पुरे भारत में जोश और उत्साह भर देता है. यह एक ऐसा त्योंहार है जब हर व्यक्ति अपने अंदर अपना खोया हुआ बचपन जग लेता है और पुरे उत्साह से सबके साथ रंगों से खेलता है. 

जीवन के प्रति हमारा द्रिस्टीकोण और जीवन जीने का तरीका बहुत महत्वपूर्ण है. करोड़ों कम कर भी लोग भिकारी सा जीवन बिता रहे हैं, और फकीरी में भी लोग आनंद और उत्साह का जीवन जी रहे हैं. ऐसे भी लोग हैं जो विपरीत परिस्थितियों में भी हँसते रहते हैं और ऐसे भी लोग हैं जो सब कुछ होते हुए भी चिंता के भार में दबे जा रहे हैं. आज शारीरिक बीमार लोगों से ज्यादा मानसिक रूप से बीमार लोगों की है. मनो-चिकित्सकों के पास समय ही नहीं है. हर दूसरा व्यक्ति अपने अंदर एक नए जीवन की चाह में मनोवैज्ञानिकों के चक्कर लगा रहा है. आज की बेस्ट-सेलर किताबें वाही हैं जो मनोविज्ञान पर आधारित हैं और उनके नाम भी कुछ ऐसे ही हैं जैसे "सफलता कैसे" "आनंद से कैसे जियें"  "जीवन में उत्साह कैसे भरें". इन सभी किताबों को पढ़ कर भी आप को जीवन में आनद लाने का रास्ता नहीं मिलेगा. मनोविज्ञान के पास भी कोई उपाय नहीं है. आज का मनोविज्ञान यह कहता है की हर व्यक्ति को जीवन के हर पल का आनंद उठाना चाहिए और इस हेतु उसको अपने अंदर बचपन, जवानी और परिपक्वता तीनों एक साथ रखनी चाहिए. परन्तु ये तीनों एक साथ कैसे आएं? मनोविज्ञानिक कहते हैं की उम्र  के साथ कई बार हम अपने बचपन के जोश, उत्साह, उमंग और उल्लास को गवां देते हैं. भारतीय संस्कृति एक ऐसी संस्कृति है जिसमे हर समस्या का समाधान भी है. होली जैसा एक ऐसा त्योंहार है जिसमे लोग एक बार के लिए अपनी उम्र भूल कर खुल कर अपना बचपन फिर से जी सकते हैं और उलास से फिर से मिटटी और पानी से खेल सकते हैं. यह वह त्योंहार है जो हमें हमारे अंदर छुपे हास्य कलाकार, व्यग्ंय कलाकार, बाल कलाकार और हमारे मौलिक स्वरुप को आगे लाने का मौका देता है. होली की रम्मत में आप अच्छे अच्छे फ़िल्मी  कलाकारों को मात देने वाली वेशभूषा, अभिव्यक्ति और अदाकारी देख सकते हैं. होली के गीतों को झूम के गाते हमारे युवा घंटों तक एक साथ नाचते रहते हैं और एक अनोखे आनंद का लुत्फ़ उठाते हैं. सही तो यही है की इस जिंदगी का बेहतरीन आनंद उठाना ही हमारी संस्कृति की हर परंपरा में छुपा है.


शीट ऋतू की जगह पर बसंत ऋतू का आगमन हो रहा है और होली जैसे रंगों के त्योंहार से हम उसका स्वागत करते हैं. बसंत ऋतू का अपना ही अलग आनंद है. जीवन में हम सब लोग आनंद और उल्लास से जियें इस हेतु आनंद के त्योंहार से ही इस ऋतू का स्वागत होना चाहिए. रेगिस्तान में पहले पानी की कमी के कारण लोग सर्दियों में स्नान नहीं किया करते थे. होली के अवसर पर वे मिटटी से खेलते थे और फिर स्नान करते थे. ये एक ऐसी परम्परा थी जिसका कोई मुकाबला नहीं है. मिटटी शरीर को स्पर्श कर उसमे ऊर्जा भर देती है और फिर स्नान करने से एक नयी ताजगी आ जाती है. आज मिटटी का लेप सिर्फ प्राकृतिक चिकित्सा का भाग रह गया है. लेकिन मिटटी के लेप और फिर स्नान की इस परंपरा का अद्भुत महत्त्व वैज्ञानिकता की कसौटी पर भी खरा है. 

आईये कामना करें की हर दिन उत्साह और आनंद से सराबोर रहें और हर बालक प्रह्लाद सा बन जाए. आईये कामना करें की अद्भुत भारतीय परम्पराओं को उनकी जड़ों के साथ संजो कर रखें और हमारे भविस्य में हमारी अगली पीढ़ी को इस अद्भुत ज्ञान का खजाना मिल सके. आईये होली के त्योंहार पर हम सभी अपने अंदर भर गए  अहम भाव, तमो प्रविृत और घमंड  को निकाल बाहर करें और अपने अंदर उत्साह, उमंग, बच्चों के जैसा जोश भर लेवें और मिटटी और पानी से नजदीकी फिर से बढ़ाएं. इस रंगों के त्योंहार से सबक ले कर अपने जीवन में ख़ुशी और आनंद के रंग भर लेवें. 

