Saturday, April 30, 2016

क्यों जरुरी है जीव जंतुओं पर करुणा ?



पुरे देश में आज ऐसी कंपनियों का जाल बिछ रहा है जो बालकों और युवाओं की चहेती बनती जा रही हैस्वादिष्ट खाना हर कोई खाना चाहता है फिर विदेशी ब्रांड्स के तोभारतीय हमेशा से गुलाम रहे हैंकभी सबवे तो कभी मेक्डी.... युवा वर्ग इन विदेशी कम्पनियों के उत्पादों पर लट्टू हो रहे हैंइन कंपनियों ने सिर्फ फ़ास्ट फ़ूड ही प्रचारितनहीं किया है भारत की संस्कृति को भी तोड़ फोड़ दिया हैवो भारत जहाँ पर हर बालक प्राणी मात्र पर करुणा और जीव दया की दृस्टि रखता था उसी भारत में अब वो बालक आज हर जीवन कोएक उपभोग की वस्तु के रूप में देखने लगा हैनॉन वेज फ़ूड लोकप्रिय हो रहा हैकरोड़ों लोग इसी प्रकार नॉन-वेज खाने लगेंगे तोजंगल के जंगल साफ़ हो जाएंगे और अन्य  जीवों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगाकिसान की मेहनत से तैयार अनाज पड़ा सड़ेगा और इंसान हैवान बन जाएगाबड़ीबड़ी होटलों में नॉन-वेज खाने को तैयार करने के लिए जंगल से निरीह पशुओं (सिर्फ शाकाहारी पशुओें जैसे को ही खाया जाता हैको पकड़ के लाया जाता हैवो पशु अबसिर्फ गिने चुने हैंउन पशुओं की संख्या कम होते ही जंगल में रहने वाले माँसाहारी पशुओं को उनका भोजन नहीं मिलता हैवो हिंसक हो कर शहरों की तरफ आते हैं औरआदमखोर बन जाते हैंइस प्रकार से हम पुरे जीवन चक्र के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं.
बड़ी बड़ी होटलों और बहु राष्ट्रीय कंपनियों में होड़ मची है की अधिक से तरह के पशु पक्षियों को खाद्य पदार्ध के रूप में प्रस्तुत किया जाएजहाँ कहीं भी सुन्दर निरीहपक्षी दिखाई देते हैं वहां बटोही उनका शिकार करने लग जाते हैं और क्यों  करें-  उनको होटल व् रेस्टोरेंट के मालिक इस काम केलिए अच्छी धन राशि देते हैंआजसाइबेरियन सारसगुलाबी मुह वाली बतखफ्लोरिकोंसेंडपाइपरक्वेलजैसे पक्षी तो लुप्त हो गए /रहे  हैं और हर दिन कोई  कोई प्रजाति लुप्त हो रही है.

बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने शानदार मार्केटिंग और प्रचार तंत्र की मदद से हर युवा का ध्यान खींच लेती हैंउनकी प्रभावी मार्केटिंग किसी भी युवा को दिग्भ्रमित करसकती हैवे हर युवा को मांसाहारी बना कर छोड़ेंगेअब प्रश्न है की आप जैसे पर्यावरण प्रेमी के लिए ये एक चुनौती है की क्या करेंगे आप सरकार से कुछ उम्मीदरखिये  बड़बोले  नेताओं से और  ही विदेशी दान दाताओं से .... किसी को इस मुद्दे की परवाह नहीं हैफिर क्या होगा समाधान ?  विद्यार्थियों में करुणा के संस्कारफैलाने पड़ेंगेपहले दादा दादी व् बुजुर्ग बच्चों में अन्य प्राणियों के लिए करुणा के संस्कार फैलाते थेसुबह सुबह गाय को गो=ग्रास खिलाते थे और बच्चों को गाय के हाथफेरने के लिए कहते थेअबतो विद्यार्थी जीवन से ही प्रतिस्पर्धा जीवन का मकसद बन गया है.

मेरे विचारों को किसी धर्म के दायरे में  रखेंये प्रश्न आप हम सब की सांझी संस्कृति और विरासत का हैजब सब पशु- पक्षी लुप्त हो जाएंगे तो कौन जीवन काउल्लास देख पायेगाप्रश्न है की जिस जीवन के उल्लास का हम आनंद ले रहे हैं उस को बढ़ने और पल्लवित करने की जिम्मेदारी भी हमारी ही हैआईये आप और हममिल कर छोटे छोटे प्रयास शुरू करेंदेर कर देंगे तो आप पाएंगे की आपके बच्चे ही घर में मांसाहार अपना रहे हैं और फिर एक दिन  आप के घर में रहने वाली चिड़िया -मैना भी सुरक्षित नहीं रहेगी - कब उनका काल  जाएआईये आप हम मिल कर छोटे छोटे प्रयास शुरू करेंशिक्षण संस्थाओं को अनुरोध करें की वो हमारी मदद करें.आज जरुरत है की हर शिक्षण संस्थान में पशु पक्षियों के प्रति करुणा के संस्कार पैदा करने और शाकाहारी भोजन को बढ़ावा देने के लिए प्रयास होने चाहिएशाकाहारीव्यंजनों को बनाने का प्रशिक्षण होना चाहिए और उन कंपनियों (व् उन शिक्षण संस्थाओं का भी जो मांसाहार को बढ़ावा दे रहीं हैंका बहिष्कार होना चाहिए जो मांसाहारीभोजन को प्रचारित कर रही हैं.

संरक्षण की बात जोहती अद्भुत कलाएं




क्या आप को पता है की भारत में अद्भुत कलाकार हैं जिनकी कला को कद्रदान की जरुरत है. ऐसे ऐसे कलाकार की उनकी कला के आधार पर पूरी दुनिया में भारत की अलग छाप बन सकती है और पूरी दुनिया को भारत की कलाकृतियों का एक्सपोर्ट शुरू हो सकता है. यानी रोजगार सृजन, क्षमता वृद्धि और आयोपार्जन का अद्भुत संगम. पर उन अद्भुत कलाकृतियों को जरुरत है संरक्षण की. संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठ कर उन कलाकारों को सम्बल प्रदान करने की जरुरत है. 

