Thursday, May 14, 2015

अमीर देश को फिर से अमीर बनाने के लिए जरुरत 'सुगम' बौद्धिक सम्पदा व्यवस्था की


(विश्व बौद्धिक सम्पदा दिवस  26 APRIL पर विशेष)

बौद्धिक सम्पदा से तातपर्य है ऐसे ज्ञान का जिसका बाकायदा व्यवस्थित लेखा उपलभ्ध हैऔर जिस व्यक्ति ने उस ज्ञान को उत्पन्न किया है उसको उस ज्ञान से लाभ प्राप्त करने का हक़हैयह ज्ञान लिखित रूप में पूरी दुनिया के सामने उपलभ्ध रहता हैबौद्धिक ज्ञान कई प्रकारका होता है जैसे - पेटेंटकॉपीराइटट्रेड-मार्कइंडस्ट्रियल डिज़ाइनभौगोलिक सूचकांक(ज्योग्राफिकल इंडिकेशन)  आदिइस प्रकार के ज्ञान को वयवस्थित रूप से रख कर पूरी दुनियामें इस ज्ञान को प्रचारित कर उससे आय अर्जित की जाती है.

पूरी दुनिया में आज बौद्धिक सम्पदा का बोलबाला हैहर तरफ कम्पनियाँसरकारेंवैज्ञानिकऔर विश्वविद्यालय बौद्धिक सम्पदा जुटाने में लगे हैंहर कंपनी अपनी बौद्धिक सम्पदा केकारण मालामाल हो रही हैवो हर देश जिसके पास बौद्धिक सम्पदा है वो मालामाल हैबाजारसे कोई भी उत्पाद खरीदिए  - पता चलेगा की किसी  किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी के पेटेंट केतहत वो माल चीन या किसी विकासशील देश की छोटी सी कम्पनी ने वो माल बनाया है.बहुराष्ट्रीय कम्पनी सिर्फ पेटेंटट्रेडमार्कऔर विपणन अधिकार रखती हैमाल को बनाने वालेलोग गरीब देशो के होते हैंमलाई मलाई तो बहुराष्ट्रीय कंपनी ही खाती हैब्रांड के पीछे अंधीदौड़ में शामिल फैशन परास्त दुनिया को नहीं मालुम की जिस कंपनी का माल वो खरीद रहे हैंवो कम्पनी सिर्फ उस माल का डिज़ाइन बना कर पेटेंट करवाती है और असल में उस उत्पाद कोबनाने वाली कंपनी कोई और है.

खैरअसल में जिन देशों की सरकारों ने बौद्धिक सम्पदा को बढ़ावा देने हेतु प्रयास किये,उनको अपने देश की तरक्की करने में मदद मिलीजिन देशों की सरकारों को संकीर्ण मुद्दों सेही फुर्सत नहीं मिलतीवो बौद्धिक सम्पदा के लिए क्या करेंगेआजादी के 66 साल बाद भीआपको हर शहर में हजारों इंस्पेक्टरऑडिटरऔर जासूस  मिल जाएंगेलेकिन पेटेंटरजिस्ट्रार नहीं मिलेगें१००० पेज के  खौफनाक इनकम टैक्स और कम्पनी कानून रट लेने वालेमहारथी चार्टर्ड अकाउंटेंट और वकील मिल जाएंगे लेकिन पेटेंटट्रेडमार्क और बौद्धिक सम्पदाको जानने वाले लोग नहीं मिलेंगेहर शहर में उद्योगों और उद्यमियों को नियंत्रित करने वाले७५ सरकारी दफ्तर मिल जाएंगे लेकिन बौद्धिक सम्पदा के ऑफिस नहीं मिलेगेंअपने ही देशके लोगों पर उनकी खुद की मेहनत की कमाई से चौथ वसूली के लिए दो दिन में प्रक्रिया पूरी होजायेगी और उस हेतु सभी सरकारी मशीनरी त्वरित काम करेगी लेकिन पेटेंट देने में ६००  दिनसे भी ज्यादा समय लगेगा और कोई सरकारी मदद नहीं होगीचौथ वसूली के लिए "सरल" औरपता नहीं क्या क्या शुरू किया जाएगा - पर बौद्धिक सम्पदा के लिए "सरल" कब आएगा पतानहीं?  जिस देश का हर आयुर्वेद  चिकित्सक १० पेटेंट बना सकता है उस देश में आज बौद्धिकसम्पदा का अकाल पड़ा हैजतना पैसा सरकार चौथ वसूली और इस प्रकार के अन्य कार्यक्रमोंपर खर्च करती है उतने में तो गाव गाव में पेटेंट ऑफिस हो जाते और हर भाषा में पेटेंट कीसुविधा हो जाती - और हर गाव वाला भी - पेटेंट बनाने की सोचताएक ऐसी सम्पदा बनतीजो अपनी ही जनता से की गयी चौथ वसूली से ज्यादा सम्पदा होतीपर सरकार की अपनीप्राथमिकताएं हैं जो कम से कम मुझे तो समझ नहीं आती.


