Wednesday, August 1, 2018

शिक्षा में नए दौर की जरुरत - गुरु और गुरुकुलों की जरुरत

शिक्षा में नए दौर की जरुरत - गुरु और गुरुकुलों की जरुरत



दो शताब्दियों की अंग्रेजों की गुलामी के दौर ने भारत के महान शैक्षणिक तंत्र को खत्म कर दिया. उसी महान तंत्र के कारण भारत में अनेक ऋषि, अनेक विद्वान  और अनेक वैज्ञानिक हुए. उस शिक्षा व्यवस्था में मानवीय मूल्यों, संस्कारों और जीवन के प्रति समग्र दृष्टिकोण को स्थापित किया जाता था. आज पूरी दुनिया को उस अद्भुत व्यवस्था की जरुरत है.
आज  शिक्षा को ले कर अनेक प्रयोग हो रहे हैं लेकिन आज पूरी दुनिया को फिर से गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था की जरुरत है. उस व्यवस्था में शिक्षक विद्यार्थी को परखता था और फिर उसको शिक्षा प्रदान करता था. गुरुकुल के गुरु जीवन से सम्बंधित हर महत्वपूर्ण  विषयों पर विद्यार्थियों  का  मार्गदर्शन करते थे और हर एक विद्यार्थी  को अपनी अपनी रुचि का ज्ञान पाने का अवसर मिलता था ।
एक बार विषय निश्चित हो जाता, तो उसकी शिक्षा का आरंभ होता था । गु्रुकुल की शिक्षा पध्दति आज की शिक्षा पध्दति से भिन्न थी । जिसे जो विद्या सीखनी होती थी, उसे उसी विषय के शिक्षक के तथा अन्य विद्यार्थियों के साथ ही रखा जाता था । उसी वातावरण में रहकर वह अन्य लोगों का अनुकरण करके विद्या ग्रहण करता था । यह सब सीखते समय कुछ शंका निर्माण होती थी, तब शिक्षक उसका मार्गदर्शन करते थे । विद्यार्थी अपनी शिक्षा उचित प्रकार से ग्रहण करता नहीं हो, तो यह बात ज्येष्ठ विद्यार्थी या शिक्षक जान जाते थे और उसकी गलती सुधारी जाती थी ।
शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए सही परीक्षा प्रणाली बहुत आवश्यक है. आज विद्यार्थी सिर्फ रट कर के परीक्षा उत्तीर्ण कर लेते हैं. मास्टर्स तक की पढ़ाई करने के बाद भी विद्यार्थी अपने विषय के भी काम नहीं कर सकते हैं - किसी और विषय के बारे में तो क्या बात करें. इसका कारण है की हमारी परीक्षा प्रणाली सैद्धांतिक है.

गु्रुकुल में परीक्षा की पध्दति आज जैसी नहीं थी । इसलिये ज्ञान ग्रहण करते समय विद्यार्थी के मन में कोई भय नहीं होता था । विद्यार्थी को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इस पर शिक्षकों का ध्यान होता था । यही कारण था कि विद्यार्थी अपनी प्रगति समझकर, आगे की शिक्षा प्राप्त करने या न करने का निर्णय ले सकता था । इसी प्रकार शिक्षा प्राप्त करने के साथ ही वह उसमें प्रवीण हो जाता था और उसी के अनुसार व्यवसाय चुनता था
अपने घर का मोह त्यागकर विद्यार्थी को गु्रुकुल में ही रहना प‹डता था। यहां सभी विद्यार्थियों की वेशभूषा बड़ी ही सादगी वाली होती थी, सब को एक जैसा ही सादा लेकिन  सात्विक  भोजन मिलता था और अल्प जरूरतों के साथ कैसे रहें, इसकी भी शिक्षा दी जाती थी क्योंकि गु्रुकुल में प्रवेश करने के बाद केवल विद्या अर्जित करना ही हर एक का लक्ष्य होता था। विद्यार्थी को सुबह जल्दी उठने, जल्दी नित्य क्रिया कर्म करने और सुबह सुबह बड़ों का सम्मान करने की आदत गुरुकुल से ही मिल जाती थी जो पूरी जिंदगी साथ ही चलती थी. 
आज की शिक्षापध्दति में विद्यार्थी यही मानकर चलते हैं कि विद्यार्जन करना गौण बात है । इसलिए उनका ज्यादा समय अन्य बातों में ही गुजरता है। शिक्षा लेने का समय काफी कम होता है, किंतु ज्ञान ग्रहण करने का जो प्रमुख काल होता है, उसमें ज्यादा से ज्यादा समय ज्ञान ग्रहण में दिया जाए, तो परिपूर्ण विद्या प्राप्त होती है । इसीलिये जहां ज्ञान ग्रहण करना हो, वहां का वातावरण भी उसके लिए उचित होना जरूरी है और ऐसे उचित वातावरण में रहने से मन पर केवल विद्या ग्रहण करने के ही संस्कार होते हैं । यही कारण है कि भारत में विद्या ग्रहण करने के लिए गु्रुकुल में ही रहने की अनिवार्यता थी । गु्रुकुल में अनेक विद्याएं सिखाई जाती थीं और उस विषय का तज्ज्ञ व्यक्ति उसका ज्ञान देता था । ऐसे व्यक्ति को शिक्षक कहा जाता था । शिक्षक विद्यार्थी को एक विषय के अंदर सफल बनाता है लेकिन गुरु तो जीवन में सफल बनाता है. आज गुरुओं की जरुरत है. जीवन को सफल बनाना है. फिर से स्वर्णिम काल आ रहा है. अगर हर व्यक्ति को दिशा मिल जाए तो फिर इसी जीवन में हर कोई केवली यानी परम ग्यानी बन सकता है. भारतीय भूमि में सुख शान्ति और सुशाशन का नया दौर लाने के लिए सबसे पहली पहल शिक्षा व्यवस्था में सुधार से ही शुरू होगी. शिक्षा सिर्फ रोजगार का जरिया नहीं है - ये तो जीवन को निखारने का और जीवन को नयी दिशा देने का जरिया है ताकि जीवन को हर क्षेत्र में सफल बना सकें. ये सिर्फ भारतीय शिक्षा व्यवस्था से ही सम्भव है.

CAREER मार्गदर्शन

CAREER मार्गदर्शन  

बेरोजगारी इस लिए नहीं है की रोजगार नहीं है. बेरोजगारी इस लिए है क्योंकि युवाओं को पता नहीं की क्या तैयारी करें और कैसे तैयारी करें. उनको नहीं पता की आने वाले समय में किस तरह के रोजगार के अवसर आएंगे. वे आने वाले समय की सम्भवनाओं से अनभिज्ञ हैं. उनको सही मार्गदर्शन और जानकारी नहीं मिलती है और प्रोत्साहन के आभाव में वे सही दिशा नहीं ले पाते हैं. वे गिने चुने सरकारी कम्पीटिशन के  लिए तैयारी करते हैं जहाँ उनको जाती आधारित आरक्ष्ण व्यवस्था के कारण आगे बढ़ने का मौका नहीं मिल पाता है.  एक नौकरी के लिए १०००० लोग लाइन में लगे होते हैं. बेरोजगारों में हताशा फैलने लग जाती है और उस हताशा का फायदा राजनेता उठाते हैं जो उनको आंदोलनों और गन्दी राजनीति के गलियारों में धकेल देते हैं. अजित फाउंडेशन ने मार्गदर्शन  कार्यक्रम से अनेक युवाओं को लाभान्वित किया है और इस प्रकार के कार्यक्रमों की जरुरत है. 


आर्थिक तरक्की के साथ रोजगार भी क्रम से बदलते रहते हैं. पहले इंजीनियर की नौकरियां निकलती है, फिर व्यापार और उद्योगों के बढ़ने से सेवा क्षेत्र में तरक्की शुरू होती है और फिर वाणिज्य और सेवा क्षेत्र के लिए रोजगार निकलने लग जाते हैं और फिर एक तरह से उद्यमिता के लिए एक माहौल तैयार हो जाता है और लोग उद्यमिता को अपनाना शुरू कर देते हैं. जैसे जैसे आर्थिक तरक्की बढ़ती जाती है वैसे वैसे रोजगार के नए अवसर निकल कर सामने आने लग जाते हैं. सरकारी नीतियां  और प्रोत्साहन भी उद्योग और व्यापार की दिशा और दशा तय करते हैं.   किसी समय में अरब क्षेत्र में सिर्फ रेगिस्तान था और इस कारण वहां पर रोजगार के अवसर नहीं होते थे लेकिन पहले तेल की खोज और फिर वहां पर व्यापार, उद्यम, पर्यटन आदि क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढे.


किसी भी देश में आर्थिक तरक्की के साथ व्यापार और  वाणिज्य  के क्षेत्र  में रोजगार की संख्या में बहुत तरक्की होने लग जाती है. भारत में भी आने वाले समय में वाणिज्य के क्षेत्र में बहुत तरक्की होने की सम्भवना है. वाणिज्य क्षेत्र में (जिसमे बैंकिंग, इन्सुरेंस, सेवा, पर्यटन आदि शामिल है) में ४० लाख से ज्यादा रोजगार अगले ५ वर्षों में आएंगे. अतः युवाओं में इस क्षेत्र में उत्साह है. बीकानेर में हमेशा से वाणिज्य के क्षेत्र में रुझान रहा है. पुरे भारत के शीर्ष स्थान हासिल करने का गौरव बीकानेर के विद्यार्थियों को मिला है. चार्टर्ड एकाउंटेंसी में बीकानेर की आरती जैन, कंपनी सेक्रेटरी में राम पुगलिया आदि पुरे भारत में शीर्ष स्थान ला चुके हैं. हर वर्ष अनेक विद्यार्थी पहले ५० शीर्ष स्थानों में अपना नाम लिखा लेते हैं - और ये सिर्फ बीकानेर में रह कर तैयारी कर के लाते हैं.