लुप्त होता परंपरागत ज्ञान

लुप्त होता परंपरागत ज्ञान

भारत ज्ञान और तकनीक का अनोखा भण्डार है जहाँ पर हर घर और हर परिवार किसी  किसी परंपरागत ज्ञान की वर्षों से जमा पूंजी का मालिक हैहिमाचल प्रदेश में वहां के बाशिंदे ७५०० तरह की जड़ी-बूटियों और पेड़ों का उपयोगजानते हैं (शायद थे क्योंकि अब ये ज्ञान लुप्त हो रहा है). लुप्त होते भारत को समझना है तो शहरों को छोड़ियेगावोंमें जाइएआपको आज भी प्राचीन भारतीय परम्पराओं के अवशेष मिल जाएंगेमहिलायें पीपल के पेड़ को परिक्रमालगा कर पानी देती हुई मिल जायेगीयह एक परम्परा है और इस परंपरा का वैज्ञानिक आधार आज समझ  रहाहैकिस प्रकार से भारत में तुलसीपीपलबेलऔर इस प्रकार के अन्य पेड़ों को बचाया गया और उनको सुरक्षितरखने के लिए कितनी समृद्ध परम्पराएँ विकसित की गयीएक पेड़ अपने जीवन काल में लगभग ६० लाख Rs. काफायदा पहुंचता हैऔर आज के महानगरों में पेड़ों को काट कर सड़कें और भवन बनाये जा रहे हैबहुत काम लोगपेड़ों को उतनी अहमियत देते हैं जितनी की भारत की परम्पराएँ देती हैंजब आईआईएम अहमदाबाद का निर्माण होरहा था तो फ़्रांस के आर्किटेक्ट लुइ कान के कहे अनुसार भवन का निर्माण हो रहा था और एक पेड़ को काटा जाना था.श्री विकर्म साराभाई को जब इसका पता चला तो उन्होंने बिल्डिंग का नक्शा बदल दिया पर पेड़ नहीं काटने दिया.पेड़ों के प्रति ऐसी श्रद्धा सिर्फ भारतीय परम्पराओं से ही  सकती है.
मैं ऐसे अनेक बुजुर्ग लोगों से मिल चूका हूँ जो पूरी जिंदगी में कभी भी बीमार नहीं पड़े और कभी भी उनको अंग्रेजीदवाई नहीं लेनी पड़ीमौसम के बदलते ही वे लोग अपने खान पान में आवश्यक संशोधन कर लेते थे और ये संशोधनपरम्पराओं के रूप में उनके जीवन में जुड़े थेजब अमेरिका में भारत के ज्ञान पर आधारित १३१ योग पेटेंट हो चुकेथेनीम और हल्दी के पेटेंट की बात चल रही थी तो भारत सरकार की नींद खोलने के लिए WIPO ने भारत सकरारसे अनुरोध किया और फिर मजबूर हो कर भारत सरकार ने २००१ में भारत्तीय परम्परागत ज्ञान के रजिस्ट्रेशन काकाम शुरू कियाआज तक ८०००० से ज्यादा आयुर्वेदी नुस्खों  का रजिस्ट्रेशन कर के उनका  विदेशी भाषाओं मेंअनुवाद किया गया हैभारत के अद्भुत परम्परागत ज्ञान के आधार पर अब तक . करोड़ पेजों की जानकारीभारत के परम्परागत ज्ञान के कार्यालय में जमा की जा चुकी है और ये भारतीय ज्ञान का सिर्फ एक अंश मात्र है.१५०० से ज्यादा योग और आसनों का ज्ञान भी रजिस्टर किया गया है.
हर परम्परा का वैज्ञानिक आधार
दरअसल भारत में विज्ञान को आम जीवन में उतारने के लिए उसको परम्पराओं में ढाला  गया था और इसी कारणविज्ञान यहाँ आम जीवन में इतना घुल- मिल गया है की विज्ञान को जीवन से अलग कर के देखने का प्रयास नहींकिया गया. . हमारे जीवन में काम आने वाली हर वस्तु को किसी  किसी परम्परारा से जोड़ दिया गयासमय कीआंधियों के बीच परम्पराएँ तो जिन्दा रह गयी पर उनके पीछे का वैज्ञानिक विमर्श लुप्त हो गयाआज हमें यहसमझ  रहा है की सर पर तिलक लगाने और चोटी रखने के एकुप्रेस्सर और अन्य वैज्ञानिक फायदे हैंआज हमको समझ  रहा है की सूर्यास्त से पहले भोजन करने से क्या वैज्ञानिक फायदे हैंलेकिन आज हमने अपनी अनेकपरम्पराओं को गवा दिया है जो की शायद किसी  किसी वैज्ञानिक आधार पर स्थापित की गयी थी.

