Wednesday, August 15, 2018

अर्थशास्त्र से परे....... रिलेटिव इकोनॉमिक्स और अन्य दर्शन

अर्थशास्त्र से परे....... रिलेटिव इकोनॉमिक्स और अन्य दर्शन


अर्थशास्त्र लोगों को सिर्फ और सिर्फ भौतिक प्रगति और आर्थिक साधनों पर ही केंद्रित करता है - जो देश के समग्र विकास के लिए उचित नहीं है. आज जरुरत है अलग सोच. भूटान जैसे देश ने हैप्पीनेस को आधार बना कर एक आदर्श प्रस्तुत किया है. प्रस्तुत है रिलेटिव इकोनॉमिक्स का विचार - जो आचार्य महाप्रज्ञ ने भारतीय दर्शन के आधार पर प्रस्तुत किया. रिलेटिव इकोनॉमिक्स विकास की एक ऐसी आधारशिला है जिसमे हम विकास की योजना बनाते समय निम्न को प्राथमिकता देते हैं : -

 

१. मानवीय मूल्य,

२. नीतिशास्त्र

३. संतुलित विकास की अवधारणा

४. मानवीय मूल्यों पर आधारित विकास के सोपान

५. अहिंसा और अपरिग्रह पर आधारित आर्थिक और सामाजिक ढांचा

६. विविधता को संजोने और संरक्षित करने वाली नीतियां

 

वर्तमान आर्थिक योजनाओं का केंद्र सिर्फ जीडीपी रहता है यानी येन केन प्रकरण उत्पादन बढ़ाना और उसके आंकड़ों से विकास को मापना - भले ही इस प्रक्रिया में समाज के लिए हानिकारक वस्तुओं का उत्पादन बढे. समाज पर उत्पादों के प्रभाव का विश्लेषण नहीं किया जाता है और इन सब प्रश्नों  को "मार्किट फोर्सेज" के हवाले कर दिया जाता है. आज का नीति निर्माता यह नहीं देखता की उसके द्वारा उपभोग को बढ़ावा देने की नीति के कारण किस प्रकार की वस्तुओं और किस प्रकार के मूल्यों को बढ़ावा मिल रहा है. आज का अर्थशाष्त्री अपने को नीतिशास्त्र से दूर रखना चाहता है. इन सभी कारणों से आज के आर्थिक योजनाकारों ने ऐसी योजनाएं बना दी हैं जिनके कारण समाज, परिवार और यहाँ तक की मानव मात्र का मूल्यों से नाता टूट रहा है. इस विखंडित होते समाज को देख कर सभी लोग दुखी हैं और आज सब यह मान रहें हैं की मूल्य विहीन आर्थिक नीतियां समाज को नुक्सान पहुंचा रही हैं.हमारी नीतियों के कारण हर रोज अनेक वनस्पतियां लुप्त हो रहीं हैं और जैव-विविधता को खतरा हो गया है. हर दिन किसी ने किसी प्रजाति के लुप्त होने  की स्थितियां बनाने के लिए हमारी आर्थिक नीतियां भी जिम्मेदार हैं. आज मानवीय लिप्सा के कारण जंगल, पेड़, वन्य प्राणी और जीव जंतु सबके अस्तित्व को खतरा है.  आज आर्थिक नीति निर्माताओं को एक विकल्प की जरुरत है क्योंकि अगर इसी प्रकार की नीतियां जारी रहीं तो मानव मात्र के अस्तित्व को भी खतरा हो जाएगा. आर्थिक नीति निर्माताओं के पास कोई विकल्प नहीं हैं. आज हम सब को एक विकल्प नजर आ रहा है जो आचार्य महाप्रज्ञ जी ने रिलेटिव इकनोमिक के रूप में दिया था. आचार्य महाप्रज्ञ जी ने रिलेटिव इकोनॉमिक्स के रूप में हमें भविष्य की समस्याओं का एक समाधान दिया है. आने वाले समय में निम्न समस्याओं का सामना करने के लिए हम पूरी तरह से तैयार नहीं हैं और यह बात संयुक्त राष्ट्र भी मानता है : -

 