वाणिज्य के क्षेत्र में पढ़ाई आज भी बहुत सस्ती है और बीकानेर में रह कर की जा सकती है. बीकानेर में रह कर चार्टर्ड एकाउंटेंसी, कंपनी सेक्रेटरीशिप, कॉस्ट एकाउंटेंसी, एक्चुअरी, अमेरिकन चार्टर्ड एकाउंटेंसी, मैनेजमेंट एकाउंटेंसी, इंग्लैंड के चार्टर्ड एकाउंटेंसी, चार्टर्ड फाइनेंसियल एनालिस्ट आदि के पाठ्यक्रम किए जा सकते  हैं. नियमित पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी बहुत ही कम लागत पर ये पढ़ाई कर सकते हैं. बीकानेर में इन क्षेत्रों में बहुत अच्छा मार्गदर्शन भी मिल जाता है. लेकिन इन क्षेत्रों में अभी तक रोजगार बीकानेर शहर में नहीं मिलता है अतः पढ़ाई के बाद रोजगार के लिए बड़े शहरों में प्रस्थान करना पड़ता है. इन सभी क्षेत्रों में अच्छे रोजगार मिल जाते हैं. वाणिज्य के अधिकाँश पाठ्यक्रम पत्राचार में उपलब्ध है लेकिन विद्यार्थी तभी सफल हो सकते हैं अगर वे पढ़ाई में नियमित रहें.

इच्छुक विद्यार्थियों को पिछले वर्षों के प्रश्नपत्र जरूर देखने चाहिए और अपनी संस्था के स्टडी मटेरियल को नियमित रूप से जरूर पढ़ना चाहिए. इच्छुक विद्यार्थियों को इस क्षेत्र के पुस्तकालयों का भी लाभ लेना चाहिए और अच्छी से  अच्छी पुस्तकें और विविध पुस्तकें पढ़नी चाहिए.  शोध के क्षेत्र में अच्छी पढ़ाई करने के लिए जे आर ऍफ़ की परीक्षा पास कर के स्कॉलरशिप प्राप्प्त की जा सकती है.

अर्थशास्त्र से परे....... रिलेटिव इकोनॉमिक्स

अर्थशास्त्र से परे....... रिलेटिव इकोनॉमिक्स और अन्य दर्शन


अर्थशास्त्र लोगों को सिर्फ और सिर्फ भौतिक प्रगति और आर्थिक साधनों पर ही केंद्रित करता है - जो देश के समग्र विकास के लिए उचित नहीं है. आज जरुरत है अलग सोच. भूटान जैसे देश ने हैप्पीनेस को आधार बना कर एक आदर्श प्रस्तुत किया है. प्रस्तुत है रिलेटिव इकोनॉमिक्स का विचार - जो आचार्य महाप्रज्ञ ने भारतीय दर्शन के आधार पर प्रस्तुत किया. रिलेटिव इकोनॉमिक्स विकास की एक ऐसी आधारशिला है जिसमे हम विकास की योजना बनाते समय निम्न को प्राथमिकता देते हैं : -



१. मानवीय मूल्य,

२. नीतिशास्त्र

३. संतुलित विकास की अवधारणा

४. मानवीय मूल्यों पर आधारित विकास के सोपान

५. अहिंसा और अपरिग्रह पर आधारित आर्थिक और सामाजिक ढांचा

६. विविधता को संजोने और संरक्षित करने वाली नीतियां



वर्तमान आर्थिक योजनाओं का केंद्र सिर्फ जीडीपी रहता है यानी येन केन प्रकरण उत्पादन बढ़ाना और उसके आंकड़ों से विकास को मापना - भले ही इस प्रक्रिया में समाज के लिए हानिकारक वस्तुओं का उत्पादन बढे. समाज पर उत्पादों के प्रभाव का विश्लेषण नहीं किया जाता है और इन सब प्रश्नों  को "मार्किट फोर्सेज" के हवाले कर दिया जाता है. आज का नीति निर्माता यह नहीं देखता की उसके द्वारा उपभोग को बढ़ावा देने की नीति के कारण किस प्रकार की वस्तुओं और किस प्रकार के मूल्यों को बढ़ावा मिल रहा है. आज का अर्थशाष्त्री अपने को नीतिशास्त्र से दूर रखना चाहता है. इन सभी कारणों से आज के आर्थिक योजनाकारों ने ऐसी योजनाएं बना दी हैं जिनके कारण समाज, परिवार और यहाँ तक की मानव मात्र का मूल्यों से नाता टूट रहा है. इस विखंडित होते समाज को देख कर सभी लोग दुखी हैं और आज सब यह मान रहें हैं की मूल्य विहीन आर्थिक नीतियां समाज को नुक्सान पहुंचा रही हैं.हमारी नीतियों के कारण हर रोज अनेक वनस्पतियां लुप्त हो रहीं हैं और जैव-विविधता को खतरा हो गया है. हर दिन किसी ने किसी प्रजाति के लुप्त होने  की स्थितियां बनाने के लिए हमारी आर्थिक नीतियां भी जिम्मेदार हैं. आज मानवीय लिप्सा के कारण जंगल, पेड़, वन्य प्राणी और जीव जंतु सबके अस्तित्व को खतरा है.  आज आर्थिक नीति निर्माताओं को एक विकल्प की जरुरत है क्योंकि अगर इसी प्रकार की नीतियां जारी रहीं तो मानव मात्र के अस्तित्व को भी खतरा हो जाएगा. आर्थिक नीति निर्माताओं के पास कोई विकल्प नहीं हैं. आज हम सब को एक विकल्प नजर आ रहा है जो आचार्य महाप्रज्ञ जी ने रिलेटिव इकनोमिक के रूप में दिया था. आचार्य महाप्रज्ञ जी ने रिलेटिव इकोनॉमिक्स के रूप में हमें भविष्य की समस्याओं का एक समाधान दिया है. आने वाले समय में निम्न समस्याओं का सामना करने के लिए हम पूरी तरह से तैयार नहीं हैं और यह बात संयुक्त राष्ट्र भी मानता है : -



अ. क्लाइमेट चेंज - यानी बढ़ते तापमान के कारण होने वाली समस्याएं

आ . मानवाधिकारों के उल्लंघन की समस्या व् बढ़ती हिंसा व् असंतोष

इ . प्रदुषण व् अन्य मानव  कृत समस्याएं जो हम सब व्यक्तियों के लिए अस्तित्व का खतरा बना सकता है

ई . पर्यावरण व्  जैव-विविधता को खतरा



उपर्युक्त सभी समस्याओं की जड़ में जाते हैं तो हम पाते हैं की हमारी भोगवादी आर्थिक नीतियां ही इन समस्याओं के लिए जिम्मेदार हैं. आज अनेक अर्थशाष्त्री यह मान रहें हैं की वर्तमान आर्थिक नीतियां हमारी समस्याओं का समाधान करने की जगह हमें मुश्किलों में दाल रहीं हैं. हमारी आर्थिक नीतियां बनाने वाले लोग स्वयं मान रहें हैं की उनकी आर्थिक नीतियां "सस्टेनेबल डेवलपमेंट" नहीं कर सकती. आज तो प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी मान लिया है की योजना आयोग को हटा कर इसकी जगह कोई नयी संस्था बनाने की जरुरत है ताकि एक बेहतर और विस्तृत योजना बनायीं जा सके जो इस देश के विकास में मदद कर सके.



रिलेटिव इकोनॉमिक्स का आधार भगवान महावीर का जीवन दर्शन है. भगवान महावीर ने गृहस्थों को जीवन जीने के लिए कई मार्गदर्शन प्रदान किये थे, जैसे : -

अ. उपभोग में संयम की जरुरत है. सिर्फ उपभोग के लिए उपभोग नहीं होना चाहिए बल्कि मानव के कल्याण के लिए उपभोग होना चाहिए

आ . स्याद्वाद के रूप में एक ऐसी व्यवस्था जिसमे लोग अपने विचारों से अलग विचारों का भी सम्मान कर सकें और विचारों में विविधता को स्वीकार सकें

ई . प्रकृति में हर प्राणी, हर आत्मा को अपना कल्याण करने का हक है और अपनी गति से जीने और रहने का हक है. महावीर ने तो भूमि, अग्नि, और जल में भी आत्मा की अभिव्यक्ति को स्वीकारा है. यानी प्रकृति के साथ किसी भी रूप में अन्याय नहीं होना चाहिए. यही मन्त्र आज जय-विविधता को बचने के लिए जरुरी है.



रिलेटिव इकोनॉमिक्स को एक जीवन प्रशिक्षण के रूप में लागू किया जाना

कई विश्व-विद्यालय रिलेटिव इकोनॉमिक्स को एक विषय के रूप में शुरू कर रहें हैं. आज यह मन जा रहा है की रिलेटिव इकोनॉमिक्स के प्रशिक्षण से हम नै पीढ़ी को एक बेहतर इंसान बना पाएंगे और उनको मानवीय मूल्यों से जोड़ पाएंगे. आज हमें युवाओं में मूल्यों पर आधारित नेतृत्व का अभाव नजर रहा है जिसका कारन हमारी शिक्षा व्यवस्था है.  रिलेटिव इकोनॉमिक्स मूल्य आधारित व्यवस्थाओं को स्थापित करने की दिशा में एक अभिनव पाठ्यक्रम साबित होगा.