कृषि की जो समृद्ध परम्परा भारत के किसान जानते थे वो आज भारत में लुप्त हो गयी है लेकिन वही व्यवस्थाविदेशों में आर्गेनिक कृषि के नाम से शुरू हो रही है और अब विदेशों से भारत में आएगी.
देश को तोड़ने का इतिहास और लूट मचाते विदेशी
अंग्रेजों ने भारत में  कर सबसे पहले ऐसे इतिहास विशेषज्ञ तैयार किये जो भारत के लोगों को आपस में लड़ाने केलिए इतिहास लिखने लगे और यह व्यवस्था आज भी जारी हैजातियों को आपस में लड़ाने के लिए ही इतिहासलिखा गयाआज हम आपसी लड़ाई के चक्कर में अपना अद्भुत ज्ञान और परम्पराएँ छोड़ चुके हैंआज हमारे देशके अद्भुत ज्ञान को ले जा कर विदेशी कम्पनियाँ पेटेंट करवा रही है.
भारतीय वैज्ञानिक (लोहार,सोनार आदि)  के लिए बजट में कोई सहायता  नहीं
भारत में लोहारसोनारमोचीआदि अनेक समूह हैं जिनको  आज ‘ दलित’  के रूप में सम्बोधित किया जाता हैयेवो लोग हैं जिनके पास अद्भुत वैज्ञानिक ज्ञान और हुनर था जो अब  धीरे धीरे लुप्त हो रहा है.  यह अफ़सोस की बातहै की भारत सरकार मेटलर्जी शोध के लिए करोड़ों का आबंटन दे सकती है लेकिन भारत के मेटल एक्सपर्ट्स (सोनार,लोहार आदिको कोई सहायता या संरक्षण नहीं प्रदान कर सकतीनतीजा होगा की उनकी सदियों की समृद्धपरम्परा लुप्त हो जायेगी और इस अद्भुत ज्ञान और कला के बारे में हमारी अगली पीढ़ी सिर्फ किताबों में पढ़ेंगी.भारत के अद्भुत कारीगरों और दक्ष वैज्ञानिकों को ‘दलित’ व्  'पिछड़े'  की उपाधि दी गयी और उनको उनकी समृधि  (तकनीकी ज्ञानके लिए नहीं बल्कि उनकी आर्थिक गरीबी के लिए सम्मानित किया गयाउनको कभी भीउनके तकनीकी ज्ञान के लिए प्रोत्साहन नहीं दिया गयाउनको यह लालच दिया गया की वे सरकारी अधिकारी बनजाएंगेअद्भुत ज्ञान धीरे धीरे खत्म हो गयायह प्रक्रिया आज भी जारी हैहर सरकार आई और गयीपर नीतियांनहीं बदलीकोई भी उनको कारीगरया कलाकार या  वैज्ञानिक नहीं मानना चाहताआज भी कोई उनके विज्ञानं कोनहीं स्वीकार कर रहाभारत का लोहार आज से हजारों साल पहले भी बिना जंग का लोहा तैयार कर सकता था,लेकिन उसको कोई प्रोत्साहन नहीं मिला.   जो लोग भारत को विभाजित और विखंडित कर रहे थेवे ही भारत केअद्भुत ज्ञान को बटोर के ले जा रहे थेपछले  दशकों में भारत का अद्भुत ज्ञान हर क्षेत्र में भारत से लुप्त हो रहा हैऔर भारत के नेतृत्व को इसका पता भी नहीं चल रहा है.

थार के अद्भुत कुटीर उद्योगों को जरुरत एक सहारे की

थार के अद्भुत  कुटीर उद्योगों को जरुरत एक सहारे की 

थर के मरुस्थल में सिर्फ मिटटी ही नहीं सृजनशीलता भी बहुत है. उस अद्भुत सृजनशीलता को एक सहारे की जरुरत है. अफ़सोस है की कोई सहारा देने वाला नहीं है. अगर सही सहारा मिले तो ये अद्भुत कुटीर उद्योग न केवल लोगों के लिए रोजगार के साथन बन जाएंगे बल्कि देश के लिए विदेशी मुद्रा कमाने के स्रोत भी बन जाएंगे. थर की मज़बूरी यही है की इस अद्भुत क्षेत्र को संवारने  वाले जोहरी यहाँ नहीं हैं. 

पूरी दुनिया आज बौद्धिक सम्पदा के सहारे चल रही है. दुनिया की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली कंपनियों में से एक एप्पल नामक कम्पनी कोई उत्पादन नहीं करती है. उसके पास इतनी बौद्धिक सम्पदा है की वो उस समपा के सहारे कमाई करती जाती है. यही हाल  अन्य बड़ी कंपनियों का है. जिस जिस प्रदेश के पास बौद्धिक सम्पदा हैं वे निहाल हो गए हैं जैसे की शेम्पेन, स्कॉच व्हिस्की आदि के कारण उन स्थानों की चांदी हो गयी है जहाँ पर ये वस्तुएं बनती हैं. ज्योग्राफिकल इंडिकेशन नामके रजिस्ट्रेशन करवाने के बाद एक वस्तु वहीँ बन सकती है जहाँ के लिए रजिस्टर्ड है और फिर उसकी कीमत दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जाती है. बीकानेर से अभी तक सिर्फ एक ही उत्पाद रजिस्टर्ड है - भुजिया - जबकि इस प्रदेश में अनेक ऐसे कुटीर उद्योग हैं जो इस प्रकार से रजिस्टर करवाये जा सकते हैं और अगर ऐसा होगा तो फिर रेगिस्तान के कुटीर उद्योगों का कायाकल्प हो जाएगा. प्रश्न है इस हेतु शुरुआत कब और कैसे हो. यह सारी दुनिया जानती है की बीकानेर की लोक कला, लोक संगीत, चित्रकारी, खाद्य और वस्त्रों से सम्बंधित कुटीर उद्योग आदि वाकई अद्भुत हैं. लेकिन उनको रजिस्ट्रेशन करवाने हेतु कोई प्रयास नहीं कर रहा है और इसी कारण बीकानेर के कलाकारों को वो आय और वो सम्मान नहीं मिल पा रहा जिसके वे हकदार हैं. हम सभी  जानते हैं की सरकारी विभाग और राजनेता अपने ढर्रे से काम करते हैं और उनसे सहारे की अपेक्षा करना ज्यादती होगा. लेकिन बीकानेर के स्वयं सेवी संगठन और समाज सेवी लोग काफी सक्रीय हैं और उम्मीद की जानी चाहिए की वे कुछ पहल करेंगे. डर तो यही लगता है की कहीं तब तक ज्यादा देर न हो जाए. 