हमारे पडोसी देश चीन में . लाख पेटेंट एप्लीकेशन दर्ज हैं१२ लाख के करीब इंडस्ट्रियलडिज़ाइन की अप्प्लिचटिओन्स् दर्ज हैं और बौद्धिक सम्पदा के हर क्षेत्र में वो हमसे १० से २०गुना आगे हैंहम भी उससे आगे हैं कुछ क्षेत्रों मेंजैसे - कानून - चीन के पेटेंट कानून में सिर्फ७० धाराएं हैं और वो सिर्फ  पेज का हैऔर हमारा पेटेंट कानून १७० धाराओं और उप-धाराओंके साथ १०० से ज्यादा पेज का है (लभभग कानून के हर क्षेत्र में हम हर देश को इसी तरह मातदेते हैं - इसके लिए हमारे कानून निर्माता बधाई के पात्र तो नहीं है - फिर  क्या सोच कर वेइतनी मेहनत कर बड़े बड़े और मुश्किल कानून बनाते हैं? - राम जाने). . चीन में पेटेंट ऑफिसकी हर शहर में शाखा है और बहुत मार्गदर्शन प्रदान किया जाता है और हमारे पेटेंट ऑफिस कामुख्यालय कोलकाता में है और उसकी सिर्फ तीन शाखाएं हैं और कई काम तो सिर्फ कोलकाताऑफिस से ही हो सकते हैंचीन में हर विश्वविद्यालय में बौद्धिक सम्पदा की पढ़ाई होती है,हमारे देश में गिने चुने ऐसे विस्वविद्यालय हैं जहाँ पर बौद्धिक सम्पदा की पढाई होती हैसचहै बिना प्रयास कोई सफलता नहीं मिलती और हमारा अफ़सोस है की हमने प्रयास ही नहींकिया.

जिन खोजा तिन पाइयागहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरारहा किनारे बैठ।

पूरी दुनिया बिना किसी नीव के भी महल बना रही है और हम इतनी मजबूत नीव के बावजूदकोई प्रयास ही नहीं कर रहे हैंभारतीय नेताओं का ध्यान "भारत में चौथ वसूली और विदेशों कीयात्रापर होता है जबकि होना इसका उल्टा चाहिए "विदेशों से चौथ वसूली और भारत कीयात्रा". भारत के शिक्षा तंत्र का यह हाल है की वो "पढ़ाई जो बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी दिलाये"पर जोर देते हैंजबकि होना इसका उल्टा चाहिए यानी वो "पढ़ाई जो बहुराष्ट्रीय कंपनी बनानासिखाये". इसी प्रकार हर भारतीय प्रशाशनिक अधिकारी का ध्येय रहता है की कानून औरप्रक्रिया ऐसी हो जो "सिर्फ प्रशाशनिक अधिकारियों और कानून विदों को समझ आयेजबकिइसका उल्टा होना चाहिए यानी कानून और प्रक्रिया ऐसी हो जो "हर व्यक्ति को समझ में सके और हर व्यक्ति बिना किसी मदद के अपना काम कर सके".