रिलेटिव इकोनॉमिक्स के मुख्य प्रशिक्षण बिंदु

रिलेटिव इकोनॉमिक्स में निम्न बिन्दुओं पर मुख्य रूप से प्रशिक्षण दिया जाएगा : -

अ. मानवीय जीवन मूल्य आधारित संयम को प्रोत्साहित करने वाली आर्थिक और सामजिक नीतियां और व्यवस्थाएं

आ. सोशल आंतरप्रीन्यूरशिप - यानी सामजिक उद्यमिता  - जिससे युवा वर्ग समाज का विकास करने के लिए अपना व्यापर या उद्यम स्थापित करे और समाज के विकास को प्राथमिक लक्ष रख कर ही नए उत्पाद और नयी सेवाएं विकसित करें. उद्यमिता की प्रक्रिया में नए उत्पाद और नयी सेवाओं के निर्माण की प्रक्रिया भी इस के प्रशिक्षण का हिस्सा होगा यानी जो भी उत्पाद या सेवाएं बनायीं जाएँ उनका आधार प्रकृति और पर्यावरण से तालमेल होना चाहिए.

ई. पर्यावरण और प्रकृति केंद्रित व्यवष्टयं : -समाज के बहुआयामी विकास के लिए नयी व्यवस्थाएं बनाने हेतु नेतृत्व - जो हर क्षेत्र में प्राणी मात्र के सह-अस्तित्व को स्वीकार करे.



रिलेटिव इकोनॉमिक्स आधारित एनवायरनमेंट एंड सोशल ऑडिट

आज का अंकेक्षक सिर्फ लाभ हानि या मौद्रिक मूल्याङ्कन पर ही नजर रखता है. रिलेटिव इकोनॉमिक्स पर्यावरण और समाज पर पड़ने वाले परिणाम के मूल्याङ्कन पर जोर देता है अतः भविष्य की जरुरत के अनुसार अंकेक्षण का दायरा भी विस्तृत होना चाहिए.



नयी तकनीक, नयी जीवन-शैली

फैशन के बारे में कहा जाता है की यह घूम फिर कर वापस आती है. रिलेटिव इकोनॉमिक्स हमारे टेक्नोलॉजिस्ट्स को फिर से जमीन से जुड़े उत्पाद बनाने के लिए प्रेरित कर फिर से नए उत्पाद और नयी जीवन शैली को प्रोत्साहित करता है जो की काफी सीमा तक हमारी परम्परों से जुड़ा है. यानी जो उत्पाद और जो जीवन शैली भारत के भू भाग से लुप्त हो गयी है उसको वापस खोजने की जरुरत है. अब ऐसे उत्पाद बनाने पड़ेंगे जो पर्यावरण के अनुकूल होंगे, जैसे हम लोग सैकड़ों वर्ष पहले प्रकृति की गोद में रह कर बिना प्रकृति को नुक्सान पहुंचाए उपभोग करते थे. आज फिर से ऐसे शोध कर्ताओं की जरुरत होगी जो प्रकृति - प्रेमी हों और प्रकृति के अनुकूल नयी तकनीक को प्रोत्साहन देवें.

वर्तमान आर्थिक योजनाओं को रिलेटिव इकोनॉमिक्स की जरुरत

आज हम देख रहें हैं की योजना बनाते समय हमारे योजनविद मानवीय मूल्यों को यह मानते हुए नजर-अंदाज कर देते हैं की इनका आंकड़ों में प्रस्तुतिकरण सम्भव नहीं है. इस प्रकार हमारी योजनाएं मानवीय मूल्यों से निरपेक्ष होती हैं. मूल्य विहीन योजनाएं हमें अपने जीवन और चेतना से भी विहीन कर देगी. अतः आज फिर से एक मुहीम की जरुरत है की जो भी नीति निर्माता हो वे मूल्य आधारित नियोजन यानी रिलेटिव इकोनॉमिक्स का प्रशिक्षण लेवें और इसी के लिए अपने आप को तैयार करें.



अंतरास्ट्रीय सम्मलेन

दिनांक १ व् २ नवम्बर २०१४ को दिल्ली में रिलेटिव इकोनॉमिक्स का  ९ वां संमेलन आयोजित किया गया. इस अवसर पर आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा की अर्थशास्त्रियों को भी जीवन मूल्यों और जीवन दर्शन को अपनी योजनावों का आधार बनाना चाहिए. इसी अवसर पर पधारे विविध विषय विशेषज्ञों ने भी इस बात को माना की आज एक ऐसे आर्थिक ढांचे की जरुरत है जिसमे हम मानव जीवन  मूल्यों को आधार बना कर अपनी योजनाएं बनायें न की योजनाओं को बनाते समय  मानव मूल्यों को नजर अंदाज करें. इसी सम्मलेन में मैंने रिलेटिव इकोनॉमिक्स के लिए प्रस्तावित रिसर्च और डॉक्यूमेंटेशन सेंटर का प्रारूप प्रस्तुत किया. आज सभी शिक्षा विद यह मान रहें हैं की रिलेटिव इकोनॉमिक्स की जरुरत है और जैसे ही रिलेटिव इकोनॉमिक्स पर आधारित पाठ्य पुस्तकें उपलभ्ध होंगी, वे उन को लागू कर के युवाओं को एक नयी दिशा देने का प्रयास करेंगे.

योजना निर्माण की नयी प्रणाली

आज फिर से योजना आयोग के पुनर्गठन की बात हो रही है. प्रधान-मंत्री महोदय ने योजना आयोग की जगह पर एक नयी संस्था के गठन की बात कही है. अगर हम अंतरास्ट्रीय स्टार पर देखें तो पाते हैं की १९४५ में स्थापित संयुक्त राष्ट्र ने जीवन के विविध आयामों पर विविध नीति निर्मात्री संस्थाओं का गदहन किया है जैसे १९८८ में ipcc , १९६५ में UNDP  आदि. फिर भी संयुक्त राष्ट्र आज भी मानवीय मूल्यों को प्रोत्साहित करने वाली एक संस्था की कमी महसूस कर रहा है. इसी प्रक्रिया में २००६ में एक प्रस्ताव पारित कर मानव अधिकार कौंसिल स्थापित करने का फैसला लिया गया. भारत में भी आज समय की मांग यही है की योजगा बनाने वाली संस्था एक जीवन मूल्यों को आधार बना कर योजना बनाने वाली संस्था बने. हमें उम्मीद है की हमारे देश में इस प्रकार जीवन  मूल्य आधारित नियोजन की प्रक्रिया की शुरुआत हो जायेगी. यही रिलेटिव इकोनॉमिक्स का आधार है.

फ़ुटबाल से - कुछ अपने वतन के लिए......

फ़ुटबाल से - कुछ अपने वतन के लिए......


४२ लाख से भी कम जनसंख्या वाली क्रोएशिया की टीम ने फ़ुटबाल में फाइनल में जगह बना ली है (फीफा वर्ल्ड कप). ये एक आश्चर्य भी है तो ये एक प्रेरणा भी है. इस देश का इतिहास  भी २७ साल का ही है. इस छोटे से देश की दो खासियत है : १. बहुत संघर्ष भरा समय जो लोगों ने साथ साथ बिताया है  २.  अद्भुत राष्ट्रवाद की भावना. इस देश के प्रधानमत्री  ने  अपने पैसों से फ़ुटबाल का मैच देखने के लिए टिकट खरीदा और अपने पैसों से ही हवाई जहाज का टिकट खरीदा ताकि वे टीम का हौसला बढ़ा सकें. इस देश में फ़ुटबाल को देश-प्रेम की भावना को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. जो भी व्यक्ति देश के खिलाफ बात करता है या राष्ट्र-भक्ति में कोई भी कमी दिखाता है उसको तुरंत सजा दी जाती है. सबसे पहले राष्ट्रभक्ति - और उसी के कारण ये टीम आगे बढ़ पायी है. एक अधिकारी ने प्रतिद्वंदी टीम यूक्रेन की तारीफ़ कर दी तो उसको तुरंत बर्खास्त कर दिया गया. टीम मैनेजर पर टीम चयन में गुणवत्ता को महत्त्व  न देने का आरोप लगा तो उसको भी बर्खास्त कर दिया गया और नए टीम मैनेजर को श्रेष्ठ टीम बनाने का काम दिया गया. पिछले कोच परिणाम नहीं दे पाए  तो उसको भी हटा दिया गया. (आप इस बात पर गौर करिये की लोग सिर्फ सर्वश्रेष्ठ चाहते थे - उससे कम कुछ भी नहीं - और इसी लिए वो लोग गुणवत्ता से समझौता नहीं कर रहे थे और लगातार सुधार के लिए आवाज उठा रहे थे - हमारे लिए एक सीख है.).  कोच विदेशों से आयात नहीं किया गया परन्तु सिर्फ ये ध्यान रखा गया की टीम को सिखाने और जिताने का जज्बा हो. हर जीत को पूरा देश हंसी- ख़ुशी मनाता है और हर दिन और ज्यादा राष्ट्रीयता की भावना भर दी जाती है. वहां की राष्ट्रपति से ले कर वहां का आम आदमी - हर व्यक्ति एक ही बात कहता है - हमारा देश सबसे पहले. ये जज्बा जहाँ हो वो देश अपने आप को बना ही लेगा. एक संगठन और एक व्यवस्था के निर्माण के लिए ये ही तो चाहिए. इस देश का जिक्र में इसी लिए कर रहा हूँ की हर संगठन, हर समूह, हर देश और हर व्यवस्था को इससे सीख लेनी चाहिए और अपने हर सदस्य को संगठन निर्माण और संगठन के प्रति समर्पण के भाव को पैदा करने में मदद करनी ही चाहिए. राष्ट्र - वाद कोई विकल्प नहीं - ये जरुरी है. हर संगठन - अपने सदस्यों के सम्मिलित प्रयासों से ही आगे बढ़ सकता है. हमारे राष्ट्र के निर्माता भी हम ही है और ये ही हमारा प्रथम संगठन है - लेकिन हम ही उदासीन है. राष्ट्र नामक संगठन के निर्माण की प्रक्रिया का नाम है चुनाव - लेकिन हम में से कई लोग तो चुनाव में वोट भी नहीं देते हैं - ये बेरुखी क्यों?