सांगानेरी प्रिंट का उदहारण प्रासंगिक है. जब २००३ में सांगानेरी प्रिंट उद्योग बंद होने के कगार पे था तब श्री विक्रम जोशी और कुछ साथियों ने मिल कर इस अद्भुत कला को बचाने के लिए प्रयास किया. उन्होंने ६० पेज का प्रतिवेदन तैयार कर के सरकार को सौंपा और उनको २/१२/२००८ को ज्योग्राफिकल इंडिकेशन मिल गया. आज पूरी दुनिया में सांगानेरी प्रिंट की मांग हो रही है और विक्रम जोशी और उनके साथियों को फुर्सत ही नहीं मिल पा रही है. पूरी दुनिया आज उनको सलाम कर रही है. ये तो सिर्फ शुरुआत है, आप कल्पना करिये आने वाले वर्षों में उनको अपने इन प्रयासों का कितना फायदा मिलेगा. श्री विक्रम जोशी का सभी ने सहयोग किया और वो एक अद्भुत काम करने में कामयाब रहे और हजारों लोगों को कलापूर्ण रोजगार और नाम दिलवाने में समर्थ हुए (श्री विक्रम जोशी को बीकानेर में स्थित आर्काइव्स से भी सहयोग मिला था, लेकिन बीकानेर में से कोई भी विक्रम जोशी जैसा  व्यक्ति निकल के नहीं आया है). 


प्रतापगढ़ (राजस्थान) में ६ परिवार थावा कला नामक अद्भुत कला में दक्ष हैं. ये लोग सोने के गहने बनाते हैं जिनमे कांच पर सोने की कलाकारी की जाती है. सही मार्गदर्शन और सहारा मिलने से आज यह कला एक रजिस्टर्ड ज्योग्राफिकल इंडिकेशन है और इस रजिस्ट्रेशन के कारण इसकी पूरी दुनिया में मांग है. इसकी कीमत भी बहुत बढ़ गयी है. कहने का मतलब है की इस कला को इसका वजूद मिल गया. थर में थावा जैसी अनेक कलाएं हैं  जैसे मीनाकारी आदि. उनको सहारा कब और कैसे मिलेगा - सिर्फ भविस्य ही बताएगा. 

बीकानेर में कोटा डोरिया नाम से साड़ियां बनती है. जबकि कोटा डोरिया साड़ियां सिर्फ कोटा में ही बन सकती है और उनकी पूरी दुनिया में मांग है. बीकानेर में अद्भुत कला में दक्ष डोरिया साडी बाने वाले लोगों को कब एक पहचान मिलेगी - भविष्य ही जाने. इसी प्रकार से बीकानेर की बंधेज, मांडना और इस क्षेत्र की अन्य कला भी अपना रजिस्ट्रेशन करवा के अमर हो सकती है. 

बीकानेर में बानी सुखी सब्जियों  (जैसे की खेलरे ) आदि  में अद्भुत स्वाद होता है और उनको अगर रजिस्टर करवा कर उनको ज्योग्राफिकल इंडिकेशन दिलाया जाएगा तो उनकी पूरी दुनिया में मांग शुरू हो जायेगी और फिर तो इस क्षेत्र में जुडी महिलाओं की आय बहुत बढ़ जायेगी. इसी प्रकार यहाँ की महिलाओं द्वारा बनाया जाने वाला खिचिया, गुनिया आदि अपने आप में अद्भुत हैं. ये सभी उत्पाद अपनी अलग पहचान पा  सकते हैं अगर इस दिशा में कोई प्रयास शुरू हों. 

बीकानेर में मिश्री बनाने वाले लोग अद्भुत हैं और इस मिश्री के स्वास्थ्य लाभ भी अद्भुत हैं. चिड़ावा और डूंगरगढ़ के पेड़े अद्भुत हैं. बीकानेर के पंधारी और सूरसाहि लड्डू अद्भुत होते हैं, बीकानेर की सुखी सब्जियों  और सूखे फलों का अद्भुत स्वाद होता है (जैसे सांगरी , भूंगड़ी आदि). बीकानेर की मिनिएचर पेंटिंग, उस्ता कला, पत्थर की नक्काशी आदि अद्भुत हैं प्रश्न है की इनको पहचान कैसे दिलवाएं. जल्दी जागिये, नहीं तो एक दिन  बीकानेर के लोक गीत, लोक कलाएं, और यहाँ के लोगों के हुनर किसी विदेशी कम्पनी के नाम रजिस्टर हो जाएंगे. 

स्वास्थ्य से पहले संस्कृति

स्वस्थ रहने के लिए सांस्कृतिक प्रदुषण से बचें 

(विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष) 
स्वास्थ्य से पहले संस्कृति 

७ अप्रैल को विस्व स्वास्थ्य दिवस है. आप भी कमर कस कर अपना और अपने प्रिय जनों का स्वास्थ्य बचाने के लिए प्रयास करें. आज सबसे ज्यादा खतरा संस्कृतक प्रदुषण से है. स्वास्थ्य सम्बन्धी सभी समस्याएं भी सांस्कृतिक प्रदुषण के कारण हो रही है. 