आज के समय के राम और गणतंत्र का चौथा स्तम्भ

आज के समय के राम और गणतंत्र का चौथा स्तम्भ
(विश्व पत्रकारिता आजादी दिवस विशेष )


मीडिया के दोनों चहरे अब साफ़ साफ़ अलग नजर  रहे हैंएक तरफ सकारात्मक मीडिया हैजो जमाने को सही दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहा हैएक तरफ ऐसे भी लोग हैं जो मीडियाका इस्तेमाल अभद्र प्रस्तुतिसेक्सनकरतकमक सोच और गलत बातों को प्रचारित करने मेंकर रहा हैएक तरफ सकारात्मक मीडिया है जो समाज के विकास के लिए बेहतरीन लेखप्रस्तुत कर रहे हैंतो दूसरी तरफ ऐसे भी मीडिया हैं जो समाज में व्याप्त गंदगी को ही प्रचारितकर रहे हैंहम सब को प्रोत्साहन देना होगा उन पत्रकारों का  जो इस भौतिकता के युग में भीआज भी सनातन आध्यात्मिक मूल्यों और भारतीय सोच को आगे ले जाने के लिए प्रयास कररहे हैं.

मीडिया के क्षेत्र में और भी ज्यादा प्रोत्साहन और संगठनात्मक पहल की जरुरत हैपुलित्ज़रप्राइज में पत्रकारिता के १४ क्षेत्रों में इनाम दिया जाता है जैसे फोटोग्राफीकार्टूनखोजीपत्रकारिताफीचर राइटिंग  आदिइन क्षेत्रों में प्रोत्साहन की जरुरत हैसृजनशील लेखन औरसृजनशील विधाओं की तरफ युवाओं को मोड़ने की जरुरत है नहीं तो नकारात्मक मीडिआसमाज को खत्म कर सकता है.
इस दुनिया को बदलने में जितनी ताकत मीडिआ  के पास है उतनी किसी और के पास नहीं है.यह मीडिया ही है जो लोगों की सोच को बदल सकता है और लोगों को वो काम करने के लिएप्रेरित कर सकता है जो  तो सरकार कर सकती है  कोई और कर सकता हैयह मीडिया ही हैजो लोगों में ख़ुशीआनंदहर्षरोमांचभयतनावऔर रहस्य के भाव पैदा कर सकता है औरजैसे चाहे लोगों को सोचने के लिए प्रेरित कर सकता हैमीडिया की ताकत अद्भुत है.
आप सभी ने १९८३ का केविन कार्टर का सूडान की बच्ची और गिद्ध का प्रसिद्द फोटो देखाहोगाउस फोटो के लिए केविन कार्टर को पुलित्ज़र पुरस्कार मिला और फिर बाद में उसनेआत्महत्या कर लीउस फोटो के बाद सूडान की गरीबी पर पूरी दुनिया का ध्यान गयाउसफोटो के कारण न्यूयॉर्क टाइम्स को लोगों के हजारों फोन आते थे की क्या हुआ उस बच्ची का.एक फोटो  वो बात कह सकता है और लोगों में विचार बदलने की वो ताकत है जो अन्य किसीमीडिया में नहीं है. .



पूरी दुनिया में प्रेस को आजादी को लेकर भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं हैफ्रीडम हाउस कीरैंकिंग में फ़िनलैंड दुनिया के पहले स्थान पर और भारत ८०वे स्थान पर हैवहीँ रिपोर्टर्सविदाउट बॉर्डर्स के सर्वेक्षण में भारत का स्थान १३६  है (और फ़िनलैंड प्रथम स्थान पर है).आखिर क्या है फ़िनलैंड जैसे छोटे से देश में जो हमारे देश में नहीं हैआखिर क्या है हमारे देशमें जो फ़िनलैंड में नहीं हैआखिर क्यों हम इतने पिछड़े हैं?
जब हम प्रेस की आजादी की बात करते हैं तो कई बाते आती हैं: -
  • सरकारी तंत्रनियमकानूनऔर व्यवस्थाएं
  • पत्रकारों को सुरक्षा
  • पत्रकारों के लिए सुविधाएं और संसाधन
  • पत्रकारिता के लिए माहौल
  • पत्रकारिता के लिए प्रोत्साहन
  • खुलापनपारदर्शिताविचारों की विविधता का स्वागत और सोच में व्यापकता
अगर हम कानून की बात करें तो हमारे देश में संविधान के अनुच्छेद १९ में अभिव्यक्ति कीस्वतंत्रता के लिए प्रावधान हैसरकारी तंत्र भी प्रकाशकों को मदद करने के लिए कृतसंकल्प है.हर दूसरे दिन आपको प्रधान मंत्री जी का पुरे पेज का विज्ञापन मिल जाता है जिसका एकउद्देश्य अखबारों को मदद करना भी हैफ़िनलैंड और नॉर्वे जैसे देशों की तुलना में हमारीसरकार मीडिया को काफी ज्यादा पैसे विज्ञापन और सहायता के रूप में देती हैलेकिन फिर भीफ़िनलैंड हम से आगे हैंक्यों ? फ़िनलैंड और भारत का फर्क देखिये :-  फ़िनलैंड की १००%जनसख्या साक्षर हैहर व्यक्ति पढ़ा लिखा और समझदार हैहर व्यक्ति मीडिया की भूमिकाको समझता हैहर व्यक्ति सकारात्मक मीडिया को प्रोत्साहित करता है और हर व्यक्तिइंटरनेट का इस्तेमाल करता है लेकिन अश्लील मीडिया और अश्लील वेबसाइट का विरोधकरता हैअगर किसी व्यक्ति के बारे में कोई गलत खबर प्रकाशित हो जाती है तो मीडिया कोउसको सुधरने के लिए पुनः सही खबर प्रकाशित करनी पड़ती हैफ़िनलैंड की मीडिया का अपनास्वयं का संगठन भी बड़ा मजबूत हैबिना सरकारी पहल के ही वे अपने स्तर पर सकारात्मककदम उठा लेते हैंहम सब भी अगर सकारात्मक मीडिया का समर्थन और नकारात्कम मीडियाका जम कर विरोध करेंगे तो ही हम आगे बढ़ पाएंगे.