दुनिया में संगठन निर्माण, प्रबंध और प्रशासन सिर्फ किस्मत से तुक्के से नहीं होता - इसके लिए बहुत परिश्रम और दिमागी मेहनत की जरुरत होती है. कितने संगठन हैं जो १०० साल से ज्यादा पुराने हैं? कितने प्रशासन हैं जो वर्षों तक सलामत रहे? अच्छी कंपनियों के संस्थापक लगभग अपना आधा समय अपने कर्मचारियों को प्रेरित करने और संगठनकी बेहतर प्रबंध व्यवस्था बनाने में लगा देते हैं. हमें भी अपने सबसे पहले संगठन और अपने सबसे प्रिय संगठन हमारे अपने राष्ट्र के निर्माण में लगना ही चाहिए - और उसके लिए ज्यादा समय भी नहीं चाहिए - चुनाव व्यवस्था में भाग लेना है और इस व्यवस्था में सुधार के लिए आवाज उठानी है (सुधार की गुंजाइश तो हमेशा ही रहेगी -  - हम आवाज नहीं उठाएंगे तो सुधार नहीं होगा).  चुनाव एक बहुत ही शानदार प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम लोग अपने देश के निर्माताओं का चयन कर सकें. लेकिन चुनाव की प्रक्रिया में पैसे और विज्ञापन के मेल  ने लोगों से उनकी सोचने की आजादी छीन ली है. ऐसा हो सकता है की  एक बड़ी कम्पनी एक राजनीतिक पार्टी को खरीद लेती है और फिर उस राजनीतिक पार्टी से आवांछित लोगों को चुनाव लड़वाती है. सोशल मीडिया और विज्ञापन के द्वारा लोगों को वोट देने के लिए प्रेरित किया जाता है और वो अवांछित लोग चुनाव जीत जाते हैं - सोचिये ऐसा होगा तो क्या होगा? चुनाव की पूरी प्रक्रिया में बदलाव की जरुरत है. चुनाव की पूरी प्रक्रिया सरकार के द्वारा निष्पक्षता से संचालित की जानी चाहिए. चुनाव से सम्बंधित सारे खर्च सरकार के द्वारा होने चाहिए. हर उम्मीदवार को लोगों के सामने अपनी बात कहने और फिर  एक वाद-विवाद में हिस्सा लेने का मौका मिलना चाहिए जिसमे वो वोट मांग सके और अपनी कार्य प्रणाली और अपने लक्ष्यों के बारे में बता सके. चुनाव की प्रक्रिया में धन के इस्तेमाल को कम करने के लिए सरकार को पहल ले कर इस प्रकार की पहल करनी चाहिए. आम लोगों को ये प्रश्न पूछने का अधिकार है की देश के लिए चुने गए उनके प्रतिनिधि किस प्रकार से देश की सेवा करना चाहते हैं.

आज ये देख के अफ़सोस होता है की चुने गए प्रतिनिधि देश के लिए नीति - निर्माण के कार्य में कोई रूचि ही नहीं दिखाते हैं. आज लोक-सभा और राज्य-सभा के सदस्यों को अच्छा पारिश्रमिक भी मिलता है लेकिन फिर भी वे लोग राष्ट्र निर्माण के कार्य को उतनी शिद्दत से नहीं करते जो उनसे अपेक्षा है. कई राज्य सभा सदस्य तो पुरे साल में सिर्फ कुछ दिन ही उपस्थित होते हैं - और ज्यादातर समय अनुपस्थित रहते हैं. जब देश को नेतृत्व देने वाले लोग इस प्रकार व्यवहार करेंगे तो फिर देश का क्या होगा?  अफ़सोस तो ये हैं की उन लोगों को वोट दे कर वहां भेजने वाले लोग अपने आप को ठगा महसूस करते हैं. देश भक्तों की कमी नहीं है परन्तु अफ़सोस ये है की मुट्ठी भर अयोग्य लोग धन-बल और गलत चुनाव व्यवस्था के कारण सत्ता के शीर्ष पर पहुँच जाते हैं और इस देश के विकास को रोक देते   हैं.

कई वर्ष पहले मैंने बीकानेर में (अजित फाउंडेशन के माध्यम से ) चुनाव आयोग के लिए एक प्रोजेक्ट पर कार्य किया. कार्य था बीकानेर में लोगों में चुनाव के प्रति रुझान पैदा करना और लोगों में वोट देने की भावना पैदा करना. कार्य मुश्किल था. हमने पहले सर्वेक्षण कर के लोगों के विचार जाने की वे वोट क्यों नहीं देना चाहते. हमें पता चला की चुनाव न देने के पीछे लोगों के तर्क उचित थे. लोग पूछने लगे की जो लोग चुनाव लड़ रहे हैं उनका क्या मकसद है? उन लोगों ने देश और समाज के लिए क्या योगदान किया है. उनका चुनाव के पीछे क्या मकसद है? हमको उनके उत्तरों में एक रौशनी की उम्मीद नजर आयी. हमने कोशिश कर के उस समय चुनाव में भाग ले रहे लोगों के आंकड़े और उनके लक्ष्य इकट्ठे किये और दैनिक युगपक्ष अख़बार में प्रकाशित किये. हम लोगों ने छोटे बच्चों को अनुरोध किया की वे अपने घर जा कर अपने माता- पिता को चुनाव में वोट डालने के लिए प्रेरित करें ताकि  हर व्यक्ति देश के निर्माण में योगदान दे सके. बच्चों ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न किये. एक बच्चे ने पूछा की चुनाव लड़ने वाले लोग क्या कह कर चुनाव में वोट मांग रहे हैं - मैंने उसको बताया की वो व्यक्ति अपनी राजनीतिक पार्टी के चुनाव के घोषणापत्र  (अजेंडे) के आधार पर वोट मांग रहे हैं. उस बच्चे का प्रश्न था - क्या घोषणा पत्र में क्या लिखा है? मैंने उसको बताया की कोई पार्टी गरीबों के कल्याण के लिए वोट मांग रही है तो कोई पार्टी पिछड़ी जाती के लोगों की भलाई के लिए वोट मांग रही है. उस बच्चे का प्रश्न था - "क्या कोई व्यक्ति भारत माता के लिए वोट मांग रहा है क्या?". आज कई लोगों को ये लगता  है की ये  बात सही है - अगर भारत का विकास होगा तो हर वर्ग का विकास होगा और हर व्यक्ति का भला हो जाएगा. लेकिन  अगर वर्ग विशेष के कल्याण की बात की जायेगी  तो देश का विकास नहीं हो  पायेगा. जिस बात को छोटे से बच्चे ने बड़े आराम से मुझसे पूछा - उसी बात को हर व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए मैंने ये लेख लिखा है - शायद इससे हमारे देश का भविष्य बदल सकता है.

इंडिया बनाम भारत - क्या है हकीकत ?

इंडिया बनाम भारत - क्या है हकीकत ?

राजा नाभि के पुत्र ऋषभ देव हुए और उनके पुत्र भरत ने भारत वर्ष की स्थापना की और महान भारत पूरी दुनिया पर छा गया. भारत की सिंधु नदी समूह (पहले 8 
नदियाँ थी अब सिर्फ ६ नदियाँ ही बची हैं) के कारण विदेशी लोग इस प्रदेश को हिन्दुस्तान (वो लोग स को ह बोलते थे) कहने लगे. सिंधु से हिन्दू - और हिन्दू से  इंडिया (स से ह बना और फिर ह भी गायब हो गया). और सिर्फ नाम ही नहीं बदला बहुत कुछ बदल गया. कंधार से आसाम तक फैला भारत  आज इंडिया में सिर्फ गाँव में रहने को विवश है. एक समय भारत पूरी दुनिया के लिए स्वर्ग था लेकिन फिर वर्षों तक उसको शोषण झेलना पड़ा. उसका सोना उसका बैरी बन गया ओर विदेशियों ने उसका शोषण किया. लेकिन आज तो गजब हो रहा है - उसके ही लाडले इंडिया से उसका शोषण हो रहा है. भारत यानी आम भारतीय नागरिक - जो आम लोगों के लिए उपलभ्ध व्यवस्थाओं के बीच परेशान है - ओर इंडिया मतलब अंग्रेजी पढ़े लिखे नव-अभिजात्य वर्ग के लोग जो विलासिता भरी जीवनशैली को बढ़ावा दे रहे हैं. विस्तार से चर्चा करते हैं की  क्या है भारत और इंडिया की कहानी?