जहाँ जहा पर भी कलाकार संगठित हो कर अपने आपको एक संगठन में पिरोकर काम करने में सफल हुए और जीआई लेने में कामयाब हुए वहां वहां पर आर्थिक प्रगति शुरू हो गयी. मोरादाबाद में मेटल कला, कल्लू में शाल, सहारनपुर में लकड़ी की कला और इस प्रकार की तमाम कलाकृतियों से जुड़े लोगों की तरक्की की कहानी इसी प्रकार शुरू हुई. भागलपुर साड़ी, फर्रुखाबाद, लखनऊ, चेट्टीनाद, पाटन आदि छोटे छोटे शहर भी अपनी अद्भुत कला के कारण पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने में सफल हुए. आज वहां के कलाकार सफलता की कहानियां है. लेकिन उनकी सफलता इसलिए संभव हुई क्योंकि उनको कोई सहारा देने वाला था और उनको संगठित कर के उनको जीआई के रूप में रजिस्टर्ड करवा कर के मदद करने वाला था. जरुरत है की कोई बीकानेर और इस प्रकार के शहरों के कलाकारों की आवाज को सहारा देवे और उनको उस मुकाम पर ले जाए जिसके वो हकदार हैं. 

चित्तौड़गढ़ की ठेवा कला के बारे में आप ने सुना होगा. जब से ये कला जीआई के तहत रजिस्टर्ड हुई है इसकी कीमत बहुत बढ़ गयी है. सिर्फ ३-४ परिवार इस कला को जानते हैं लेकिन आज इस कला के कद्रदान पूरी दुनिया में है. लुप्त होती इस कला को इसका कद्रदान मिल गया है. काश अन्य कलाकारों को भी उनका कद्रदान मिल जाए. 

कश्मीर पश्मीना के बारे में आपने सुना होगा. आज कश्मीर पश्मीना को सबसे महंगे उत्पाद में माना जाता है और पूरी दुनिया में उनकी मांग है. कलाकारों को उनका उचित दाम मिल रहा है. चंदेरी, मैसूर, पोचमपल्ली, तंजावुर, कोटा, बनारस आदि वो स्थान हैं जिनकी अलग पहचान बन गयी है यहाँ पर बानी साड़ियों और वस्त्र परिधान के कारण. वर्षों की परम्परा को आज पूरी दुनिया सलाम कर रही है. इन साड़ियों को बनाने वाले कलाकार आज रोजगार पा रहे हैं और इज्जत भी. पूरी दुनिया उनके हुनर को सलाम कर रही है. 
भारत में सिर्फ २१८ ही जीआई रजिस्टर्ड है जबकि यहाँ तो हर शहर में कलाकार हैं और कलाकारों की कला को सलाम करने की जरुरत है. प्रश्न हैं की खुर्जा पॉटरी, आगरा पेठा और मथुरा के पेड़े जीआई ले सकते हैं तो सरदारशहर की फीणी, बीकानेर की उस्ता कला, बीकानेर की मिनिएचर पेंटिंग कला, और बीकानेर की भजन मंडलियों को भी जीआई मिलनी चाहिए. प्रश्न है की ऐसा क्यों नहीं हो सकता है. यहाँ जरुरत है की किसी एम पी या एम एल ऐ को अपने फण्ड से एक शुरुआत करवानी चाहिए ताकि इन अद्भुत कलाकारों को उनका हक मिले. इसके लिए जरुरत है की उस कला से जुड़े लोग एक संगठन बना कर सरकार पर दबाव डाले और जीआई रजिस्ट्रार को  अपना आवेदन प्रस्तुत करें. एक बार जीआई मिलने के बाद कीमत में इजाफा हो जाएगा और पूरी दुनिया में खरीददार मिल जाएंगे. इस प्रकार उन कलाकारों को ज्यादा मेहनताना मिल पायेगा यानी उनको अपनी मेहनत का फायदा मिल सकेगा. 

एक समय आएगा जब हमें अपनी अगली पीढ़ी को कहानियों में बताना पड़ेगा की एक समय बीकानेर में बेहतरीन उस्ता कलाकार हुआ करते थे. एक समय में यहाँ पर शंख बजने की कला जानने वाले लोग हुआ करते थे. एक समय यहाँ पर बेहतरीन चित्रकार हुआ करते थे. इससे पहले की सब कुछ हम से छीन जाए - समय निकालिये - खुद भी अधम्बित होइए और अगली पीढ़ी को भी इन लुप्त होती कलाओं से रूबरू करिये. कभी फुर्सत निकालिये और बीकानेर के उस्ता कलाकारों की कला को देखिये और आप देखते रह जाएंगे. कभी महावीर स्वामी की चित्रकारी को देखिये, कभी बारह बॉस में रात्रि के समय में भजन मंडलियों को भजन करते देखिये और आप अवाक रह जाएंगे. कभी ये सोचिये की इस अद्भुत पीढ़ी के बाद ये कला किस के पास रहेगी? इनकी अगली पीढ़ी ये कला क्यों अपनाएगी? क्यों सरकार इन कलाकारों की अनदेखी कर रही है.  कभी ये सोचिये की इन कलाकारों को इनकी अद्भुत कला का कद्रदान क्यों नहीं मिला? इनकी कला अगर पूरी दुनिया में फैलाई जाए तो बीकानेर में विदेशी मुद्रा की बरसात होने लग जायेगी. लेकिन इस केलिए कोई सोचता क्यों नहीं है? 