अ. क्लाइमेट चेंज - यानी बढ़ते तापमान के कारण होने वाली समस्याएं

आ . मानवाधिकारों के उल्लंघन की समस्या व् बढ़ती हिंसा व् असंतोष

इ . प्रदुषण व् अन्य मानव  कृत समस्याएं जो हम सब व्यक्तियों के लिए अस्तित्व का खतरा बना सकता है

ई . पर्यावरण व्  जैव-विविधता को खतरा

 

उपर्युक्त सभी समस्याओं की जड़ में जाते हैं तो हम पाते हैं की हमारी भोगवादी आर्थिक नीतियां ही इन समस्याओं के लिए जिम्मेदार हैं. आज अनेक अर्थशाष्त्री यह मान रहें हैं की वर्तमान आर्थिक नीतियां हमारी समस्याओं का समाधान करने की जगह हमें मुश्किलों में दाल रहीं हैं. हमारी आर्थिक नीतियां बनाने वाले लोग स्वयं मान रहें हैं की उनकी आर्थिक नीतियां "सस्टेनेबल डेवलपमेंट" नहीं कर सकती. आज तो प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी मान लिया है की योजना आयोग को हटा कर इसकी जगह कोई नयी संस्था बनाने की जरुरत है ताकि एक बेहतर और विस्तृत योजना बनायीं जा सके जो इस देश के विकास में मदद कर सके.

 

रिलेटिव इकोनॉमिक्स का आधार भगवान महावीर का जीवन दर्शन है. भगवान महावीर ने गृहस्थों को जीवन जीने के लिए कई मार्गदर्शन प्रदान किये थे, जैसे : -

अ. उपभोग में संयम की जरुरत है. सिर्फ उपभोग के लिए उपभोग नहीं होना चाहिए बल्कि मानव के कल्याण के लिए उपभोग होना चाहिए

आ . स्याद्वाद के रूप में एक ऐसी व्यवस्था जिसमे लोग अपने विचारों से अलग विचारों का भी सम्मान कर सकें और विचारों में विविधता को स्वीकार सकें

ई . प्रकृति में हर प्राणी, हर आत्मा को अपना कल्याण करने का हक है और अपनी गति से जीने और रहने का हक है. महावीर ने तो भूमि, अग्नि, और जल में भी आत्मा की अभिव्यक्ति को स्वीकारा है. यानी प्रकृति के साथ किसी भी रूप में अन्याय नहीं होना चाहिए. यही मन्त्र आज जय-विविधता को बचने के लिए जरुरी है.

 

रिलेटिव इकोनॉमिक्स को एक जीवन प्रशिक्षण के रूप में लागू किया जाना

कई विश्व-विद्यालय रिलेटिव इकोनॉमिक्स को एक विषय के रूप में शुरू कर रहें हैं. आज यह मन जा रहा है की रिलेटिव इकोनॉमिक्स के प्रशिक्षण से हम नै पीढ़ी को एक बेहतर इंसान बना पाएंगे और उनको मानवीय मूल्यों से जोड़ पाएंगे. आज हमें युवाओं में मूल्यों पर आधारित नेतृत्व का अभाव नजर रहा है जिसका कारन हमारी शिक्षा व्यवस्था है.  रिलेटिव इकोनॉमिक्स मूल्य आधारित व्यवस्थाओं को स्थापित करने की दिशा में एक अभिनव पाठ्यक्रम साबित होगा.

 

रिलेटिव इकोनॉमिक्स के मुख्य प्रशिक्षण बिंदु

रिलेटिव इकोनॉमिक्स में निम्न बिन्दुओं पर मुख्य रूप से प्रशिक्षण दिया जाएगा : -

अ. मानवीय जीवन मूल्य आधारित संयम को प्रोत्साहित करने वाली आर्थिक और सामजिक नीतियां और व्यवस्थाएं

आ. सोशल आंतरप्रीन्यूरशिप - यानी सामजिक उद्यमिता  - जिससे युवा वर्ग समाज का विकास करने के लिए अपना व्यापर या उद्यम स्थापित करे और समाज के विकास को प्राथमिक लक्ष रख कर ही नए उत्पाद और नयी सेवाएं विकसित करें. उद्यमिता की प्रक्रिया में नए उत्पाद और नयी सेवाओं के निर्माण की प्रक्रिया भी इस के प्रशिक्षण का हिस्सा होगा यानी जो भी उत्पाद या सेवाएं बनायीं जाएँ उनका आधार प्रकृति और पर्यावरण से तालमेल होना चाहिए.