अगर आप वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन के डेटा देखेंगे तो आप पाएंगे की दुनिया में हर साल ५६० लोगों की मृत्यु होती है जिनमे से निम्न कारणों / बीमारियों के कारण सबसे ज्यादा मौतें होती हैं.: - 
१. ह्रदय आधात और दिल के दौरे से मौत : १५० लाख
२. सांस और फेफड़े सम्बन्धी बीमारियों से मृत्यु : ७५ लाख 
३. एड्स के कारण मृत्य : १५ लाख
४. पेट की बीमारियों के कारण मृत्य : १५ लाख 
५. शुगर की बीमारी के कारण मृत्यु : १३ लाख 
६ . सड़क दुर्घटना से मृत्यु : १३ लाख 

आप देख सकते हैं की विकसित देश भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल को कर हृदय आधात और ऐसी बीमारियों की गिरफ्त में जाते जा रहे हैं और वहां इन बीमारियों के कारण सबसे ज्यादा मौतें होती है. उन्मुक्तता की संस्कृति और सांस्कृतिक   प्रदुषण के कारण एड्स की बिमारी फ़ैल रही है और उससे ज्यादातर अल्प विकसित देश प्रभावित हो रहे हैं. भारत अपनी संस्कृति और अपनी विरासत के कारण इन सभी बीमारियों से बचा हुआ है. आध्यात्म आधारित संस्कृति के कारण ही यहाँ के लोग स्वस्थ है और इन बीमारियों से बचे हुए हैं. 
उपभोग आधारित उच्छृखलता की संस्कृति 
आज हर तरफ एक प्रयास हो रहा है की किसी भी तरह से भारतीय संस्कृति की दिवार को तोड़ी जाय. शिक्षण संस्थाओं को मीठा जहर परोसा जा रहा है और आप और हम को पता भी नहीः चलेगा की कब पुस्तकों में ये लिख दिया जाएगा की "मांस खाना स्वस्थ के लिए अच्छा होता है" और "घी खाना स्वास्थ्य के लिए ख़राब होता है". इस संस्कृतक प्रदुषण के पीछे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का आर्थिक ढांचा है. उनको तभी मुनाफा मिलेगा जब भारत के १२५ करोड़ लोग उनके उत्पादों को खरीदेंगे. वो तभी संभव होगा जब यहाँ के लोग यहाँ की स्वस्थ जीवन शैली छोड़ कर पश्चिमी संस्कृति और उन्मुक्तता अपनाएंगे. तभी बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के वे उत्पाद बिकेंगे जो अभी पश्चिमी देशों और बैंकॉक जैसे देशों में ही ज्यादा बिकते हैं. 


हर व्यक्ति, हर वस्तु, हर पल को उपभोग की नजर से देखने वाली एक ऐसी संस्कृति अपने पैर पसार रही है जिसके बारे में हम सोच ही नहीं रहे हैं. देखते ही देखते हमारे पैरों के निचे से जमीन खिसक जायेगी और हम अवाक रह जाएंगे. हमारी सारी व्यवस्थाएं -  स्वास्थ्य, शिक्षा, खान - पान और जीवन शैली उस संस्कृति की मार से पूरी तरह से बदल जायेगी. 
फिल्मों और शिक्षा तंत्र की मदद से हर तरफ ये प्रयास हो रहे हैं की हमारे खान, पान, जीवनशैली, संस्कृति, और हमारे मूल्यों को बदला जाए. आप भी इस बात को महसूस कर सकते हैं. जब आप अपने बच्चों को टाई पहना रहे हैं और धोती कुरता या साडी पहनने से मना  कर रहे हैं तो आप भी उस गिरफ्त में शामिल हैं जो आप को आपके ही साथियों के द्वारा एक नयी गुलामी की तरफ धकेलने का प्रयास कर रहे हैं. आप इस बात को शायद न माने लेकिन भारत का प्राचीन ज्ञान पूरी तरह से विज्ञानं पर आधारित था और यहां की सांस्कृतिक विरासत किसी व्यक्ति को स्वस्थ और आनंद के साथ जीवन के चरम उद्देश्य की तरफ ले जाने के लिए प्रयाप्त थी. आज हमारी नयी पीढ़ी  हमारे पुराने रीतिरिवाज को तिरस्कार की निगाह से देख रही है. गुजरात और राजस्थान के कुछ भागों में अभी भी सुबह सुबह लोग मंदिर जाते नजर आ जाते हैं लेकिन शिक्षित  लोग तो भारतीय संस्कृति से परहेज करने में ही अपनी विद्वता मान रहे हैं. आज पूरा विश्व सांस्कृतिक प्रदुषण की बिमारी को झेल रहा है. इस प्रदुषण को फैलाने वालों के साथ सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियां और पूरा वित्त तंत्र है क्योंकि सबके आर्थिक हित जुड़े हैं. आप को पता ही नहीं चलेगा कब आप के ही बच्चों को आप अपने स्वयं के प्रति तिरस्कार पैदा करने वाले लोगों के पास शिक्षा के लिए भेज देंगे और जब आप को इस बात का पता चलेंगे तब तक  बहुत देर हो चुकी होगी . 