आज भारत ओर इंडिया एक साथ रहते हुए भी अलग अलग हैं. सरकारी अधिकारी, पूंजीपति, राजनेता, फिल्म-सितारे, प्रोफेशनल लोग ओर बड़े बड़े ठेकेदार (कोई जाती का ठेकेदार बना हुआ है तो कोई किसी वर्ग का ठेकेदार) इंडिया में रहते हैं लेकिन आम लोग जिनमे कृषक, मजदुर, लघु व्यवसायी, लघु उद्यमी, पशु-पालक, हस्त-शिल्पी, कुटीर उद्यमी आदी भारत में रहते हैं (रहते तो क्या हैं - अपना जीवन बसर करते हैं). आज इंडिया बहुत फ़ैल रहा है ओर लगातार बढ़ता जा रहा है. बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ आ रही है ओर उनके सभी कर्मचारी इंडिया में ही रहते हैं ओर उनका लगातार फैलाव जारी है. सरकारी अधिकारियों का भी लगातार फायदा ही हो रहा है. अभी अभी उनका वेतन भी बढ़ा दिया गया है. यानी इंडिया की तरक्की लगातार जारी है. लेकिन भारत की हालत खराब है. जी. एस. टी. (GST) तो कभी नोट बंदी तो कभी हड़ताल तो कभी भारत - बंद (कभी आपने इंडिया
बंद नहीं सुना होगा) भारत के लोगों को लगातार कमजोर कर रहा है. इधर सुना है सरकार ने खस्ता हाल भारत की मदद करने के लिए १४ फसलों के समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की है ओर अर्थशास्त्रियों को लगने लगा है की इससे महंगाई बढ़ जायेगी (जब सरकारी अधिकारियों या सांसदों की तनख्वाह बढ़ाई जाती है तो कोई अर्थशाष्त्री ऐसी बात  नहीं कहता है). खैर भारत की किस्मत में ही शायद दब कर रहना लिखा है - कभी अंग्रेज आये - तो कभी अंग्रेजों के मुरीद (आधुनिक इंडिया) आये. हद तो तब हो जाती है की इंडिया के लोग (आधुनिक सरकारी अधिकारी) जानबूझ कर ऐसे कानून ओर व्यवस्थाएं बनाते हैं जो न तो उनको समझ आती है न भारतीय लोगों को - वे तो किसी तरह अंग्रेजी में गिट-पिट कर के बच निकलते हैं लेकिन भारतीय फंस जाते हैं. इंडिया के सारे उच्च अधिकारी आज भी अंग्रेजी में ही अपने कानून ओर नियम निकालते हैं ओर अंग्रेजी में ही बात करना पसंद करते हैं (ये दूसरी बात है की हर साल हिंदी भाषा के विकास के लिए उच्च इनाम ले लेते हैं). आज भी ३००० से ज्यादा कानून हैं (जो बहुत ही जटिल हैं ओर इंडिया के लोग ही समझ सकते हैं) ओर हर वर्ष नए नए कानून जोड़े जा रहे हैं. नए कानूनों में जी. एस. टी. को ही लीजिये -  पूरी तरह से इंडिया के लोगों के लिए है -  आम आदमी तो इसको समझ ही नहीं पाता है.
भारतियों के लिए सरकारी स्कुल, सरकारी अस्पताल, सरकारी दवाखाना ओर रेल में जनरल कोच है. लेकिन इनके अफसर तो सारे इंडिया में रहते हैं. वे निजी क्षेत्र के अस्पताल, निजी क्षेत्र के विद्यालयों ओर निजी क्षेत्र की आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित हवाई यात्राओं का आनंद लेते हैं - कभी कभार रेल में भी यात्रा करते हैं (जो की वे रेल के किसी एयर कंडीशन  कोच में कभी कभार नजर आ जाते हैं). नतीजा यही है की इंडिया (यानी अभिजात्य वर्ग) के लोगों को भारत के लोगों की दुर्दशा के बारे में या तो जानकारी नहीं है या वे उनके लिए कुछ करना ही नहीं चाहते हैं.  भारत ओर इंडिया को समझने के लिए लोगों के बीच में जाना पड़ेगा ओर उनके रोजमर्रा के जीवन को देखना पड़ेगा.  

आइये छुक छुक रेल गाडी की सैर करते हैं. बीकानेर स्टेशन पर खड़ी इस गाडी में जनरल डिब्बा भारत के लिए है जहाँ 8 सीट पर 16 लोग एक साथ सवारी करते हैं और स्थानीय भाषा में सारी समस्याओं पर बात करते हैं - उसी रेल में एयर - कण्डीशन  कोच में इंडिया सफर करता है जो अंग्रेजी में बात करते हुए अमेरिका और वैश्वीकरण की समस्याओं पर चर्चा करते हुए भारत की गरीबी को नफ़रत की दृष्टि से देखता है. ये छुक छुक रेलगाड़ी बीकानेर स्टेशन से रतनगढ़ तक पहुँचती है.

जनरल डिब्बे में लोग आपस में जल्दी ही हिल-मिल जाते हैं. कुछ व्यक्ति बैठ नहीं पाते हैं तो वे खड़े ही रहते हैं. भीड़ के बावजूद भी लोग एक दूसरे का सहयोग कर के किसी तरह अपनी यात्रा का आनंद लेते रहते हैं.  रावण हत्था  लिए साधराम और उसकी पत्नी जनरल डिब्बे में  चढ़ते हैं  और रावण हत्था बजाते हैं. हर व्यक्ति उनकी वाह-वाही करता है और ५-१० रूपये उनको बक्शीश के रूप में भी देता है. उसके  बाद रामु समोसे ले कर आता है और हर व्यक्ति एक एक समोसा तो खरीद ही लेता है. कई लोग बहुत परेशान है ओर आप पूछते हैं की परेशानी का क्या कारन है तो पता चलता है की इनका व्यापार ही बंद हो गया है क्योंकि लोगों ने इनसे माल खरीदने की बजाय ऑनलाइन खरीदना शुरू कर दिया है. कोई ऐसा भी है जो इतनी भयंकर गरीबी में जी रहा है की रेल की टिकट खरीदने में ही उसका महीने भर का बजट चला गया है ओर अब उसको नहीं पता की कैसे पूरा महीना निकालेगा.

उधर इंडिया के  कोच में सब लोग मोबाइल पर विदेशी फ़िल्में देखने में व्यस्त हैं और उनमे से कुछ लोग बैठे बैठे अपने ऑफिस का भी काम कर रहे हैं. यहाँ कोई साधराम या रामु नहीं आ सकता है. अगर आ भी जाए तो लोग उसको बहार निकलवा देंगे. इस कोच में "कॉन्वेंट प्रशिक्षित" लोग हैं जो अंग्रेजी और अंग्रेज जीवन-शैली को अपना चुके हैं. ये बहुत चिंतित नजर आ रहे हैं. आप इनसे पूछेंगे तो कहनेगे - बेटे का एडमिशन ऑक्सफ़ोर्ड में करवाना है - बड़ी बेटी की शादी के लिए ढंग की होटल नहीं मिल पा रहा है आदी आदी.

भारत आज गावों में बसता है. लेकिन आज भी गांव हमारी प्राथमिकता नहीं है. गावों में न अस्पताल है न शिक्षण संस्थान, न सड़कें हैं न बिजली- पानी. जो लोग मजबूर हैं वे गाँव में रुके हुए हैं. जो लोग अच्छी पढ़ाई कर लेते हैं वो गांव वापिस नहीं आते हैं. शिक्षण संस्थाओं में भी विद्यार्थियों को शहरों की ओर पलायन के लिए तैयार किया जाता है.  गावों में रहने ओर गावों में स्वरोजगार के लिए कोई संस्था न तो प्रेरित करती है न प्रशिक्षित करती है. कुछ शिक्षण संस्थाओं ने ग्रामीण प्रबंधन का पाठ्यक्रम शुरू किया है - उनके विद्यार्थी भी पढ़ाई करने के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नौकरी करते हैं ओर इन कंपनियों की  इस प्रकार के उत्पाद बनाने में मदद करते हैं जो भारत के गावों में आसानी से बिक सके. सही मायने में गावों में रहने ओर गावों को आबाद करने की प्राथमिकता किसी की नहीं है. इसी लिए भारत उजड़ रहा है ओर इंडिआ आबाद हो रहा है. भारत की ख़ास बात क्या है? भारत में आज भी आपको वर्षों पुरानी संस्कृति मिल जायेगी. लोग आज भी समाज, परिवार, रीति-रिवाज, अध्यात्म, कर्म, पुनर्जन्म, ओर सत्संग के कारण एक दूसरे से गुंथे हुए हैं. लोग गरीब है लेकिन आज भी भुखमरी के शिकार नहीं है. लोग अशिक्षित है लेकिन उनकी चेतना ओर सामजिक समझ बहुत उच्च है. कम साधनों में जीवन जीने के आदी ये लोग हर संसाधन की बचत करने की कोशिश करते हैं. आज भी किसी गांव की कोई भी शादी का आयोजन देखिये - १५ से ज्यादा व्यंजन नहीं होंगे - आज भी प्लास्टिक का इस्तेमाल नजर नहीं आएगा. पानी पीने के लिए लोटे रखे होंगे ओर लोग बुक (हाथ की एक मुद्रा) से पानी पीते नजर आएंगे. गावों में पेड़ों के नीचे ही दरी बिछा कर के लोगों के बैठने की व्यवस्था कर दी जायेगी. आपको लगेगा की ये लोग अज्ञानी हैं लेकिन आज भी इन लोगों को एक - एक पेड़ का महत्त्व पता है ओर बचपन से ही पेड़ों, वनस्पतियों ओर जानवरों (जैसे गाय- बकरी) को संरक्षित करने का प्रशिक्षण मिल जाता है.