खुशिओं का अर्थशास्त्र


तथाकथित अर्थशास्त्री (जो कि पश्चिमी ज्ञान से लवरेज हैंहमेशा दिवा स्वप्न दिखाते रहेंगे और आप को ये दिलाशा देते रहेंगे की भारत एक महाशक्ति बन कर उभरेगाक्योंकि भारत की जीडीपी दुनिया में जल्द ही दूसरे नंबर पर  जायेगीयह एक ग़लतफ़हमी है की जीडीपी बढ़ने से देश में लोगों को अधिक खुशियां मिलती हैयह एकअफ़सोस है की देश के नीति निर्माता इस ग़लतफ़हमी के साथ अपनी नीतियां बनाते हैं कि देश की तरक्की तभी होगी जब जीडीपी बढ़ेगीमेरी बात को सिर्फ भारतीयसोच रखने वाले लोग ही समझ पाएंगे - क्योंकि अमेरिका में अर्थशास्त्र पढ़ा व्यक्ति तो जीडीपी बढ़ाने की ही रट लगाता रहेगाअतः मेरी ये बात नीति निर्माताओं कोहजम नहीं होगीलेकिन इस लेख को पढ़ने वाले लोग मेरी बात को समझ पाएंगे इसी लिए में ये लेख लिख रहा हूँचूँकि आप मेरी बात समझ सकते हैं अतः मैं आपजैसेलोगों से ही गुजारिश करूंगा.
इस जीडीपी बढ़ाने के लालच ने देश के नीति निर्माताओं का क्या हाल किया हैपूछिए आम व्यक्ति से और आपको खुद ही जवाब मिल जाएंगेएक व्यक्ति मुझसेकहता है की जब सिगरेट ख़राब हैतम्बाखू ख़राब है तो सरकार उसको बिकने क्यों देती है - फिर वो ही बोलने लगा - सरकार भी अपनी आय की तरफ देख रही है -उसको भी अपनी आम्दानी की चिंता है.
जीडीपी बढ़ाने के लिए हर कोई प्रयास कर रहा हैकोई खेतों में फ़र्टिलाइज़र का उपयोग बढ़ा रहा है तो कोई गायों को केमिकल दे रहा है कोई फैक्ट्रियों को तीन शिफ्ट मेंचला रहा हैकुल मिला कर हर तरफ उत्पादन बढ़ाने पर जोर हैलोगों को जरुरत किस चीज की है इसकी परवाह नहीं है - उत्पादन बढ़ना चाहिएसरकार खुद मिल करउत्पादनउपभोग और विज्ञापन की संस्कृति को बढ़ावा दे रही है ताकि जीडीपी बढेउत्पाद होइ भी हो - बस उससे जीडीपी बढ़नी चाहिए - जितना महंगा उत्पाद होगाउतना ही अच्छा हैजितना बड़ा प्रोजेक्ट होगा उतना ही अच्छा हैजितना ज्यादा उपभोग होगा उतना ही ज्यादा अच्छा है - क्योंकि जीडीपी बढ़ेगीप्रश्न है की इस तरहजीडीपी बढ़ाने से क्या नतीजा निकलता है - पूरी दुनिया में भारत का नाम हो जाएगा की ये दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैपर क्या इससे लोगों को खुशियांमिलेगी - शायद कभी नहींजीडीपी वाले अर्थशास्त्रियों को फिजूलखर्ची लोग बहुत पसंद हैं क्योंकि वो जीडीपी को बढ़ा रहे हैंइन लोगों को सरकारी सब्सिडीसरकारी तामजहां भी बहुत पसंद है क्योंकि वे जीडीपी बढ़ा देते हैं.
बड़ा उद्योग लगाएं -सरकार से सब्सिडी पाएंघरेलु उद्योग चलाएं सरकार से फटकार खाएंमेगा प्रोजेक्ट लाएं सरकार से सहायता पाएंछोटे प्रोजेक्ट्स चलाएं औरइंस्पेकटर राज से दुखी हो जाएँअगर आप करोड़ों के प्रोजेक्ट लगा सकते हों तो सरकारें आप के आगे पीछे घूमेगीसिंगल विंडो से इजाजत मिलेगीअगर आप अपनाठेला चलाना चाहते हों तो पुलिस इंस्पेक्टर भी आपको नहीं बख्शेगाआज सरकार हर महँगी वस्तु के उपभोग को बढ़ावा देने में लगी है ताकि देश की जीडीपी बढेभारतकी वर्षों पुरानी वस्तु विनिमय व्यवस्था को आज कोई बढ़ावा देने वाला नहीं है क्योंकि उससे जीडीपी की बढ़ोतरी की कोई उम्मीद नहीं नजर आतीभारत में वर्षों से चली रही ठेला व्यवस्था और परचून की दूकान खतरे में हैं क्योंकि सरकारी अधिकारी नहीं चाहते की ये चल पायेउनको तो बड़े बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर और मॉल्स चाहिएजो खूब टैक्स दे सकें और जीडीपी बढ़ा सकें.
क्या है खुशियों का अर्थशास्त्र?
गांधी जी ने जिस ग्राम  स्वराज्य की कल्पना की थी या महाप्रज्ञ जी ने जिस रिलेटिव इकोनॉमिक्स की बात की थी या चाणक्य ने जिस अर्थव्यवस्था की बात की थी -उसका आज कही भी कोई नामो निशान तक नहीं नजर आता है क्योंकि हर सरकार जीडीपी बढ़ा कर विश्व मंच पर अपनी वाह वाही लूटना चाहती हैपरन्तु जनताखुशियां चाहती हैखुशियों को बढ़ावा देने के लिए एक ऐसी व्यवस्था चाहिए जहाँ पर लोगों को सहज होकर जीने का मौका मिले और अपना पन और सम्मानमिलेकुटीरउद्योगकृषिघरेलु धंधेछोटे छोटे सूक्ष्म उद्योगों को प्रोत्साहन मिले तब खुशियों का अर्थशास्त्र शुरू होगाफिर से लोगों को इंस्पेकटर राज से मुक्त करवाने के लिएपहल करनी पड़ेगीफिर से लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए पहल करनी पड़ेगी.
आम जन में आपसी प्रेममृदुतामधुर व्यवहारआपसी मेलजोल को बढ़ावा देने के लिए एक अलग आर्थिक सोच चाहिएजो अर्थशास्त्री सिर्फ बहुराष्ट्रीय पूंजीपतियों केहितों के रखवाले होंजो सरकारें सिर्फ विदेशी कम्पनियों के लिए देश के द्वार खोल कर दुनिया में वाहवाही लूटना चाहती हों उनसे खुशियों के  अर्थशास्त्र की उम्मीदरखना गलत हैउसके लिए आप हम जैसे आम लोगों को फिर से पहल कर के देश को एक जड़ों से जुड़ी हुई सोच देनी पड़ेगी और जिस दिन हमारी समझ सरकार जमझपाएगी उस दिन निश्चित रूप से सरकार अपने अधिकाँश नौकरशाहों को सेवामुक्त कर देगी.
भारत की अद्भुत संस्कृति के पीछे विविधता भरी संस्कृति रही है जिसमे जहाँ जो साधन मिल गए उन का उपयोग कर के लोगों की सामर्थ्य के अनुसार विकास के साधनशुरू किये गएहर जगह पर आम आदमी को पूरी स्वतंत्रता मिलीकृषिव्यापारउद्योगऔर कला को सरकारी सम्मान और संरक्षण मिला तो ठीक नहीं मिला तो भीकोई बात नहीं पर इंस्पेकटर राज का सामना नहीं करना पड़ाजब जब सरकारें शोषण करती थी तब तब कोई आवाज उड़ाता था कोई कहता "चौथ वसूली नहीं चलेगीतोकोई कहता "नमक पर टैक्स नहीं देंगे". हर समय जब आम आदमी की खुशियां संकट में थी तब कोई  कोई रखवाला जरूर आयादेखते हैं आज कौन आगे आता है?
सरकार को ये बात समझ लेनी चाहिए की लोगों को सरकार से मिलने वाली खैरातसब्सिडीऔर चंद टुकड़े खुशियां नहीं दे सकते हैंलेकिन जिस दिन लोग अपनीमेहनत की कमाई से दो जून की कमाई कर के अपने व् अपने परिवार का पेट भर के परिवार के साथ परिश्रम से खुद अपनी रोटियां कमाएगा उसको जरूर खुशियांमिलेगीलोगों का जज्बा और जुझारूपन सरकार की जीडीपी में नहीं आता है लेकिन देश की असली अर्थव्यवस्था तो वो ही है  की कितने रूपये किस किस ने उड़ाए(चाहे वो फिजूलखर्ची ही क्यों  हो).
आइये फिर से वस्तु विनिमय व्यवस्था को नमन करेंआइये मिल कर उन उत्पादों का बहिस्कार करें जो लोगों की जिंदगी ख़राब करने के लिए बनाए जाते हैंआइयेमिल कर  एक नयी अर्थव्यवस्था की शुरुआत करें जहाँ पर इंसानी रिश्तोंआपसी मेलजोलभाईचारेऔर हिलने मिलने को प्रोत्साहन होआइये लोगों को छोटे छोटे औरसूक्ष्म उद्योग लगने को प्रेरित करें.  आइए फिर से लोगों को आपस में हंस मिल कर एक दूसरे की मदद करने के लिए प्रेरित करें (भले ही इनसे जीडीपी को नुक्सान हो).उपभोग नहीं उल्लासउमंग और अध्यात्म को समर्पित हो हमारे हर प्रयासआइए खुशियों की अर्थव्यवस्था की शुरुआत करें.