दुनिया में हर समय लगभग ३००० डॉलर अश्लील वेब्सीटेस पर खर्च हो रहे हैंहर सेकण्ड२८००० से ज्यादा लोग अश्लील वेबसाईट्स  को देख रहे हैं.हर सेकण्ड विकास-शील देशोंके   नए युवा इस चंगुल में फंस रहे हैं.  मीडिया का रावण गरीब देशों को डस रहा है और युवावर्ग को बर्बाद कर रहा हैइस रावण को ख़त्म करने के लिए एक ही उपाय है - सकारात्मक सोचको बढ़ावा देने वाली मीडिया को प्रोत्साहन  देवो - वो ही हमारा राम है जो हमें इस दुर्दांत रावणसे बचा सकता है.

पहला पहला वार (war) था - आजादी का खुमार था



(१० मई १८५७  को शुरू हुए पहले स्वतंत्रता संग्राम को समर्पित) 

१० मई का दिन भारतीय इतिहास में उतने ही महत्व का है जितना १५ अगस्त या २६ जनवरी का है. इसी दिन भारतियों ने आजादी का प्रथम संग्राम शुरू किया था जिसमे वे असफल हो गए थे. इसी दिन मेरठ से आजादी के लिए पहला संघर्ष शुरू हुआ था. श्री मंगल पाण्डेय की कुर्बानी के बाद हर व्यक्ति अपनी जान कुर्बान करने को तैयार था. अनगिनत भारतीय लोगों ने हँसते हँसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए. प्रश्न था अपने वजूद का, अपने सिद्धांतों का, अपने देश का और संस्कारों का. मुट्ठी भर अंग्रेजों ने कुछ गद्दारों के साथ मिल कर भारतियों की लाशें बिछा दी और अकल्पनीय कष्ट दिए. गाव के गाव भून दिए गए, महिलाओं और मासूम बच्चों को भी नहीं बक्शा गया. इस दौरान  लक्ष्मी बाई, तांत्या टोपे जैसे वीरों ने  बेमिसाल संघर्ष के आदर्श प्रस्तुत  किये जिसको जानना और याद रखना  हर भारतीय का फर्ज बनता है. हमें हमारी अगली पीढ़ी को यह बताना चाहिए की निहथे भारतीय अंग्रेजों से क्यों लड़े? क्यों लाखों लोगों ने अपनी जान कुर्बान की? क्या कारण था की ख़ुशी ख़ुशी मौत को गले लगाया? ऐसा क्या था हमारी संस्कृति में जिसको बचाने के लिए हमारे पूर्वज अंग्रेजों का विरोध कर रहे थे? आखिर आजादी का मतलब क्याथा हमारे पूर्वजों के मन में? 