आइये इंडिया को देखते हैं.  ये महानगरों ओर शहरों में बसता है.
सबसे पहले इंडिया पेड़  काट - काट  कर लम्बी - चौड़ी सड़के बनाता है और फिर गगन चुम्बी इमारते और फिर सड़कों के किनारे फिर से पेड़ लगाने की कोशिश करता है जिसके लिए निजी क्षेत्र को ठेका दिया जाता है. सरकार से स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत काफी बजट भी मिल ही जाता है और लीजिये  इंडिया का स्मार्ट सिटी तैयार जहाँ आदमी आदमी को नहीं जानता - न मोहल्ले बचते हैं न समाज - न लोगों का अपना पन. शहरों में जितना बजट सड़कों के किनारे कृत्रिम  बाग़-बगीचे लगाने के लिए दिया जाता है - उतना गावों में सड़कों के लिए भी नहीं होता है. इंडिया विकसित देशों के रास्ते पर चल रहा है. पांच सितारा संस्कृति हावी  है. ये वो लोग हैं जो पांच सितारा होटलों में बैठ  कर पर्यावरण को बचाने के लिए बड़े बड़े भाषण देंगे. ये वो लोग हैं जिनको पर्यावरण संरक्षण के लिए अनेक सम्मान भी मिलेंगे. अपने व्याख्यानों में ये लोग प्लास्टिक का कोई विकल्प खोजने का आह्वान करेंगे. इनके शादी के आयोजन में आप जाएंगे तो कम से कम 50 व्यंजन मिलेंगे - लेकिन अधिकाँश भोजन व्यर्थ ही फेंक दिया जाएगा. यह वर्ग शिक्षित - प्रशिक्षित वर्ग है अतः इन्हें पर्यावरण, जल-संकट, खाद्य पदार्थों के अपव्यय को रोकने, आदी पर पर बड़े बड़े व्याख्यान देते हुए देखा जा सकता है. ये लोग अक्सर गावों के अनपढ़ लोगों को (भारत के लोगों को ) इन विषयों पर प्रशिक्षण प्रदान करना चाहते हैं ओर इस हेतु कोई न कोई आयोजन करते ही रहते हैं ओर सरकार भी इस हेतु इन को अनुदान भी प्रदान करती है ओर हाँ ये आयोजन पांच सितारा होटलों में होते हैं जहाँ पर गावों के अशिक्षित लोगों को प्रशिक्षित किया जाता है ताकि वे पर्यावरण की महत्ता को समझ सके.   

कुल मिला कर शोषण जारी है. देश के नेताओं की प्राथमिता तो इंडिया है लेकिन इंडिया की जड़ों को देखोगे  तो भारत ही मिलेगा. इंडिया के लिए अनेक योजनाएं आती है. कभी कोई योजना तो कभी कोई योजना. लेकिन भारत को तो अपनी जरूरतों के लिए भी मोहताज होना पड़ रहा है.  भारत को नजरअंदाज कर के इंडिया को कैसे बचा पाओगे? यानी आज हम सबके सामने एक चुनौती है  -  भारत को बचाना . पर  बचाएं कैसे? किसी ने  इसका एक सुझाव भेजा : अगर सभी नेता ओर सभी अफसर भारत में रहने लग जाए या अपने बच्चों को भारत में भेजने लग जाएँ तो भारत सुधार जाएगा. कैसे ? उसने कहा - अगर नेताओं के बच्चे सरकारी शिक्षण संस्थाओं में पढ़ेंगे, वे रेल में  जनरल कोच से यात्रा करेंगे, वे गावों में जाएंगे तो नीति बनाते समय उनके कष्टों को ध्यान में रखेंगे - तो शायद भारत के कष्टों का निवारण हो जाएगा.  

अद्भुत थी मारवाड़ी दक्षता

अद्भुत थी  मारवाड़ी दक्षता


मैंने मारवाड़ी प्रबंध शैली पर एक पुस्तक और कई लेख लिखे जिस पर विदेशों से अनेक लोगों के प्रश्न आये और उनकी जिज्ञासाओं का समाधान भी किया. उन्हीं के सारांश के रूप में ये लेख प्रस्तुत है जिसमे हिंदी भाषा में सरल शब्दों में मारवाड़ी प्रबंधन शैली के बारे में बताया गया है; (नयी पीढ़ी के लिए शायद ये कुछ प्रेरणा का हो)  -

परिवर्तन संसार का नियम है और इसका कोई अपवाद नहीं है. हर अगली पीढ़ी को अपनी पिछली पीढ़ी पुरानी, दकियानूसी, पुरातनपंथी और अविकसित नजर आती है और इसी कारण हर अगली पीढ़ी पिछली पीढ़ी की व्यवस्थाओं को बदल देती है और नयी व्यवस्थाएं स्थापित करने का प्रयास करती है. इसी प्रक्रिया में कई परम्पराएं लुप्त हो जाती  है और फिर हम चाह कर भी उनको नहीं सहेज सकते हैं. ऐसी ही एक व्यवस्था है मारवाड़ी प्रबंधन शैली. नयी पीढ़ी ने पाश्चात्य शिक्षा को अपना लिया है और वे अपने आपको मारवाड़ी कहने  में भी संकोच करते हैं. जो मारवाड़ी प्रबंध शैली अनेक वर्षों की गुलामी के बाद भी सलामत रह गयी वो आजादी के बाद उपेक्षा का शिकार हुई और कुछ ही दशकों में लुप्त हो गयी. सरकार या किसी भी प्रबंध संस्थान की तरफ से इस अद्भुत प्रबंध शैली को लिपिबद्ध करने के लिए कोई प्रयास नहीं हुए. भारतीय प्रबंध संस्थानों ने विदेशों की प्रबंध शैलियों को सीखने और समझने में अपना सारा समय लगा दिया और उन्ही प्रबंध शैलियों को आगे बढ़ावा दिया लेकिन इस अद्भुत प्रबंध शैली को हीन दृष्टि से देखा और उस उपहास के कारण ये व्यवस्था आज लुप्त हो चुकी है. आज का ये फैशन बन गया है की प्रबंध सीखना है तो अमेरिका की कुछ प्रबंध संस्थाओं में जाओ (वो संस्थाएं वाकई महान है) लेकिन अफ़सोस तो ये है की अद्भुत प्रबंध दक्षता रखने वाले मारवाड़ी अपनी नयी पीढ़ी को अपनी प्रबंध दक्षता सिखाने की बजाय इसी फैशन में बह कर विदेश से प्रशिक्षित करवा रहे हैं. आधुनिक शिक्षित लोगों ने ऐसा चश्मा पहना है की उनको भारतीय व्यवस्थाओं में अच्छाइयां ढूंढने से भी नहीं मिलती हैं - शायद उनको मेरे इस लेख में भी कुछ भी कम का न मिले. लेकिन १०० साल बाद  पश्चिम से किसी ने भारत पर अध्ययन किया और फिर किसी ने पूछा की अद्भुत भारतीय व्यवस्थाओं को समूल नष्ट करने के लिए कौन जिम्मेदार है तो क्या जवाब देंगे ?

एक समय मारवाड़ी व्यावसायिक दक्षता पूरी दुनिया में अपनी अद्भुत पहचान स्थापित कर चुकी थी  लेकिन आज ये कला लुप्त होने के कगार पर है. मारवाड़ी प्रबंध शैली दुनिया में कहीं पर भी पूरी तरह से लिखी हुई नहीं है और ये उन लोगों के साथ ही विदा हो गयी  है जो लोग इस कला में मर्मज्ञ थे. लेकिन जैसे ही ये पूरी तरह लुप्त हो जायेगी - वैसे ही हमें अहसास होगा की एक बहुत ही शानदार प्रबंध व्यवस्था हमने खो दी है.

लुप्त हुई मारवाड़ी व्यवस्था का आज कोई जिक्र बेमानी है लेकिन फिर भी उनकी कुछ व्यवस्थाओं के बारे में मैं अवश्य जिक्र करना चाहूँगा: -

१. मौद्रिक प्रबंधन और ब्याज गणना की अद्भुत व्यवस्था : - मारवाड़ी प्रबंध व्यवस्था का आधार मौद्रिक गणना है और इसी कारण ब्याज को नियमित रूप से गिना जाता है जो की पैसे के समुचित सदुपयोग के लिए जरुरी है. फिल्मों में मारवाड़ी ब्याज पर बहुत ही उपहास और व्यंग्य नजर आते हैं लेकिन आज ये ही व्यवस्थाएं आधुनिक बैंकिंग संस्थाएं अपना रही है. बाल्यकाल  से ही गणना (गणित) का प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था और इसी कारण बिना केलकुलेटर के भी कोई भी व्यक्ति दशमलव अंकों की गुना-भाग भी आसानी से कर लिया करते थे और गणना में  छोटी से छोटी गलती की भी बड़ी सजा मिलती थी.