डिग्रीयों का मुकुट और जमीनी हकीकत




शीघ्र ही भारत दुनिया में सबसे ज्यादा डिग्री धारक लोगों का देश बन जाएगा. हर दूसरा व्यक्ति डिग्रीयों का पुलिंदा लिया खड़ा होगा. तरह तरह की डिग्रीयां. हर डिग्री एक मुकुट के सामान होती है. जिसके सर पे चढ़ जाए उसका सर सातवें आसमान पर. डिग्री मिलते ही व्यक्ति की सोच बदल जाती है. डिग्री मिलते ही व्यक्ति अपने आप को अफसर समझ सिर्फ अफसरी करने के सपने देखने शुरू कर देता है. अगर वो कुछ और भी करना चाहता है तो समाज नहीं करने देता - "अरे तुम तो डिग्री धारी हो ये काम तुम को शोभा नहीं देता है."  आदि आदि टिप्पणियां शुरू हो जाएंगी. 

क्या मतलब है डिग्रीयों का : - 

भारत में डिग्री पाने के लिए व्यक्ति साल के अंत में १-२ महीने टूशन पढ़ेंगे, वन वीक सीरीज पढ़ेंगे और महत्व्पूर्ण प्रश्नों को याद करेंगे. डिग्री मिलते ही सबसे पहले अपने आप को बदल डालेंगे. फिर तो सिर्फ हुक्म झड़ने का काम करेंगे. अफसर बन कर राज करेंगे. 

एक डिग्री अपने आप में एक सबूत है की आप के पास एक विशेष दक्षता है. उस दक्षता के प्रतीक के रूप में डिग्री आपकी उस हुनर के प्रति प्रतिबढता को प्रदर्शित करती है. अगर आप अंग्रेजी में एम ऐ हैं तो इसका मतलब आप अंग्रेजी साहित्य के विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं और लगातार उस साहित्य का अध्ययन और विकास कर रहे हैं. लेकिन भारत में एस नहीं है. यहाँ तो डिग्री एक नौकरी पाने का प्रमाण पत्र है और जरुरी नहीं की डिग्री धारक को अमुक हुनर है या नहीं है. 

विदेशों में डिग्री क्रेडिट पर आधारित होती है. ३० घंटे किसी एक विषय पर अध्ययन और उसपर शोध करने पर १ क्रेडिट मिलता है. इस प्रकार एक विद्यार्थी को उसकी मेहनत के अनुसार क्रेडिट मिल जाता है और उस क्रेडिट के आधार पर उसको डिग्री मिल जाती है. डिग्री इस बात का प्रमाण है की उसने कमसे कम २-३ हजार घंटे एक विशेष अध्ययन या एक विशेष हुनर को सीखने में लगाए हैं. 

कहाँ कमी है? 
भारत में किसी भी डिग्री धारी व्यक्ति से शारीरिक  श्रम की उम्मीद नहीं की जा सकती. उससे किसी एक क्षेत्र में विशेष दक्षता की उम्मीद भी नहीं की जा सकती है. इसी कारण वो व्यक्ति कोई भी काम नहीं करना चाहता है. डिग्री की पढ़ाई के दौरान उससे कोई भी काम नहीं करवाया जाता है जिसके कारण उसमे काम करने की न तो कोई ललक होती है न कोई समझ होती है. कोई व्यक्ति बी.कॉम की पढ़ाई पूरी कर लगा लेकिन आप उसको केश बुक या बेलेंस शीट बनने को कहेंगे तो वो नहीं बना पाएगा. आखिर कमीं कहाँ है? 