अद्वितीय भारतीय सांस्कृतिक विरासत पर एक श्लोक काफी है  : - 
युग  सहस्त्र  योजन  पर  भानु  (भानु का अर्थ होता है सूरज) 
1 युग  = 12000 साल  
 1 सहस्त्र  = 1000 
 1 योजन  = 8 मील  
 युग  x सहस्त्र  x योजन  =  12000 x 1000 x 8 मील  = 96000000 मील  
 1 mile = 1.6kms 
96000000 miles = 96000000 x 1.6kms = 1536000000 kms 
जो की सूरज की पृथ्वी से दुरी है.  इससे ज्यादा वैज्ञानिक गणना कैसे हो सकती है? 

बिजली पानी है नहीं - पर हम चले मंगल ग्रह

अंतरिक्ष यात्रा : विकसित देशों के तथा-कथित शोध अभियान और गरीब देशों की भेड़ चाल



(अंतरिक्ष यात्रा दिवस पर विशेष)

 

कहते हैं उतने पाँव पसारने चाहिए जितनी लम्बी चादर हो. आज विकसित देशों में बहुत से मामलों पर शोध हो रही है - परन्तु क्या हमको भी उस प्रकार के कार्य करने चाहिए? उनकी प्राथमिकताएं हमसे अलग हैं. हम को तो सड़क और स्कुल बनाने के लिए भी कर्ज लेना पड़ता है. ऐसा ही एक क्षेत्र है अंतरिक्ष पर्यटन का.

१२ अप्रैल १९६१ को किसी भी  मानव ने (रूस के श्री यूरी गगारिन) ने पहली बार अंतरिक्ष में प्रवेश किया. इस उप्लभ्धि को याद रखने के लिए १२ अप्रैल को मानव की अंतरिक्ष यात्रा दिवस के रूप में मनाया जाता है. यह दिन वाकई बहुत महत्वपूर्ण है. अंतरिक्ष की यात्रा विज्ञानं की सबसे बड़ी उप्लाभ्दियों में से एक है. यह मानव की शानदार तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन है. भारत के राकेश शर्मा ने भी अप्रैल १९८४ में अंतरिक्ष की यात्रा की और लगभग ८ दिन अंतरिक्ष में गुजारे. जब उनसे प्रधानमंत्री ने पूछा की अंतरिक्ष से भारत कैसा दीखता है तो उनका जबाब था : "सारे जहाँ से अच्छा"

 

अंतरिक्ष की फतह मानव के लिए शोध के नए क्षेत्र खोल रही है. फिजिक्स, बायो-मेडिकल और बायो-केमिस्ट्री के कई प्रयोग जो धरती पर संभव नहीं है वे प्रयोग अंतरिक्ष में किये जा सकते हैं.  आने वाले समय में अंतरिक्ष में हॉस्पिटल्स (क्योंकि अंतरिक्ष में बैक्टीरिआ और वाइरस नहीं होते हैं)  और होटल्स भी हो पाएगी और अंतरिक्ष एक पर्यटन  का विषय बन  जाएगा (इस क्षेत्र को स्पेस टूरिज्म कहा जा रहा है). विकसित देशों में  तो स्पेस टूरिज्म एक नया क्षेत्र बन गया है. वर्ष २००१ में  २० मिलियन डॉलर चूका कर अंतरिक्ष में घूमने वाले डेनिस टिटो पहले स्पेस पर्यटक (टूरिस्ट) थे. उनके बाद तो अब एक झड़ी सी लग गयी है. अब तक ७ पर्यटकों ने स्पेस पर्यटन किया है लेकिन अब पर्यटन की लागत बहुत बढ़ गयी है. लेकिन आने वाले समय में सोलर ऊर्जा के क्षेत्र में क्रांति आने से स्पेस यात्रा भी सस्ती हो जायेगी और इस क्षेत्र में फिर से लोगों का रुझान बढ़ जाएगा. आज एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विद्यार्थियों का पसंदीदा क्षेत्र है और हर विद्यार्थी इस क्षेत्र में शोध करना चाहता है. उम्मीद की जानी चाहिए की इस क्षेत्र में बढ़ती लोकप्रियता के कारण इस क्षेत्र में कुछ नए शोध अंतरिक्ष यात्रा की लागत को बहुत कम कर देंगे और लगता है की आने वाले समय में इस क्षेत्र में पर्यटन का एक नया क्षेत्र खुल जाएगा. स्पेस एडवेंचर्स, बोइंग, वर्जिन एयरलाइन्स आदि कई कम्पनियाँ इस क्षेत्र में शोध कर रही हैं. खैर - अगर निजी क्षेत्र इस तरफ पैसा लगाये तो वो अलग बात है और सरकारें इस तरफ पैसा लगाए तो वो अलग बात है. निजी क्षेत्र अपना पैसा वसूल भी लेते हैं जब वो एक एक यात्री से लाखों रूपये इस विलासिता के क्षेत्र में मांगते हैं. वो दिन दूर नहीं जब धनवान लोग शादियां रचाने अंतरिक्ष जाएंगे. खैर उस विलासिता के क्षेत्र के बारे में नहीं हम तो अपने देश की प्राथमिकताओं की बात करेंगे.   