ई. पर्यावरण और प्रकृति केंद्रित व्यवष्टयं : -समाज के बहुआयामी विकास के लिए नयी व्यवस्थाएं बनाने हेतु नेतृत्व - जो हर क्षेत्र में प्राणी मात्र के सह-अस्तित्व को स्वीकार करे. 

 

रिलेटिव इकोनॉमिक्स आधारित एनवायरनमेंट एंड सोशल ऑडिट

आज का अंकेक्षक सिर्फ लाभ हानि या मौद्रिक मूल्याङ्कन पर ही नजर रखता है. रिलेटिव इकोनॉमिक्स पर्यावरण और समाज पर पड़ने वाले परिणाम के मूल्याङ्कन पर जोर देता है अतः भविष्य की जरुरत के अनुसार अंकेक्षण का दायरा भी विस्तृत होना चाहिए.

 

नयी तकनीक, नयी जीवन-शैली

फैशन के बारे में कहा जाता है की यह घूम फिर कर वापस आती है. रिलेटिव इकोनॉमिक्स हमारे टेक्नोलॉजिस्ट्स को फिर से जमीन से जुड़े उत्पाद बनाने के लिए प्रेरित कर फिर से नए उत्पाद और नयी जीवन शैली को प्रोत्साहित करता है जो की काफी सीमा तक हमारी परम्परों से जुड़ा है. यानी जो उत्पाद और जो जीवन शैली भारत के भू भाग से लुप्त हो गयी है उसको वापस खोजने की जरुरत है. अब ऐसे उत्पाद बनाने पड़ेंगे जो पर्यावरण के अनुकूल होंगे, जैसे हम लोग सैकड़ों वर्ष पहले प्रकृति की गोद में रह कर बिना प्रकृति को नुक्सान पहुंचाए उपभोग करते थे. आज फिर से ऐसे शोध कर्ताओं की जरुरत होगी जो प्रकृति - प्रेमी हों और प्रकृति के अनुकूल नयी तकनीक को प्रोत्साहन देवें.

वर्तमान आर्थिक योजनाओं को रिलेटिव इकोनॉमिक्स की जरुरत

आज हम देख रहें हैं की योजना बनाते समय हमारे योजनविद मानवीय मूल्यों को यह मानते हुए नजर-अंदाज कर देते हैं की इनका आंकड़ों में प्रस्तुतिकरण सम्भव नहीं है. इस प्रकार हमारी योजनाएं मानवीय मूल्यों से निरपेक्ष होती हैं. मूल्य विहीन योजनाएं हमें अपने जीवन और चेतना से भी विहीन कर देगी. अतः आज फिर से एक मुहीम की जरुरत है की जो भी नीति निर्माता हो वे मूल्य आधारित नियोजन यानी रिलेटिव इकोनॉमिक्स का प्रशिक्षण लेवें और इसी के लिए अपने आप को तैयार करें.

 

अंतरास्ट्रीय सम्मलेन

दिनांक १ व् २ नवम्बर २०१४ को दिल्ली में रिलेटिव इकोनॉमिक्स का  ९ वां संमेलन आयोजित किया गया. इस अवसर पर आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा की अर्थशास्त्रियों को भी जीवन मूल्यों और जीवन दर्शन को अपनी योजनावों का आधार बनाना चाहिए. इसी अवसर पर पधारे विविध विषय विशेषज्ञों ने भी इस बात को माना की आज एक ऐसे आर्थिक ढांचे की जरुरत है जिसमे हम मानव जीवन  मूल्यों को आधार बना कर अपनी योजनाएं बनायें न की योजनाओं को बनाते समय  मानव मूल्यों को नजर अंदाज करें. इसी सम्मलेन में मैंने रिलेटिव इकोनॉमिक्स के लिए प्रस्तावित रिसर्च और डॉक्यूमेंटेशन सेंटर का प्रारूप प्रस्तुत किया. आज सभी शिक्षा विद यह मान रहें हैं की रिलेटिव इकोनॉमिक्स की जरुरत है और जैसे ही रिलेटिव इकोनॉमिक्स पर आधारित पाठ्य पुस्तकें उपलभ्ध होंगी, वे उन को लागू कर के युवाओं को एक नयी दिशा देने का प्रयास करेंगे.