हमारे देश में पढ़ाई के साथ प्रैक्टिकल ज्ञान को तरजीह नहीं दी जा रही है. विदेशों में हर पाठ्यक्रम के साथ विद्यार्थी को किसी कम्पनी के साथ काम करने की इजाजत मिलती है. इससे उस विद्यार्थी की आम्दानी भी हो जाती है और उसको इसकी क्रेडिट भी मिलती है. उस प्रैक्टिकल कार्य की वजह से उसको उसकी डिग्री मिल जाती है. भारत में भी एस ही होना चाहिए. किसी भी डिग्री का विद्यार्थी रोज ३ से ४ घंटे का समय आराम से निकाल सकता है. अगर वो ३-४ घंटे रोज किसी कम्पनी या उद्योग में काम करता है तो उसको काफी प्रैक्टिकल ज्ञान और दक्षता मिल जायेगी जिसकी मदद से वो हुनर वाला डिग्री धारक बन पाएगा. फिर उसको कोई नौकरी जरूर मिल जायेगी और नौकरी नहीं मिलती है तो वो अपने हुनर की मदद से कुछ न कुछ काम करके अपना पेट तो भर ही लगा. ऐसा डिग्री वाला व्यक्ति जमीनी हकीकत जानने वाला होगा और वो कार्य करने से पीछे नहीं हटेगा. 

जरुरी है उद्योगों से जुड़ाव 
आज इस बात की जरुरत ही की शिक्षण संस्थाएं उद्योग धन्दों के साथ मिल कर चले और अपने विद्यार्थियों को प्रैक्टिकल ज्ञान अधिक से अधिक प्रदान कर उनको सक्षम और सुयोग्य बनाए. आज इस बात की जरुरत है की विद्यार्थी भी अपने प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट को उद्योगों के साथ मिल कर करें ताकि उनके प्रोजेक्ट से उद्योगों को फायदा मिले. हर साल लाखों विद्यार्थी गर्मियों में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग करते हैं. ये विद्यार्थी अगर ईमानदारी से उद्योगों के साथ मिल कर काम करते हैं तो उद्योगों को बहुत फायदा मिलेगा और विद्यार्थियों का भी बहुत विकास हो जाएगा. 

जहरीला है बड़ों का प्यार
आज मात पिता अपने बच्चों से हद से ज्यादा प्यार करते हैं - जो की बच्चों के लिए नुकसानदेय है. मात पिता बच्चों से कोई काम नहीं करवाते हैं और न हीं उनको प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट्स करने देते हैं. वे अपने बच्चों को कोई भी कष्ट नहीं उठाने देना चाहते हैं. इस प्रकार बच्चे दुनियावी हकीकत से दूर होते जा रहे हैं. वो ये नहीं समझ पा रहे हैं की दुनिया में कितनी मुश्किलें आएँगी. इसका नतीजा ये निकलता है की बच्चे विपरीत परिस्थितियों के लिए तैयार नहीं होते हैं. वो हर स्थिति में अपनी जिद मनवाना चाहते हैं. घर में एक - दो बच्चे होने के कारण उनकी हर जिद मानी जाती है लेकिन व्यवहारिक जिंदगी में ऐसा संभव नहीं होता है. 

बढ़ती डिग्री धारी बेरोजगारों की संख्या 
आज डिग्री धरी लोगों की लम्बी कतार है. एक डिग्री धारक के लिए विज्ञापन निकालो तो ५० आएंगे और काम कोई नहीं कर पाएगा. दोषी हम सभी लोग हैं. शिक्षण संस्थाएं चाहे तो एक नयी शुरुआत क्र सकती हैं. उनको अपनी शिक्षण व्यवस्था में बदलाव करना पड़ेगा ताकि विद्यार्थी को डिग्री के साथ काम का प्रैक्टिकल ज्ञान मिले और उसको कोई  न कोई हुनर मिले. शिक्षण संस्थाओं को इस दिशा में जल्द से जल्द शुरुआत करनी पड़ेगी ताकि डिग्री धरी बेरोजगारों की संख्या पर लगाम हो सके. 

कमीं है प्रयोगशालाओं और प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट्स की 
हर शिक्षण संस्था में भरपूर प्रयोगशालाएं और प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट्स होने चाहिए जहाँ पर युवा कोई न कोई हुनर सीख सके. हर विषय में प्रयोगशाला होनी चाहिए. अगर अंग्रेजी सीखने के लिए भी प्रयोगशाला हो तो अगर कॉमर्स सीखना है तो उसकी भी प्रयोगशाला हो. तभी विद्यार्थियों का विकास हो पाएगा. 
हर विषय में विद्यार्थी स्वयं प्रैक्टिस कर के सीखे. अगर उसको कानून की पढ़ाई करवानी है तो उसको कृतिम कोर्ट बना कर के उसमे वकील के रूप में या जज के रूप में काम करवा कर के प्रशिक्षण प्रदान करवाना पड़ेगा. तभी शिक्षा अपने आदर्श स्वरुप में होगी. 

जरुरी है विद्यार्थियों को प्रोत्साहन की
तेकपेडिया जैसी वेबसाइट उन विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करती है जो कोई नया प्रोजेक्ट करते हैं और उस प्रोजेक्ट से प्राप्त ज्ञान को साझा करते हैं. इस प्रकार के प्रयासों से विद्यार्थियों को नवाचार करने और उद्योगों को समझने के लिए प्रोत्साहित करेगा. इस प्रकार के प्रयासों से विद्यार्थियों में प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट्स करने की होड़ लग जायेगी. विद्यार्थियों में नवाचार करने की अद्भुत क्षमता है और उनको प्रोत्साहन देने की जरुरत है फिर तो वो कमाल कर सकते हैं. 
डिग्री के साथ हुनर भी 
मेरा मकसद डिग्री के प्रति निराशा पैदा करना नहीं बल्कि एक सन्देश देना है की डिग्री के साथ हुनर भी जरुरी है. इसकी जिम्मेदारी हम सबकी है. शिक्षण संस्थाओं को पहल करनी पड़ेगी. विद्यार्थियों को इससे बहुत लाभ मिलेगा और हमारा आने वाला कल सुनहरा होगा. आइए डिग्रीयों को कागजी डिग्री नहीं बल्कि हुनर के साबुत के रूप में स्थापित करें. आइए विद्यार्थियों को श्रम, नवाचार और जमीनी धरातल से जोड़ें. आइए विद्यार्थियों को एयरकंडीशन कक्षाओं से निकाल कर मेहनत और मजदूरी करने वाला इंसान बनाएं. आइये आराम पसंद युवाओं को श्रमिक बनायें और फिर से पसीने की मिठास से हमारी अगली पीढ़ी को जोड़ देवे. काश हमारी अगली पीढ़ी भी परिश्रम से उतना ही प्यार करें जितना हमारी पिछली पीढ़ी करती थी. 