२. जीवन पर्यन्त की प्रबंध कारिणी - यानी मुनीम व्यवस्था: मारवाड़ी व्यवस्था में मुनीम को बहुत ही अधिक महत्त्व दिया जाता था. मुनीम को आधुनिक व्यवस्था के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के सामान इज्जत और सम्मान दिया जाता था और उसके ऊपर पूरा विश्वास किया जाता था. उसको पारिवारिक सदस्य की तरह सम्मान मिलता था. उसको जीवन पर्यन्त के लिए व्यवसाय का प्रबंधक नियुक्त कर दिया जाता था. उसके परिवार की जिम्मेदारियां भी उठाई जाती थी ताकि उसके परिवार को कोई परेशानी न हो.

३. पड़ता व्यवस्था : मारवाड़ी निर्णय का आधार पड़ता यानी शुद्ध लाभ. शुद्ध लाभ की गणना का ये तरीका अद्भुत था. इसमें सिर्फ अस्थायी आय और अस्थायी खर्चों के आधार पर हर निर्णय से मिलने वाले शुद्ध लाभ या हानि पर चिंतन कर के ये निर्णय लिया जाता था की मूल्य क्या रखा जाए.

४. संसाधन बचत : मारवाड़ी अपने हर निर्णय में संसाधनों का कमसे कम इस्तेमाल कर के अधिक से अधिक बचत करने का प्रयास करते थे और इस प्रकार पर्यावरण की बचत में योगदान देते थे. मारवाड़ी एक दूसरे को चिठ्ठी भी लिखते थे तो उसमे कम से कम कागजों का इस्तेमाल करते हुए अधिक से अधिक जानकारियां प्रेषित करते थे.

५. बदला व्यवस्था: मारवाड़ी अपने सौदों को भविष्य में स्थानांतरित करने के लिए बदला व्यवस्था काम में लेते थे जिसके तहत सौदों को आगे की तारीख पर करने के लिए निश्चित दर से ब्याज की गणना होती थी. (ऐसी ही कुछ व्यवस्था विकसित करने के लिए दो अर्थशास्त्रियों को हाल ही में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया लेकिन मारवाड़ियों की इस  व्यवस्था को रोक दिया गया था)

६. हुंडी व्यवस्था: आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था के शुरू होने से भी अनेक वर्ष पहले से मारवाड़ी व्यापारी हुंडी व्यवस्था को चलाते आ रहे हैं जिसको अंग्रेजों ने पूरी तरह से रोक दिया और फिर आजादी के बाद आधुनिक सरकार ने पूरी तरह से ख़तम कर दिया था. ये हुंडी व्यवस्था आज की आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था से कम लागत पर मुद्रा के स्थानांतरण का माध्यम था जिसमे बिना तकनीक या बिना इंटरनेट के भी आज की तरह ही एक जगह से दूसरी जगह पर मुद्रा का आदान प्रदान होता था.

७. पर्यावरण अनुकूल निर्णय: मारवाड़ी हमेशा पर्यावरण अनुकूल निर्णय लिया करते थे - जिसमे वे स्थानीय पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाए बिना ही व्यापार और व्यवसाय को बढ़ावा देने का प्रयास करते थे.

८. धार्मिक और आध्यात्मिक चेतना : व्यापार शुरू करने से पहले वे मंदिर बनाते  थे और शुभ - लाभ लिखते थे. शुभ यानी हर व्यक्ति का कल्याण लाभ से पहले लिखते थे ताकि हर निर्णय को सबके कल्याण के लिए ले सकें. हर निर्णय को धर्म - और अध्यात्म के आधार पर जांचा जाता था. तकनीक के देवता विश्वकर्मा की पूजा की जाती थी तो धन के देवता गणेश और लक्ष्मी को आराध्य माना जाता था. सभी निर्णय सिद्धांतों पर आधारित होते थे और सबसे बड़ा सिद्धांत ये था की जो भी निर्णय हो वो जीवन को जन-कल्याण और आत्मकल्याण की तरफ ले जाए. जीवन का मकसद था केवलयज्ञान की तरफ जाना और इसी लिए हर निर्णय को पुण्य का अवसर के रूप में देखा जाता था और पाप से बचने के प्रयास किये जाते थे. ऐसी तकनीक नहीं अपनायी जाती थी जिससे जीवों का नाश हो. शुरुआत करते समय से ही सकल भ्रमांड के कल्याण को आदर्श के रूप में रखा जाता था.

९. देवों को अर्पण : - हर व्यापारिक निर्णय श्री गणेश और रिद्धि सिद्धी की आराधना के बाद किया जाता है. श्री गणेश विघ्नहर्ता हैं तो उनकी पत्नियां ऋद्धि-सिद्धि यशस्वी, वैभवशाली व प्रतिष्ठित बनाने वाली होती है. आय का कुछ हिस्सा देवों को अर्पित कर दिया जाता था जो किसी न किसी रूप में समाज के कल्याण के काम में आता था. व्यापार की आम्दानी का कुछ भाग गोशाला या ऐसी ही अन्य किसी संस्था को देने से ये माना जाता था की देवताओं का हिस्सा उनको अर्पित कर दिया गया है. प्राचीन भारत में इसी कारण मंदिरों में प्रचुर संपति दान में आती थी जो किसी न किसी रूप में समाज के कल्याण हेतु अर्पित की जाती थी.

१०. गद्दियों की व्यवस्था: आधुनिक तड़क भड़क की जगह मारवाड़ी अपने व्यापारिक प्रतिष्ठानों में गद्दियों  की व्यस्था रखते थे जो बहुत ही आरामदायक, आत्मीयता पूर्ण और स्वच्छता पर आधारित माहौल बनाती थी. ये मेहमानों के ढहरने के लिए भी काम आती थी. किसी मेहमान को जरुरत के समय इन्हीं गद्दियों में रुकने के लिए पर्याप्त व्यवस्था कर दी जाती थी ताकि अनावश्यक होटल का खर्च भी नहीं होता था. आधुनिक एयर कंडीशन ऑफिसों से तुलना करके  पर्यावरण के ज्यादा अनुकूल क्या है ये आप स्वयं तय कर सकते हैं.

११. बचत और उत्पादकता पर जोर : मारवाड़ी व्यवस्था में बचत और उत्पादकता पर बहुत अधिक जोर दिया जाता था और इसी कारण विषम परिस्थितियों में भी मारवाड़ियों ने व्यापार कर के अपने आप को सफल बनाया. आधुनिक कंपनियों की जगह पर मारवाड़ियों ने बचत और उत्पादकता के क्षेत्र में शानदार कार्य किया और वैश्विक व्यापार स्थापित किया. रविवार की जगह पर अमावस्या की छुट्टी होती थी (यानि महीने में सिर्फ एक दिन की छुट्टी) - लेकिन सामान्य दिनों में भी कार्य के घंटे बहुत ज्यादा होते थे - लेकिन हर कर्मचारी को साल में एक महीने अपने गांव जाने की छुट्टी दी जाती थी.

१२. जरुरत पड़ने पर राज्य की मदद: - मारवाड़ी व्यवसायी उस समय के राजा की जरुरत के समय आर्थिक मदद किया करते थे और इसी कारन अनेक शहरों में मारवाड़ी व्यापारियों को नगर-शेठ की उपाधि दी जाती थी. कई बार देश हित में व्यापार और उद्यम की बलि भी चढ़ा दी जाती थी.

१३. स्थानीय लोगों की भागीदारी: मारवाड़ी जहाँ पर भी व्यापार करने के लिए जाते थे वहां के स्थानीय लोगों को अपने व्यापार और उद्योगों से लाभान्वित करने का प्रयास करते थे और इसी कारण उनको स्थानीय लोगों से पर्याप्त सहयोग और सम्मान मिलता था.

१४. शांतिपूर्ण ढंग से विरोध को सहना : मारवाड़ियों को अन्य भारतियों की तरह सत्ता पक्ष  से विरोध का समना करना पड़ा.  डाकुओं, लुटेरों और अनेक अधिकारियों को मारवाड़ी सरल लक्ष्य नजर आते थे जिन पर वे अपने अत्याचार आसानी से कर लेते थे. सत्ताधारी  उनसे मनमाना टैक्स वसूलते थे. ब्याज की सूक्ष्म गणना किसी को भी अच्छी नहीं लगती थी. लोग मारवाड़ियों से पैसे तो उधार लेना चाहते थे लेकिन ब्याज नहीं देना चाहते थे लेकिन मारवाड़ियों की सफलता का आधार ही उनकी सूक्ष्म गणना थी जिस के कारण वे पैसे के सही इस्तेमाल पर जोर देते थे.  अंग्रेजों और उनके इतिहासकारों ने मारवाड़ियों को सूदखोर के रूप में स्थापित किया क्योंकि अंग्रेजों को मारवाड़ियों की व्यवस्था बैंकिंग व्यवस्था से बेहतर नजर आयी और वे आधुनिक बैंकिंग को बढ़ावा देने के लिए मारवाड़ियों को हटाना चाहते थे - जबकि मारवाड़ी खुद बैंकिंग व्यवस्था के समर्थक थे और बैंकें भी  मारवाड़ियों की तरह चक्रवर्ती ब्याज लेती थी. मारवाड़ी किसानों को जरुरत के समय पर ऋण प्रदान करदेते थे और इसी कारण अनेक वर्षों से मारवाड़ियों ने किसानों के साथ मिल कर हर जगह पर कृषि को सफल बनाने में योगदान दिया था लेकिन ये आधुनिक व्यवस्था में नकारात्मकता के माहौल में तब्दील हो गया. अंग्रेजों के बाद में आधुनिक भारत में मारवाड़ियों के योगदान और उद्यमिता को पूरी तरह से विरोध का सामना करना पड़ा और उसी के कारण मारवाड़ियों ने परम्परागत व्यवस्थाओं को बदल दिया और नयी प्रोफेशनल प्रबंधन पर आधारित व्यवस्थाओं को अपना लिया ताकि उनका विरोध न हो. आधुनिक मीडिया द्वारा  मारवाड़ियों का पूरी तरह से नकारात्मक चित्रण हुआ और इस प्रकार उनकी उद्यमिता को लगाम लग गयी. मारवाड़ियों की नयी पीढ़ी अपने आपको मारवाड़ी कहने में भी हिचकिचाने लगी.