योजना निर्माण की नयी प्रणाली

आज फिर से योजना आयोग के पुनर्गठन की बात हो रही है. प्रधान-मंत्री महोदय ने योजना आयोग की जगह पर एक नयी संस्था के गठन की बात कही है. अगर हम अंतरास्ट्रीय स्टार पर देखें तो पाते हैं की १९४५ में स्थापित संयुक्त राष्ट्र ने जीवन के विविध आयामों पर विविध नीति निर्मात्री संस्थाओं का गदहन किया है जैसे १९८८ में ipcc , १९६५ में UNDP  आदि. फिर भी संयुक्त राष्ट्र आज भी मानवीय मूल्यों को प्रोत्साहित करने वाली एक संस्था की कमी महसूस कर रहा है. इसी प्रक्रिया में २००६ में एक प्रस्ताव पारित कर मानव अधिकार कौंसिल स्थापित करने का फैसला लिया गया. भारत में भी आज समय की मांग यही है की योजगा बनाने वाली संस्था एक जीवन मूल्यों को आधार बना कर योजना बनाने वाली संस्था बने. हमें उम्मीद है की हमारे देश में इस प्रकार जीवन  मूल्य आधारित नियोजन की प्रक्रिया की शुरुआत हो जायेगी. यही रिलेटिव इकोनॉमिक्स का आधार है.

अर्थशास्त्र से परे....... रिलेटिव इकोनॉमिक्स और अन्य दर्शन

अर्थशास्त्र से परे....... रिलेटिव इकोनॉमिक्स और अन्य दर्शन


अर्थशास्त्र लोगों को सिर्फ और सिर्फ भौतिक प्रगति और आर्थिक साधनों पर ही केंद्रित करता है - जो देश के समग्र विकास के लिए उचित नहीं है. आज जरुरत है अलग सोच. भूटान जैसे देश ने हैप्पीनेस को आधार बना कर एक आदर्श प्रस्तुत किया है. प्रस्तुत है रिलेटिव इकोनॉमिक्स का विचार - जो आचार्य महाप्रज्ञ ने भारतीय दर्शन के आधार पर प्रस्तुत किया. रिलेटिव इकोनॉमिक्स विकास की एक ऐसी आधारशिला है जिसमे हम विकास की योजना बनाते समय निम्न को प्राथमिकता देते हैं : -

 

१. मानवीय मूल्य,

२. नीतिशास्त्र

३. संतुलित विकास की अवधारणा

४. मानवीय मूल्यों पर आधारित विकास के सोपान

५. अहिंसा और अपरिग्रह पर आधारित आर्थिक और सामाजिक ढांचा

६. विविधता को संजोने और संरक्षित करने वाली नीतियां

 