स्किल्स इंडिया प्रोग्राम : कुछ अनछुए पहलु



स्किल इंडिया प्रोग्राम अब काफी लोकप्रिय हो रहा है. नेशनल स्किल डेवलपमेंट कौंसिल के द्वारा सरकार सितबंर १४ तक  ३३ लाख से ज्यादा लोगों को प्रशिक्षण प्रदान कर चुकी है. सरकार उस समय तक २३०० करोड़ से ज्यादा निवेश कर के ८०० से ज्यादा तरह के अलग अलग पाठ्यक्रमों में विद्यार्थियों को प्रशिक्षित कर चुकी है. ३५६ जिलों में १४०८ से ज्यादा प्रशिक्षण केन्द्रों पर ये विद्यार्थी प्रशिक्षण ले चुके हैं. आंकड़ों को देखे तो लगता है की ये वाकई बहुत लाबदायक प्रोजेक्ट है. लेकिन कई बार आंकड़ों से ज्यादा पता नहीं चलता है. मुलभुत प्रश्न बाकी है. मैं यहाँ पर कुछ मुलभुत प्रश्न उठाने का प्रयास करूंगा. 

स्किल्स इंडिया प्रोजेक्ट ये मान कर चल रहा है की इंडस्ट्री को एक विशेष स्किल की जरुरत है और उस स्किल के प्रशिक्सिट कर्मचारी प्रदान करना ही हमारा फर्ज है. स्किल इंडिया इस अवधारणा पर आधारित है की इंडस्ट्री की जरुरत को पूरा करना ही हमारी शिक्षा का मकसद है. ये भी माना गया है की सिर्फ तकनीकी प्रशिक्षण और उद्योग धंधों की जरूरतों को समझ कर विद्यार्थियों का विकास किया जा सकता है. अगर सरकारी आंकड़ों पर दृस्टि डालें तो ये लगता है की स्किल इंडिया से ज्यादा सफल कोई कार्यक्रम हो ही नहीं सकता है और वर्षों से हम फ़ालतू ही उच्च शिक्षा की वकालत करते आये हैं. 

स्किल इंडिया प्रोजेक्ट के तहत बड़े पैमाने पर आईटी, रिटेल, बीपीओ आदि क्षेत्रों के लिए प्रशिक्षण दिया गया. क्या हुआ? ज्यादातर इन क्षत्रों में मांग कम हो गयी और पूर्ति ज्यादा हो गयी. अब क्या करेंगे वो प्रशिक्षित कर्मचारी? कौन नौकरी देगा उनको? 
शिक्षा का मकसद किसी एक हुनर का प्रशिक्षण नहीं बल्कि व्यक्ति की चेतना का विकास और उसकी समझ और सूझ बुझ का विकास है ताकि वो किसी भी क्षत्र में सफल हो सके. उच्च शिक्षा का जो मॉडल हम अपना रहे थे उसमे विद्यार्थी को इस प्रकार से प्रशिक्षित किया जाता था ताकि उसको जरा सी और मेहनत कर के किसी भी उद्योग को जमझने और उसमे अपनी पकड़ बनाने में दिक्कत नहीं आये. एक मेकानिकल इंजीनियर जरुरत पड़ने पर सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में भी भाग ले सकता है और जरुरत पड़ने पर इन्जिनीरिंग के अन्य क्षेत्रों में भी काम कर सकता है. लेकिन स्किल इंडिया प्रोजेक्ट में ये संभव नहीं है. यहाँ पर विद्यार्थी की नीव बनाने की जगह पर उसको किसी एक इंडस्ट्री के लिए तैयार किया जाता है. अगर वो इंडस्ट्री खस्ता हाल हो जाए या उसमे तकनीक और कार्यप्रणाली पूरी तरह से बदल जाए तो फिर उस व्यक्ति के पास कोई रास्ता नहीं है. वो व्यक्ति फिर रोजगार के लिए भटकता नजर आएगा. 
उद्योगों को अपनी जरुरत की तकनीक स्वयं प्रदान करनी चाहिए. शिक्षण संस्थाओं का मकसद विद्यार्थियों की नीव को मजबूत बना कर उनको इस योग्य बनाना है की वो किसी भी परिस्थिति में अच्छे कार्यकर्ता बन सकें और उनको मुलभुत तकनीकी और व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करना है. लेकिन ये बात समझ आने में देर लगेगी क्योंकि जब हम ५-१० साल बाद स्किल इंडिया के द्वारा प्रशिक्षित विद्यार्धियों की स्थिति पर गोर करेंगे तो पाएंगे की ज्यादातर लोग बदलते समय के साथ अपने आप को एडजस्ट नहीं कर पाये हैं और जीवन की मुश्किल घड़ियों में अपने आप को असहज महसूस कर रहे हैं. जब १० साल बाद हम स्किल इंडिया के प्रशिक्षति लोगों को नयी तकनीक और नए कार्यप्रणाली के लिए तैयार होने के लिए कहेंगे तो उनको बड़ी दिक्कत आएगी (आम तोर पर हर ८-१० साल में तकनीक और कार्यप्रणाली पूरी तरह से बदल जाती है और उस बड़े बदलाव के लिए तैयारी अपने आप में बड़ी चुनौती होता है - जैसे पिछले दशक में बैंकों में कम्प्यूटरीकरण से बड़े पैमाने पर बदलाव आया. ) 