१५. सामाजिक उद्यमिता : मारवाड़ी उद्यमी अपनी आय में से कुछ राशि बचा कर के समाज के लिए कुछ करना चाहते थे और इसी क्रम  में उन्होंने प्याऊ, गोशालाएं, मंदिर, शिक्षण संस्थाएं, अस्पताल और धर्मशालाओं का निर्माण किया. उनके प्रयासों से राजस्थान में विकट परिस्थितियों में भी लोगों को रहने में दिक्कत नहीं आयी. आजादी से पहले अनेक शिक्षण संस्थाएं मारवाड़ियों ने इस प्रकार स्थापित की ताकि भारतीय संस्कृति भी सलामत रहे और युवा पीढ़ी भी शिक्षित हो सके.

१६. विपणन की व्यक्तिगत शैली: - आधुनिक विज्ञापन आधारित व्यवस्था की जगह पर मारवाड़ी व्यवसायी व्यक्तिगत संपर्क और व्यक्तिगत सेवा पर आधारित विपणन व्यवस्था अपनाते थे जिसमे एक व्यक्ति को ग्राहक बनाने के बाद पूरी जिंदगी उसकी जरूरतों के अनुसार उत्पाद उसको प्रदान करते थे. व्यापारिक रिश्तों को पूरी जिंदगी निभाया जाता था और व्यापारिक सम्बन्ध मधुर व्यवहार, वैयक्तिक संबंधों और आपसी विश्वास पर आधारित होते थे. "अच्छी नियत" के आधार पर ही सारे निर्णय लिए जाते थे ताकि पूरी जिंदगी व्यापारिक सम्बन्ध बना रहे और इसी लिए आपसे मेलजोल, जमाखर्च, लेनदेन और आपसी खातों के मिलान पर बहुत अधिक जोर दिया जाता था.

१७ दीर्धजीवी उत्पाद : मारवाड़ी ऐसे उत्पाद विकसित करते थे जो दीर्ध समय तक सलामत रह सके और इस प्रकार निवेश करते थे ताकि दीर्ध काल तक कोई दिक्कत  न आये. आधुनिक कम्पनियाँ ऐसे उत्पाद बनाती है जो अलप काल में ही नष्ट हो जाएं. वे पैकेजिंग और विज्ञापन पर अत्यधिक अपव्यय करती है लेकिन मारवाड़ी लोग इस प्रकार के अपव्यय को बचाते थे.

१८. साख पर बल: मारवाड़ी अपने व्यापर में साख बनाने पर सबसे अधिक जोर देते थे और साख पर किसी भी हालत में आंच नहीं आने देते थे. इसी कारण "गुडविल" शब्द के आने से बहुत पहले से साख और "नाम" जैसे शब्द मारवाड़ी व्यापारिक जगत में काम आते थे.

१९. कार्य विभाजन व् युवाओं को मार्गदर्शन : मारवाड़ी व्यापर में बुजुर्ग लोग नीतिगत निर्णय लेते हैं लेकिन युवा रोज का काम देखते हैं - अतः इस प्रकार सभी लोगों में काम बंटे रहते थे  और आपसी तालमेल भी बना रहता था.  सबसे बड़ा पुरुष व्यक्ति करता कहलता था और वो सभी नीतिगत निर्णय लेता था. परिवार के युवा उससे मार्गदर्शन ले कर रोजमर्रा के निर्णय लेते थे और उसको एक एक पैसे का हिसाब देते थे. पुरे घर में एक ही रसोई होती थी और अन्न का एक दाना भी व्यर्थ में नहीं बहाया जाता था. अन्न का सबसे पहला टुकड़ा गाय, फिर अन्य प्रमुख जानवरों जैसे कुत्तों आदि के लिए निकला जाता था और फिर घर के लोग खाना कहते थे. भोजन सामान्य लेकिन होता था लेकिन बड़े प्यार से मिल कर खाने में अलग ही आनंद होता था.  थाली में एक भी दाना व्यर्थ नहीं छोड़ा जाता था. थाली में सबसे पहले कर्ता भोजन की शुरुआत कर्ता था और आखिर में भी वो ये ही देखता की कोई भी भूखा नहीं रह गया है और सबसे आखिरी दाना  (अगर कुछ बच जाए) गृह स्वामिनी उठाती थी. आज की बड़ी कंपनियों की पांच सितारा संस्कृति की तुलना में बहुत कम भोजन व्यर्थ जाता था. भोजन के समय ही अच्छे उद्यमियों और अच्छे सामाजिक आदर्शों का वृत्तांत सुनाया जाता था जो युवाओं को श्रेष्ठ जीवन जीने के लिए प्रेरित करता था. ऐसा माना जाता था की साथ में भोजन करने से आपसी प्रेम बढ़ता है. साल में कम से कम एक बार पूरा परिवार तीर्थयात्रा के लिए या सत्संग के लिए जाता था जो परिवार के लोगों को जीवन मूल्यों से जोड़ देता था. व्यवसाय का केंद्र परिवार था - परिवार का आपसी प्रेम व्यापारिक संबंधों में भी परिलक्षित होता था.

२०. प्रेम भरा संवाद : मारवाड़ी लोगों ने अनेक व्यवस्थाएं की थी जिनमे आपसी मधुर संवाद हो सके. सब पुरुष लोग एक साथ एक ही थाली में भोजन करते थे और सब महिलायें एक साथ एक ही थाली में भोजन करती थी. इस प्रकार भोजन के दौरान आपस में मधुर संवाद स्थापित हो जाता था. रात्रि में युवा वर्ग बुजुर्गों के पैर दबाता था और उसी दौरान बुजुर्ग लोग युवाओं को व्यापारिक सीख भी दिया करते थे और दिन भर के समाचार भी पूछ लेते थे. उसी समय वे उनको व्यावसायिक नीतियों और परम्पराओं की शिक्षा भी प्रदान करते थे. इसी प्रकार मारवाड़ी उद्यमी अपने कर्मचारियों से भी प्रेम से बात करते थे और इस प्रकार एक सौहार्द-पूर्ण माहौल बनाया करते थे.

२१. सुव्यवस्थित खाते और सुव्यवस्थित वार्षिक विवरण : - मारवाड़ी उद्यमी दिवाली से दिवाली अपने व्यापार के बही - खाते रखते थे. बहीखाते बहुत ही सुन्दर अक्षरों में लिखे जाते थे जिनमे कभी भी कोई त्रुटि नहीं होती थी. हर विवरण बहुत ही सहेज कर रखा जाता था. हर दिवाली को नयी पुस्तकों में खाते - बही की पूजा कर के शुरुआत की जाती थी. हर खाता पूरी तरह से व्यवस्थित होता था. उस जमाने में कम्प्यूटर नहीं था अतः सारे खाते वर्षों तक  सुरक्षित रखे जाते थे.


पूरी दुनिया जानती है किस प्रकार बजाज, बिरला, सिंघानिया, पीरामल, लोहिया, दुगड़, गोलछा, संघवी, मित्तल, पोद्दार, रुइया, और बियानी आदि घराने अपने व्यापारिक कौशल से आगे बढे हैं. बिरला समूह तो इस बात के लिए जाना जाता है की वो फैक्ट्री बाद में लगाता है - पहले वहां लक्ष्मी नारायण का मंदिर बनाता है, लोगों को रहने के लिए मकान देता है और फिर फैक्ट्री लगाता है. है न अद्भुत बात. भामा शाह ने राणा प्रताप को दिल खोल कर मदद की तो जमनालाल बजाज ने गाँधी जी को दिल खोल कर मदद की. इन्हीं नीतियों के कारण अंग्रेजों के आने से पहले भारत में लाखों गुरुकुल, उपासरे, पोशालाएँ, धर्मशालाएं, भोजनशलायें कार्यरत थी और उस समय की शिक्षा मूल्य परक थी. उस समय में हर घर में श्रवण कुमार जैसे पुत्र होते थे जो अपने व्यापार से ज्यादा अपने माँ - बाप और देश की सेवा को तबज्जु देते थे. मारवाड़ी व्यवस्था में कमियां निकालना बहुत आसान है लेकिन उसकी जो अच्छाइयां हैं उनको अगर आज का उद्यमी अपनाता है तो वो निश्चित रूप से पर्यावरण के अनुकूल प्रबंध व्यवस्था स्थापित कर पायेगा और इससे उसका और इस दुनिया का दोनों का भला ही होगा. लेकिन लुप्त हो रही इस व्यवस्था से सीखना और इसको आगे बचाना अब तो मुश्किल ही है. अमेरिका की आधुनिक प्रबंध शिक्षा हो सकता है अधिक आर्थिक सफलता प्रदान कर दे लेकिन जो सुकून और पर्यावरण से जो जुड़ाव भारतीय व्यवस्थाओं ने स्थापित किया था वो तो अब लुप्त ही हो गया है और इसके लिए वर्तमान पीढ़ी ही जिम्मेदार है.