"गाय के मांस" के मुद्दे पर मंगल पाण्डेय अपने प्राण न्योछावर कर सकता था, लेकिंन आज उसको बड़ा दुःख  होगा यह देख कर की उसके वंशज गाय के मांस खाने के लिए लालयत बैठे हैं. जैसे ही महाराष्ट्र सरकार ने गाय के मांस पर प्रतिबन्ध लगाया, लोगों ने हाय तोबा मचाना शुरू कर दिया जैसे की उनका अन्न-जल रोक दिया गया  हो. शर्म आती है यह देख कर की आजादी के छ दशकों में हमने क्या खोया और कितना  खोया. वो देश अद्भुत है जिसमे मंगल पाण्डेय, लक्ष्मी बाई और तांत्या टोपे जैसे लोग रहे होंगे. लेकिन उस नीच लोगों  के बारे में क्या कहो जो इनलोगों की कुर्बानी को याद तक नहीं करते और उनके किये कामों के उलटे काम करते हैं?  २९ मार्च १८५७ को मंगल पाण्डेय "गो-मांस के खिलाफ" बगावत की शुरुआत करते हैं और फिर अपने प्राण न्योछावर करते हैं तो मार्च-अप्रेल 2015 में केरल और तमिलनाडु में तथाकथित नेता गो-मांस का भोज परोसते हैं और लोगों को गाय का मांस खाने के लिए उकसाते हैं. क्या पाया है ऐसी आजादी से जिसमे अपने संस्कार ही गवा दिए और इंसानियत की होली जल दी? और ताजुब होता है उन मीडिया के लोगों पर भी जिन्होंने इन घृणित हरकतों को मीडिया में इतनी जगह दी और प्रचारित किया. 

१८५७ के समय लोग अकोशित थे की अंग्रेज आ कर हमारे देश की संस्कृति को बर्बाद कर रहे हैं और इस देश को खत्म कर रहे हैं. देश तो वाकई संस्कृति और सभ्यता से ही बनता है बाकी तो जानवरों और इंसानों में फर्क ही क्या है? आज तो कोई अंग्रेज भी नहीं है लेकिन आज हम अपने देश के ही अंदर अपनी संस्कृति को बर्बाद करते अपने ही देश के  तथाकथित नेताओं से त्रस्त हैं. 
जिस देश में महिलायें अपनी बनायीं रोटी की पहली कोर गायों के लिए रखते हैं, जिस देश में हर गाव में गाय को घर में रख कर लोग कृतार्थ महसूस करते हैं, जिस देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था का आधार ही गाय है उस देश में और कोई नहीं गो-मांस की दावत देने वाले उन संस्कृति -द्रोहियों को नेता की पदवी क्यों दी जा रही है? कुछ तथा-कथित अंग्रेजी के विद्वान "गाय -मांस" खाने को ही अपना मौलिक अधिकार बता रहे हैं काश उन्हें मंगल पाण्डेय की रूह जो भारत के कण कण में बसी है उससे मिला दे. जो विदेशों के  चहेते लोग "गोमांस" के पक्ष में आंदोलन कर रहे हैं उनको कोई १८५७ की आजादी की लड़ाई की पुस्तक पढ़ के सुनाये ताकि उनको भी भारत की जड़ों की  कुछ तो समझ बने. 
इस १० मई को अंग्रेज लोग "मातृ दिवस" मन रहे हैं. काश भारत के "अंग्रेज" भारत में गाय को माता क्यों कहते हैं इतना ही समझ लें तो बड़ी मेहरबानी होगी. अगर वो "गोमाता" को नमन कर सके और "गोमांस" का विरोध करने का साहस बटोर पाये  तो वो भी भारत के सच्चे सपूत होंगे और उनकी तरफ से यही सच्चा "मातृ दिवस" होगा. 

दुनिया में अनूठी पहचान बनाता बीकानेर

I WROTE THIS ARTICLE IN 2012. NOW MANY THINGS HAVE CHANGED.