वर्तमान आर्थिक योजनाओं का केंद्र सिर्फ जीडीपी रहता है यानी येन केन प्रकरण उत्पादन बढ़ाना और उसके आंकड़ों से विकास को मापना - भले ही इस प्रक्रिया में समाज के लिए हानिकारक वस्तुओं का उत्पादन बढे. समाज पर उत्पादों के प्रभाव का विश्लेषण नहीं किया जाता है और इन सब प्रश्नों  को "मार्किट फोर्सेज" के हवाले कर दिया जाता है. आज का नीति निर्माता यह नहीं देखता की उसके द्वारा उपभोग को बढ़ावा देने की नीति के कारण किस प्रकार की वस्तुओं और किस प्रकार के मूल्यों को बढ़ावा मिल रहा है. आज का अर्थशाष्त्री अपने को नीतिशास्त्र से दूर रखना चाहता है. इन सभी कारणों से आज के आर्थिक योजनाकारों ने ऐसी योजनाएं बना दी हैं जिनके कारण समाज, परिवार और यहाँ तक की मानव मात्र का मूल्यों से नाता टूट रहा है. इस विखंडित होते समाज को देख कर सभी लोग दुखी हैं और आज सब यह मान रहें हैं की मूल्य विहीन आर्थिक नीतियां समाज को नुक्सान पहुंचा रही हैं.हमारी नीतियों के कारण हर रोज अनेक वनस्पतियां लुप्त हो रहीं हैं और जैव-विविधता को खतरा हो गया है. हर दिन किसी ने किसी प्रजाति के लुप्त होने  की स्थितियां बनाने के लिए हमारी आर्थिक नीतियां भी जिम्मेदार हैं. आज मानवीय लिप्सा के कारण जंगल, पेड़, वन्य प्राणी और जीव जंतु सबके अस्तित्व को खतरा है.  आज आर्थिक नीति निर्माताओं को एक विकल्प की जरुरत है क्योंकि अगर इसी प्रकार की नीतियां जारी रहीं तो मानव मात्र के अस्तित्व को भी खतरा हो जाएगा. आर्थिक नीति निर्माताओं के पास कोई विकल्प नहीं हैं. आज हम सब को एक विकल्प नजर आ रहा है जो आचार्य महाप्रज्ञ जी ने रिलेटिव इकनोमिक के रूप में दिया था. आचार्य महाप्रज्ञ जी ने रिलेटिव इकोनॉमिक्स के रूप में हमें भविष्य की समस्याओं का एक समाधान दिया है. आने वाले समय में निम्न समस्याओं का सामना करने के लिए हम पूरी तरह से तैयार नहीं हैं और यह बात संयुक्त राष्ट्र भी मानता है : -

 

अ. क्लाइमेट चेंज - यानी बढ़ते तापमान के कारण होने वाली समस्याएं

आ . मानवाधिकारों के उल्लंघन की समस्या व् बढ़ती हिंसा व् असंतोष

इ . प्रदुषण व् अन्य मानव  कृत समस्याएं जो हम सब व्यक्तियों के लिए अस्तित्व का खतरा बना सकता है

ई . पर्यावरण व्  जैव-विविधता को खतरा

 

उपर्युक्त सभी समस्याओं की जड़ में जाते हैं तो हम पाते हैं की हमारी भोगवादी आर्थिक नीतियां ही इन समस्याओं के लिए जिम्मेदार हैं. आज अनेक अर्थशाष्त्री यह मान रहें हैं की वर्तमान आर्थिक नीतियां हमारी समस्याओं का समाधान करने की जगह हमें मुश्किलों में दाल रहीं हैं. हमारी आर्थिक नीतियां बनाने वाले लोग स्वयं मान रहें हैं की उनकी आर्थिक नीतियां "सस्टेनेबल डेवलपमेंट" नहीं कर सकती. आज तो प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी मान लिया है की योजना आयोग को हटा कर इसकी जगह कोई नयी संस्था बनाने की जरुरत है ताकि एक बेहतर और विस्तृत योजना बनायीं जा सके जो इस देश के विकास में मदद कर सके.

 

रिलेटिव इकोनॉमिक्स का आधार भगवान महावीर का जीवन दर्शन है. भगवान महावीर ने गृहस्थों को जीवन जीने के लिए कई मार्गदर्शन प्रदान किये थे, जैसे : -

अ. उपभोग में संयम की जरुरत है. सिर्फ उपभोग के लिए उपभोग नहीं होना चाहिए बल्कि मानव के कल्याण के लिए उपभोग होना चाहिए

आ . स्याद्वाद के रूप में एक ऐसी व्यवस्था जिसमे लोग अपने विचारों से अलग विचारों का भी सम्मान कर सकें और विचारों में विविधता को स्वीकार सकें

ई . प्रकृति में हर प्राणी, हर आत्मा को अपना कल्याण करने का हक है और अपनी गति से जीने और रहने का हक है. महावीर ने तो भूमि, अग्नि, और जल में भी आत्मा की अभिव्यक्ति को स्वीकारा है. यानी प्रकृति के साथ किसी भी रूप में अन्याय नहीं होना चाहिए. यही मन्त्र आज जय-विविधता को बचने के लिए जरुरी है.