स्किल इंडिया प्रोग्राम के तहत आज वो पाठ्यक्रम हैं जिनके लिए पहले से ही काफी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम मौजूद हैं. जिन पाठ्यक्रमों की आज जरुरत हैं और जिन पाठ्यक्रमों की भविष्य में जरुरत पड़ेगी उनका कहीं अता पता नहीं है. जैसे आज सोलर एनर्जी, विंड एनर्जी, बायो-वेस्ट मैनेजमेंट, प्लास्टिक रीसाइक्लिंग, फाइनेंसियल रिपोर्टिंग, कार्बन क्रेडिट एकाउंटिंग आदि पाठ्यक्रमों की सख्त जरुरत है और इस प्रकार के पाठ्यक्रम कहीं पर भी उपलभ्ध नहीं हैं. लेकिन फिर भी इस प्रकार के पाठ्यक्रम स्किल इंडिया प्रोग्राम के तहत नहीं शुरू किये गए हैं. जब पूरी दुनिया आज सावर ऊर्जा और इस प्रकार की तकनीक पर जोर दे रही है तो फिर हमारी सरकार इस दौड़ में पीछे क्यों है? स्किल इंडिया प्रोग्राम में सरकार और निजी क्षेत्र मिल कर करोड़ों रूपये के संसाधन खर्च कर रहे हैं तो क्यों नहीं फिर सस्टेनेबल डेवलपमेंट और नवीन तकनीक पर आधारित उद्योगों पर ही जोर दिया जाए. 
स्किल इंडिया प्रोग्राम के लिए संस्थाओं के पंजीयन के लिए जो मानदंड बनाए गए हैं वो भी मुझ जैसे शिक्षाविदों के गले नहीं उतरते - समझ नहीं आता है की लोगों को सक्षम बनना है या सक्षम कंपनियों को और सक्षम बनना है. सरकारी नीतियां जिस प्रकार से बड़े उद्योगों को  मदद कर रही है उसी प्रकार से स्किल इंडिया प्रोग्रम्म को चलाया जा रहा है. 

स्किल इंडिया प्रोजेक्ट भयंकर बेरोजगारी के इस भीषण समय में एक दवाई की तरह है जो शायद एक बार के लिए तो राहत दे सकती है लेकिन ये हमारे युवाओं को एक मजबूत नीव नहीं प्रदान कर सकती और उसके लिए हमें चाहिए की हमारे यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम इतने सक्षम हो की हम युवाओं को एक चुनौती भरे कल के लिए तैयार कर सकें. 
एक बून्द पसीने की - एक बून्द आँखों की 
नमन हो श्रम -साधना को समर्पित हर इंसान को 



१ मई का दिन श्रम को समर्पित दिवस है. ये वो दिवस है जब पूरी दुनिया श्रम को सलाम करती है. असल में पूरी दुनिया के पालनहार दो ही वर्ग हैं - श्रमिक और किसान. इन दोनों वर्गों के कारण ही सार उत्पादन होता है - तो स्वाभाविक है की इन दोनों वर्गों को उचित सम्मान दिया जाए. दो तिहाई दुनिया श्रमिक या किसान के रूप में हमारी सेव कर रही है. ये वो लोग हैं जो अपने खून की कमाई से अपना पेट भरने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन उस थोड़ी बहुत कमाई पर भी लोगों की काली नजर  लग जाती है और कोई इन पर टैक्स लगने की सोचता है तो कोई इन से राजनीतिक रोटियां सेकने के बारे में सोचता है. कम से कम आज के दिन तो हर किसी को श्रम को सम्मान और श्रद्धा से नतमस्तक हो जाना चाइये. श्रम यानि हुनर, श्रम यानि मेहनत, श्रम यानि लगन, श्रम यानि कठोर परिश्रम, श्रम यानि तकनीकी दक्षता.  

श्रम कई प्रकार का है.  एक वो जो बड़ी बड़ी कम्पनियों में दिखने को मिलता है. एक वो जो कॉन्ट्रेक्ट श्रमिकों में दिखने को मिलता है. एक वो जो हमारे घर के आस पास हर जगह दिखाई देता है. सरकारी कंपनियों और बड़ी कंपनियों में श्रमिकों के लिए पर्याप्त सामजिक सुरक्षा का प्रावधान है. लेकिन दुनिया के दो तिहाई श्रमिकों को ये सब नसीब नहीं होता है. सामजिक सुरक्षा की व्यवस्था आज भी बहुत सीमित है. स्वास्थ्य, चिकित्सा, शिक्षा, ऋण सुविधा आदि कुछ बुनियादी सुविधाएं हर श्रमिक को चाहिए - आज भी पहल का इन्तजार है. 

चाहे ईएसआई अस्प्ताल हो या प्रोविडेंट फण्ड हो, या ग्रेचुति   का लाभ हो, या कंपनसेशन हो, सरकारी श्रमिकों को तो ये लाभ मिल जाते हैं - बाकी सब राम भरोसे हैं. श्रमिक का क्या दोष? श्रमिक तो श्रमिक है, उसको इन सब का अधिकतम फायदा मिलना चाहिए - पर इन मुद्दों पर मेरी कलम बीएस कुछ अफ़सोस प्रकट कर सकती है - कुछ होना जाना है नहीं. ईएसआई अस्प्ताल के द्वार असण्ठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए खोलने के लिए कोई बोलने वाला चाहिए. असल में निजी क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को ही तो सरकारी मदद की अधिक जरुरत है. लेकिन क्या करें - जिनको ज्यादा जरुरत है  - उनके लिए कोई मदद भी नहीं है और कोई आवाज उठाने वाला भी नहीं है. श्रम संगठन भी संगठित क्षेत्र की ही वकालत करते हैं. 

आज नयी पीढ़ी में श्रम के प्रति सम्मान और श्रद्धा का भाव पैदा करने की जरुरत है. आज जहाँ नयी पीढ़ी पूंजीवाद की चकाचौंध से भ्रमित हो सिर्फ पूंजी की आराधना जानती है. लेकिन हमें तो उनको फिर से श्रम के प्रति नतमस्तक करने का प्रयास करना है. जहाँ जहाँ पर किशोरों को श्रम का महत्त्व सिखाया जाता है वहां वहां पर निश्चित विकास होता है 
श्रम के प्रति सम्मान पैदा करने के कई उपाय है - जैसे - १ मई को श्रम दिवस के रूप में मनना,  श्रमिकों, कलाकारों, व् मेहनत करने वाले लोगों का सम्मान करना, श्रम को प्रेरित करने वाले कथानकों को प्रचारित करना, भगवान् विस्वकर्मा की पूजा और परिश्रम को प्रोत्साहन. 