बीकानेर नाम आते ही आप के जहाँ में क्या तस्वीर आती है? बीकानेर के बारे में लोग क्या सोचते है। जब में रेल में यात्रा करता हु - लोग कहते हैं - जेसे ही बदबू आने लगती है - या हवा में मिटटी आने लगती है - तो लगता है बीकानेर आ गया - यह बीकानेर की एक पहचान है - परन्तु बीकानेर की बोधिक क्षेत्र में भी एक अलग पहचान है। 

शहर बनाने वाले हामी लॉग है। सिर्फ ईंटो और गारो से शहर नहीं बनते। शहर बनते है वहां के लोगो के कार्य और प्रभाव से। कई इसे शहर है जहाँ कम प्राकृतिक साधन होने के बावजूद भी उन शहर के लोगो की म्हणत के कारन उन शहरों के नाम पूरी दुनिया में है। बीकानेर भी इसे ही शहरों की लिस्ट में शामिल हैं। प्रकृति नि बीकानेर को तेज गर्मी तेज शर्दी, धुल भरी अंधिया दी, पर यहाँ के बाशिंदों ने अपने परिश्रम से इस शहर को एक नयी पहचान दी। बीकानेर शहर की इस नहीं पहचान के कारन आज आप जहाँ भी जाते है - बीकानेर का नाम लेने में आपको गोरव महसूस होता है और लोग आपको सम्मान देते है।  बीकानेर भुजिया, पापड़, नमकीन, रसगुल्ला, उन  व हस्तशिल्प के लिए हमेशा से जाना जाता रहा है। बीकानेर को हमेशा से एक समृद्ध संस्कृति के लिए जाना जाता रहा जय। यहाँ की मीठी बोली और समृद्ध संस्कृति के कारण बीकानेर को छोटी काशी  कहा जाता रहा है। 
बीकानेर हमेशा से एक आध्यात्मिक और धार्मिक शहर के रूप में जाना गया है। लेकिन युवाओं ने बीकानेर को एक नयी  पहचान देने का प्रयास किया है। आज बीकानेर को तकनिकी क्षेत्रों में भी पहचान मिल रही है। बीकानेर के अकाउंटेंट हमेशा से प्रसिध रहे है और बड़ी बड़ी कंपनियों में आपको  लेखाकार बीकानेर के मिल जायेंगे। 

बीकानेर के युवा अपनी प्रतिभा और व्यवहार के कारन इस शहर को एक अलग पहचान देने में सफल हुए हैं। अब यह सिर्फ भुजियो के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यहाँ की प्रतिभा के लिए भी जाना जाता है बीकानेर शहर के युवा जहाँ भी गए, उन्होंने अपने कार्य से इस शहर का नाम रोशन किया है। आज जरुरत है बीकानेर की प्रतिभाओं को एक सूत्र में पिरोने की। 

आज बीकानेर में शिक्षा  व प्रगति के सभी साधन उपलब्ध हैं। एक समय था जब बीकानेर के विद्यार्थिओं को आगे की पठाई करने बाहर जाना परता था। आज चाहे इन्जिनीरिंग को पठाई हो या चार्टर्ड अकाउंटेंट की पढाई, बीकानेर में ही की जा सकती है। बीकानेर में उपलाभ्द सुविधाएँ किसी भी शहर से कम नहीं हैं। आज इस शहर में सबसे श्रेष्ठ सुविधाए उपलभध है 
बीकानेर के परम्पगत कला जेसे की मीनाकारी तो पहले से ही प्रसिद्ध थी। आज का नया युवा अपने हुनर और कला से उसे नए क्षेत्रों में भी पहचान दे रहा है। रजनीश व्यास, देवेन्द्र पारख , और राजीव माथुर जेसे लोग वेबसाइट बनाने व सॉफ्टवेर डेवलपमेंट में अपने कार्य से बीकानेर को एक अलग पहचान दे रहे हैं। 
बीकानेर की हवेलियाँ अपनी अलग पहचान तो रखती ही थी,  हवाली संरक्षण अभियान के द्वारा गोपाल सिंह ने बीकानेर को एक नयी पहचान दी है। बीकानेर की पाटा संस्त्रिती और बीकानेर की पुस्तकालय संस्कृति, पूरी दुनिया में बेजोड़ हैं। बीकानेर के अर्कैविएस के द्वारा श्री महंद्र खडगावत ने बीकानेर को एक अलग पहचान दी है। बीकानेर की अर्कैविएस पूरा देश में अपने अलग पहचान रखती हैं। संगीत में मुरारी शर्मा व श्रेयांस जैन बीकानेर की प्रतिभाओं को नयी  दिशा दे रहे हैं और संदीप आचार्य और राजा  हसन जेसे कलाकार पूरी दुनिया मी अपनी पहचान बना रहे हैं (अब श्री संदीप आचार्य जी स्वर्गीय हो गए हैं, लेकिन ये लेख जब लिखा था तब वो अपनी प्रतिभा से पूरी दुनिया में छा रहे थे. )।  उद्योंग के क्षेत्र में कुञ्ज बिहारी गुप्ता ने सेरामिक्स के क्षेत्र में बीकानेर को एक नयी पहचान दी है।  लेखन के  क्षेत्र में नन्द किशोर आचार्य और मदन सैनी ने बीकानेर को अलग पहचान दी है।  बीकानेर यहाँ के साहित्य प्रेम के लिए जाना जा रहा है। । 