 

रिलेटिव इकोनॉमिक्स को एक जीवन प्रशिक्षण के रूप में लागू किया जाना

कई विश्व-विद्यालय रिलेटिव इकोनॉमिक्स को एक विषय के रूप में शुरू कर रहें हैं. आज यह मन जा रहा है की रिलेटिव इकोनॉमिक्स के प्रशिक्षण से हम नै पीढ़ी को एक बेहतर इंसान बना पाएंगे और उनको मानवीय मूल्यों से जोड़ पाएंगे. आज हमें युवाओं में मूल्यों पर आधारित नेतृत्व का अभाव नजर रहा है जिसका कारन हमारी शिक्षा व्यवस्था है.  रिलेटिव इकोनॉमिक्स मूल्य आधारित व्यवस्थाओं को स्थापित करने की दिशा में एक अभिनव पाठ्यक्रम साबित होगा.

 

रिलेटिव इकोनॉमिक्स के मुख्य प्रशिक्षण बिंदु

रिलेटिव इकोनॉमिक्स में निम्न बिन्दुओं पर मुख्य रूप से प्रशिक्षण दिया जाएगा : -

अ. मानवीय जीवन मूल्य आधारित संयम को प्रोत्साहित करने वाली आर्थिक और सामजिक नीतियां और व्यवस्थाएं

आ. सोशल आंतरप्रीन्यूरशिप - यानी सामजिक उद्यमिता  - जिससे युवा वर्ग समाज का विकास करने के लिए अपना व्यापर या उद्यम स्थापित करे और समाज के विकास को प्राथमिक लक्ष रख कर ही नए उत्पाद और नयी सेवाएं विकसित करें. उद्यमिता की प्रक्रिया में नए उत्पाद और नयी सेवाओं के निर्माण की प्रक्रिया भी इस के प्रशिक्षण का हिस्सा होगा यानी जो भी उत्पाद या सेवाएं बनायीं जाएँ उनका आधार प्रकृति और पर्यावरण से तालमेल होना चाहिए.

ई. पर्यावरण और प्रकृति केंद्रित व्यवष्टयं : -समाज के बहुआयामी विकास के लिए नयी व्यवस्थाएं बनाने हेतु नेतृत्व - जो हर क्षेत्र में प्राणी मात्र के सह-अस्तित्व को स्वीकार करे. 

 

रिलेटिव इकोनॉमिक्स आधारित एनवायरनमेंट एंड सोशल ऑडिट

आज का अंकेक्षक सिर्फ लाभ हानि या मौद्रिक मूल्याङ्कन पर ही नजर रखता है. रिलेटिव इकोनॉमिक्स पर्यावरण और समाज पर पड़ने वाले परिणाम के मूल्याङ्कन पर जोर देता है अतः भविष्य की जरुरत के अनुसार अंकेक्षण का दायरा भी विस्तृत होना चाहिए.

 

नयी तकनीक, नयी जीवन-शैली

फैशन के बारे में कहा जाता है की यह घूम फिर कर वापस आती है. रिलेटिव इकोनॉमिक्स हमारे टेक्नोलॉजिस्ट्स को फिर से जमीन से जुड़े उत्पाद बनाने के लिए प्रेरित कर फिर से नए उत्पाद और नयी जीवन शैली को प्रोत्साहित करता है जो की काफी सीमा तक हमारी परम्परों से जुड़ा है. यानी जो उत्पाद और जो जीवन शैली भारत के भू भाग से लुप्त हो गयी है उसको वापस खोजने की जरुरत है. अब ऐसे उत्पाद बनाने पड़ेंगे जो पर्यावरण के अनुकूल होंगे, जैसे हम लोग सैकड़ों वर्ष पहले प्रकृति की गोद में रह कर बिना प्रकृति को नुक्सान पहुंचाए उपभोग करते थे. आज फिर से ऐसे शोध कर्ताओं की जरुरत होगी जो प्रकृति - प्रेमी हों और प्रकृति के अनुकूल नयी तकनीक को प्रोत्साहन देवें.