लोगों को परिश्रम के लिए प्रेरित करना और उनको हुनर सीखना बहुत ही मुश्किल कार्य है. आज सरकार करोड़ों रूपये के स्किल इंडिया प्रोजेक्ट के द्वारा भी ये कार्य करने में सफल नहीं हो पा रही है. लेकिन भारत में वर्षों से श्रम को जीवन का आधार मानने वाले लोगों को सरकार अनदेखा क्र रही है और नजरअंदाज कर रही है. सही कहा है किसी ने - घर की मुर्गी दाल बराबर - यानि अपने घर में हुनर की पूछ नहीं होती है. 

भारत में सोनार, कुम्हार, लोहार, आदि सदियों से अद्भुत कल और हुनर को पीढ़ी दर पीढ़ी संजोते आये हैं. ये अद्भुत कलए हैं. अगर स्किल इंडिया प्रोजेक्ट से ये कल सिखाने का प्रयास किया जाए तो करोड़ों खर्च करने के बाद भी इन के जैसे दक्ष कारीगर नहीं तैयार हो पाएंगे. इनकी अद्भुत कल को सलाम करने और इनको सब्सिडी, या आर्थिक सहायता देने की बजाय सरकार इन के साथ सौतेला बर्ताव कर रही है. ये असल में भारत के आधार हैं और अगर इनको सरकार उचित सम्मान देवे तो ये लोग अपनी कल दे दम पर पूरी दुनिया में एक्सपोर्ट बढ़ा सकते हैं और अपने देश की अर्थव्यवस्था को सातवें आसमान पर ले जा सकते हैं. वैसे आज भी पूरी दुनिया में भारत की नक्काशी, जेवरात, हस्तकला आदि निर्यात होती है - वो भी बिना सरकारी सहायता के. जहाँ सरकार दूसरे क्षेत्रों के लिए पैसे पानी की तरह बहाती है - तो क्या भारत के इन परम्परागत वैज्ञानिकों और श्रम साधकों को सहायता नहीं दे सकती? ऊपर से अब इनको भी एक्साइज व् अन्य प्रकार के कानून के जाल में फंसाने की तैयारी हो रही है. आप स्वयं सोचिये - ये लोग अपना हुनर अपनाएँ और दाल रोटी के लिए संघर्ष करें या टैक्स के कागजात  तैयार करवाने में अपना समय बर्बाद करें?  क्या चाहती है सरकार? क्या सरकार चाहती है की ये वर्षों पुरानी कलाएँ बंद हो जाएँ? क्या वर्षों से चली आ रही अद्भुत कल और जीविका का आधार हमेशा के लिए लुप्त हो जाए? इनके साथ ही इनका अद्भुत ज्ञान, इनकी अद्भुत कल, दक्षता, कर्मठता लुप्त हो जाए? आज के इस दौर में कोई भी कलाकार अपने बच्चों से उस कल को सीखने के लिए नहीं कह रहा है - वो कहता है "सरकारी कलर्क बन जावो पर ये काम मत करो". जिस दिन पूरी दुनिया हमारे दक्ष कलाकारों को सम्मान करेगी तब सरकार की नींद खुलेगी और शायद तब तक बहुत देर हो चुकी होगी. 

मुझे पता है की मुझ जैसे नाचीज की कोण सुनेगा - पर मीडिआ के इस सशक्त माध्यम से मैं आप सब से अनुरोध करता हूँ की भारत की अद्भुत परम्परागत कल को बचने के लिएमेरे साथ दुआ करिये की इस देश में फिर से श्रमिकों, कारीगरों, कलाकारों, आदी को सम्मान मिले और सरकार उनकी बात को तरजीह देवे और उनको भी सुने और इस तरह से नजर-अंदाज न करें जैसे आज किया जा रहा है. सोनारों को भी एक वैज्ञानिक मान जाए और वैज्ञानिकों की तरह शोध और अनुसंधान करने के लिए प्रोत्साहन हो और पूरा सरकारी प्रोत्साहन हो (कितने अफ़सोस की बात है की इन वैज्ञानिकों की इतनी लम्बी हड़ताल के बाद भी सरकार टस से मस नहीं हुई - क्योंकि ये लोग अपने पेट पर लात मार क्र हड़ताल कर रहे थे). दुवा करिये की सोनारों को टैक्स विभाग के चक्कर नहीं लगने पड़े बल्कि विदेशी आयातक उनके चक्कर लगाएं और पूरी दुनिया में उनके हुनर का गुणगान हो. विदेशी अर्थशास्त्रियों की दीवानी हमारी सरकार शायद मेरे विचारों को तरजीह नहीं देगी लेकिन आप जैसे आम आदमी तो जरूर देंगे. विश्वास करिये जब जब सरकारों ने हमारे श्रमिकों और कलाकारों का सम्मान किया था तब तब पूरी दुनिया में हमारे देश की अद्भुत पहचान बनी थी. एक समय था पूरी दुनिया हमारे कारीगरों की दीवानी थी और अंग्रेजों को बड़ी ही मेहनत करनी पड़ी थी हमारे श्रमिकों को खत्म करने में. इतिहास फिर से जीवित हो रहा है और आज फिर से आप हम को हमारे सोनार भाइयों के साथ हमदर्दी जताने की जरुरत है और उन सरकारी प्रयासों का विरोध करने की जरुरत है जिनका मकसद एक श्रमिक को उसके श्रम और साधना से वंचित करने का है. 

आइए आज के दिन श्रम को सम्मान करने की हमारी परम्पराओं को फिर से नमन करें और छोटे छोटे प्रयासों से ही सही भारत मन के गुमनाम श्रमिकों की मदद करने का प्रयास करें. असंगठित क्षेत्र, परम्परागत कला के क्षेत्र, निजी क्षेत्र से जुड़े श्रमिकों को हमारी मदद की जरुरत है. हम सब मिल कर प्रयास करेंगे तो कभी न कभी सरकार सभी सरहमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा के प्रयास शुरू करेगी ही और फिर कोई पसीने की बून्द बेकार नहीं जायेगी.