 

शांत अंतरिक्ष से खतरनाक  अंतरिक्ष

जहाँ जहाँ मानव के पाँव पड़ते हैं वहा वहा पर प्रदुषण फैलता है. जब मानव ने जब समुद्र पर पाँव रखा तो वहां भी गंदगी फैला दी,  हिमालय पर पाँव रखा तो वहां भी प्रदूषण फैला दिया  और अब अंतरिक्ष भी नहीं बचा. अंतरिक्ष में लाखों अवशिष्ट टुकड़े तैर रहे हैं और यह संख्या बढ़ती जा रही है. १९५८ में अमेरिका ने वैनगार्ड फर्स्ट नामक उपग्रह छोड़ा था जो कब का बंद भी हो गया परन्तु वह २४० साल अंतरिक्ष में तैरता रहेगा. उसके बाद रूस, चीन, और अमेरिका ने दुनिया भर के हथियार और सामान अंतरिक्ष में छोड़ दिए. ये सब सामान वापस तो लाया जा नहीं सकता और अंतरिक्ष में हम "स्वच्छ भारत" अभियान नहीं चला सकते. ये अवशिष्ट पदार्थ आने वाले समय में हम सबके लिए बड़ी मुसीबत बनेगे. जब भी कोई रॉकेट अंतरिक्ष में जाएगा - उसको इन अवशिष्ट टुकड़ों से बड़ा खतरा है. १९६९ में जापान के एक नाविक पर आसमान से रुसी रॉकेट का एक अवशिष्ट टुकड़ा आकर गिर गया था. इस प्रकार के हादसे भविष्य में ज्यादा होंगे.

गाव-गाव बिजली पानी देने के लिए पैसे नहीं - पर हम चले मंगल ग्रह
अंतरिक्ष से सम्बंधित शोध पर सिर्फ नासा ही सालाना  १००० अरब से ज्यादा रूपये खर्च कर देता है अतः अंतरिक्ष की शोध पर जितना रुपया खर्च हो रहा है उस राशि से अगर गरीबी, बिमारी और बेरोजगारी के खिलाफ लड़ाई लड़ी जाए तो दुनिया की साड़ी समस्याएं मिट जाए. भारत भी सालाना ७० अरब से ज्यादा रूपये अंतरिक्ष शोध पर खर्च करता है. हमारा सीना उस समय गर्व से फूल गया था जब सितंबर २०१४ में  मंगलयान ने मंगल की परिक्रमा शुरू कर दी थी. भारत का मंगल यान प्रोजेक्ट सिर्फ ४५० करोड़ रूपये में सफल हो गया जबकि विकसित देशों में इसका कई गुना खर्च हो जाता है. लेकिन फिर भी प्रश्न है की क्या भारत जैसे देशों को इस प्रकार के प्रोजेक्ट को प्राथमिकता देनी चाहिए? क्या भारत सरकार को इस प्रकार के बजट के लिए संसाधन आबंटिक करने के लिए हम बधाई देवें? कम से कम भारत जैसे  देश को तो इस दौड़ में शामिल न होकर देश की प्राथमिकताओं पर पैसा खर्च करना चाहिए ताकि ताकि उनको मदद मिले जिनको वाकई सरकारी मदद की जरुरत है जैसे की  वो बालक जो आज शिक्षा से वंचित है या वो बालिका जो कुपोषण में जी रही है या वो मरीज जो बिना इलाज-दवा के बेमौत मर रहा है. आज भी हमें यह समझना पड़ेगा की हमारे देश की पहली प्राथमिकता बेरोजगारों को रोजगार, भूखों को रोटी, बीमार को इलाज, और गावों को बिजली पानी और सड़कें देना है न की अंतरिक्ष की यात्रा.

जंगल बचाओं, पेड़ बचाओं, पशु-पक्षी बचाओ

जंगल और जानवरों का कॉर्बेट(वो शिकारी जिसको सरकार सलाम करती है)

(१९ अप्रैल को श्री जिम कॉर्बेट की पुण्य तिथि पर विशेष)

कुमाऊं का लाडलाएक समय था जब इंसान बाघ और अन्य जंगली जानवरों से डरा करता था. एक समय था जब उन लोगों की बड़ी मांग थी जो की आदमखोर शेर और बाघ को मार सके. एक समय था जब शिकार का उद्देश्य मानव जीवन को बचाना था (न की आज की तरह एक घटिया शौक). ऐसा ही एक शिकारी था जिसको आज भी सब लोग सम्मान से याद करते हैं. वो शिकारी था जिम कॉर्बेट जिम कॉर्बेट का जन्म भारत में  नैनीताल में हुआ. उसने अपना बचपन कुमाऊं में बिताया और कुमाऊं के लोगों से जंगल और जानवरों का प्रेम प्राप्त किया. कुमाऊं के लोगों की तरह श्री कॉर्बेट भी जंगली जानवरों को उनकी आवाज से पहचान  लेते  थे.  वो सच्चे अर्थों में जंगल और जंगली जानवरों का प्रशंसक था. उसने अपने जीवन काल में जंगलों और जंगली जानवरों पर अनेक पुस्तकें लिखी और जानवरों के लिए विशेष प्रयास किये.