पचास साल पुराने बीकानेर की तस्वीर देखोगे तो लगेगा की वो बीकानेर ज्यादा अच्छा था - क्योंकि उसमे शहर में गन्दगी और धुवा नहीं था। लेकिन पिछले 50 वर्षों में इस शहर के लोगों ने जो तरक्की की वह भी तो देखिये।  इस शहर को इसकी गंदगी के लिए नहीं बल्कि यहाँ के लोगो के मधुर व्यव्हार के लिए जाना जाता रहा है और रहेगा। 

Thursday, April 23, 2015

ज्यादा जरुरी है जीवन की तैयारी

 ज्यादा जरुरी है जीवन की तैयारी

हर दिन शोध यही बता रहा है की ८०% से ज्यादा ग्रेजुएट्स नौकरी रखने के लायक नहीं है. न वे विद्यार्थी मुश्किल परिस्थितियों को झेल सकते हैं न ही वे इतने शानदार व्यक्तित्व के मालिक हैं की कंपनी उनको  बुला कर प्रबंधक की कुर्सी पर बिठा दे. आज जरुरत है की शिक्षा-विद शिक्षा के ढांचे और उसकी विषय वस्तु पर फिर से गौर करें. आज जरुरत है की शिक्षा-विद फिर से प्राचीन गुरुकुलों से सीख लेवें और यह तय कर लेवें की उनको विद्यार्थियों को जीवन के संग्राम में विजय दिलाने के लिए तैयार करना है न की सिर्फ डिग्री धारक बाबू. 

डॉ. सुभाष चन्द्र (जी कंपनी के संस्थापक) के एक कार्यक्रम में एक गाव से आये बालक ने कहा की शहर के बालक बिलकुल नाजुक और कमजोर होते हैं आने वाले समय में गावों के बच्चों से ही देश में प्रगति होगी. डॉ. सुभाष चन्द्र ने उस बच्चे को खरी खरी बात कहने के लिए बधाई दी. बात सही है. हम तथा कथित पढ़े लिखे शहरी लोगों ने अपनी आने वाली पीढ़ी को इतना नाजुक बना दिया है की वे लोग कुछ भी नहीं कर सकते हैं (सिवाय फेसबुक और व्हाट्सप्प चलाने के). आज आम शहरी बच्चा न धूप  बर्दास्त कर सकता है, न ठण्ड-गर्म, न रूखी-सुखी खा सकता है न नल का पानी पी सकता है. न वो दौड़ लगा सकता है न वो शारीरिक श्रम कर सकता है, न वो समूह में काम कर सकता है न वो विपत्तियों को झेल सकता है. हमने उनको आराम के नाम पर कमजोरी प्रदान की है. जीवन कोई आराम भरी यात्रा नहीं है. जीवन में कदम कदम पर मुश्किलें आएँगी. जीवन में जो व्यक्ति कठोर परिश्रम और विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार होगा वो ही आगे बढ़ पायेगा. आज दिखने में आ रहा है की महानगरों के बच्चे ऑफिस - वर्क के आलावा कोई काम ही नहीं कर सकते हैं. ऐसे बच्चे किस काम आएंगे? ऐसे बच्चों से देश का विकास नहीं हो सकता है. 

हर विद्यालय - महाविद्यालय विद्यार्थिओं को शैक्षणिक भ्रमण पर महानगरों की तरफ ले जाता है और उनको शानदार होटल में ठहरा कर आनंद-दाई जीवनशैली के दर्शन करता है. असली शिक्षा तो तब होगी जब उन विद्यार्थियों को गाव - गाव भ्रमण करवाया जाए और जीवन की मुश्किलों में कैसे समाधान निकला जाए ये सिखाया जाए. काश हम फिर से जमीन पर लोटा लाएं अपने विद्यार्थियों को और उनको यथार्थ के लिए तैयार करें.