नरभक्षी जानवरों से जानवर-भक्षी इंसानों की तरफ : -एक समय था जब इंसान नर-भक्षी जानवरों के भय से त्रस्त रहता था. पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोग रात में घरों से भहर नहीं निकलते थे. हर तरफ नर-भक्षी बाघ और अन्य जंगली जानवरों का खौफ था. हालाँकि श्री कॉर्बेट ने अपने अनुभव से यह साबित किया था की वो ही बाघ नरभक्षी बन जाते हैं जो किसी बिमारी या चोट से ग्रस्त होते हैं. बिमारी की हालत में उनको शिकार मिलना मुश्किल  हो  जाता है और वे नरभक्षी बन जाते हैं. श्री कॉर्बेट ने १२०० इंसानों को मारने वाले नरभक्षी बाघों को मौत के घाट उतार दिया था. लेकिन कॉर्बेट के ही प्रयास से भारत में नेशनल पार्क की स्थापना हुई (जिसका नाम आज जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क है). श्री कॉर्बेट ने  ३० से ज्यादा आदमखोर  बाघ और तेंदुओं का शिकार किया लेकिन  आखिर में  जंगलों और जानवरों को बचाने के लिए प्रयास किये. आज फिर से कॉर्बेट की जरुरत आ पड़ी है. आज जंगल और जानवर दोनों का जीवन खतरे में है. सरकार के प्रयासों से बाघों की जनसँख्या बढ़ रही है (सरकारी आंकड़ों के अनुसार बाघों की संख्या पिछले ५ सालों में १७०० से बढ़ कर २३०० हो गयी है) लेकिन वो बाघ क्या खाएंगे? (बाकी जानवर तो खत्म हो रहे हैं) जंगलों का ख़त्म होना और जंगली जानवरों का लगातार घटना एक चिंता का विषय है.  एक समय था जब जंगल, पेड़ और जंगली जानवर हुआ करते थे. अब वे लगातार घट रहे हैं. मैंने अपने पिताजी से कस्तूरी मृग की कहानिया सुनी थी  - अब तो कस्तूरी मृग ही नहीं बचे हैं. एक समय ऐसे घनघोर जंगल हुआ करते थे जिनमे दिन में भी अँधेरा रहता था - अब ऐसे जंगल दुर्लभ हो गए हैं. जंगलों की सुरक्षा के नाम पर फारेस्ट ऑफिसर्स आदि की नियुक्ति की जाती है जो खुद ही अक्सर शिकारियों से मिले हुए होते हैं और जंगल और जानवरों को बचाने की जगह पर उनके विनाश के कारक बन जाते हैं.

जंगलों की कीमत अनमोल से बहुमूल्य बन गयीजंगल और जंगली जानवर अनमोल हैं. लेकिन आज के ज़माने में कार्बन क्रेडिट का बड़ा फायदा है. जिस देश के पास बड़े बड़े जंगल हैं वो देश उन जंगलों को बचा कर कार्बन क्रेडिट हासिल कर सकता है और इस प्रकार जंगलों से उसको कार्बन क्रेडिट के रूप में लगातार आय प्राप्त होती रहेगी. वो देश जिनके पास बड़े बड़े जंगल हैं उनको लगातार आय प्राप्त होती रहेगी और वे देश इस प्रकार बहुत ही सफल हो जाएंगे.
इंसान का हैवानी स्वरुप जानवरों की घटी जनसँख्या के पीछे सबसे बड़ा कारण उनका शिकार है. जिम कॉर्बेट भी शिकारी थे पर उनका लक्ष्य अलग था. आज कल हर होटल जंगली जानवरों का मांस परोस रहा है. लोगों में भी इसका एक फैशन बन गया  है  इंसान का हैवान के रूप में रूपांतरण आज जानवरों के लिए सबसे ज्यादा चिंताजनक है. आज इंसान लगभग हर जानवर खाने के लिए तत्पर बैठा है. एक समय था जब वनस्पति की कमी के कारण इंसान को मांस खाना पड़ता था, परन्तु आज तो मांसाहार भी एक फैशन बन रहा है.

फैशन इंडस्ट्री का सितमफैशन इंडस्ट्री जानवरों के कंकाल, खाल, दांत, और शारीर के हिस्से फैशन के रूप में प्रस्तुत कर रहा है. कोई खरगोश की खेल से पर्स बना रहा है तो कोई गेंडे व् हाथी के दांत से गहने बना रहा है तो कोई जानवरों का प्रयोग फैशन उत्पादों की लैबोरेटरी में कर रहा है.

वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फण्ड (WWF)यह अफ़सोस की बात है की अहिंसा परक देश भारत को आज अहिंसा की शिक्षा के लिए वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फण्ड (WWF)  की तरफ देखना पड़ रहा है. वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फण्ड की तरह के अनेक स्वयं सेवी संगठन आज आगे आ रहे हैं जो लोगों को पेड़ और जंगली जानवरों को बचाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. उनके प्रयास वन्दनीय हैं. भारत के लोगों को भी इस तरफ प्रयास करना चाहिए. बिश्नोई समाज का इस तरफ विशेष योगदान है.
हग एक पेड़ हग ऐ ट्री एक प्रोग्राम है जिसके द्वारा वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फण्ड पेड़ों को बचने के लिए प्रयास कर रहा है. हम सब को इस प्रयास के साथ जुड़ना चाहिए. ये लोग भी वो काम कर रहे हैं जो हम भारतीय वर्षों से करते आ रहे हैं.
हम सबको अब यह कहना ही पड़ेगा : जंगल बचाओं, पेड़ बचाओं, पशु-पक्षी बचाओ