वर्तमान आर्थिक योजनाओं को रिलेटिव इकोनॉमिक्स की जरुरत

आज हम देख रहें हैं की योजना बनाते समय हमारे योजनविद मानवीय मूल्यों को यह मानते हुए नजर-अंदाज कर देते हैं की इनका आंकड़ों में प्रस्तुतिकरण सम्भव नहीं है. इस प्रकार हमारी योजनाएं मानवीय मूल्यों से निरपेक्ष होती हैं. मूल्य विहीन योजनाएं हमें अपने जीवन और चेतना से भी विहीन कर देगी. अतः आज फिर से एक मुहीम की जरुरत है की जो भी नीति निर्माता हो वे मूल्य आधारित नियोजन यानी रिलेटिव इकोनॉमिक्स का प्रशिक्षण लेवें और इसी के लिए अपने आप को तैयार करें.

 

अंतरास्ट्रीय सम्मलेन

दिनांक १ व् २ नवम्बर २०१४ को दिल्ली में रिलेटिव इकोनॉमिक्स का  ९ वां संमेलन आयोजित किया गया. इस अवसर पर आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा की अर्थशास्त्रियों को भी जीवन मूल्यों और जीवन दर्शन को अपनी योजनावों का आधार बनाना चाहिए. इसी अवसर पर पधारे विविध विषय विशेषज्ञों ने भी इस बात को माना की आज एक ऐसे आर्थिक ढांचे की जरुरत है जिसमे हम मानव जीवन  मूल्यों को आधार बना कर अपनी योजनाएं बनायें न की योजनाओं को बनाते समय  मानव मूल्यों को नजर अंदाज करें. इसी सम्मलेन में मैंने रिलेटिव इकोनॉमिक्स के लिए प्रस्तावित रिसर्च और डॉक्यूमेंटेशन सेंटर का प्रारूप प्रस्तुत किया. आज सभी शिक्षा विद यह मान रहें हैं की रिलेटिव इकोनॉमिक्स की जरुरत है और जैसे ही रिलेटिव इकोनॉमिक्स पर आधारित पाठ्य पुस्तकें उपलभ्ध होंगी, वे उन को लागू कर के युवाओं को एक नयी दिशा देने का प्रयास करेंगे.

योजना निर्माण की नयी प्रणाली

आज फिर से योजना आयोग के पुनर्गठन की बात हो रही है. प्रधान-मंत्री महोदय ने योजना आयोग की जगह पर एक नयी संस्था के गठन की बात कही है. अगर हम अंतरास्ट्रीय स्टार पर देखें तो पाते हैं की १९४५ में स्थापित संयुक्त राष्ट्र ने जीवन के विविध आयामों पर विविध नीति निर्मात्री संस्थाओं का गदहन किया है जैसे १९८८ में ipcc , १९६५ में UNDP  आदि. फिर भी संयुक्त राष्ट्र आज भी मानवीय मूल्यों को प्रोत्साहित करने वाली एक संस्था की कमी महसूस कर रहा है. इसी प्रक्रिया में २००६ में एक प्रस्ताव पारित कर मानव अधिकार कौंसिल स्थापित करने का फैसला लिया गया. भारत में भी आज समय की मांग यही है की योजगा बनाने वाली संस्था एक जीवन मूल्यों को आधार बना कर योजना बनाने वाली संस्था बने. हमें उम्मीद है की हमारे देश में इस प्रकार जीवन  मूल्य आधारित नियोजन की प्रक्रिया की शुरुआत हो जायेगी. यही रिलेटिव इकोनॉमिक्स का आधार है.

अर्थशास्त्र से परे....... रिलेटिव इकोनॉमिक्स और अन्य दर्शन

अर्थशास्त्र से परे....... रिलेटिव इकोनॉमिक्स और अन्य दर्शन


अर्थशास्त्र लोगों को सिर्फ और सिर्फ भौतिक प्रगति और आर्थिक साधनों पर ही केंद्रित करता है - जो देश के समग्र विकास के लिए उचित नहीं है. आज जरुरत है अलग सोच. भूटान जैसे देश ने हैप्पीनेस को आधार बना कर एक आदर्श प्रस्तुत किया है. प्रस्तुत है रिलेटिव इकोनॉमिक्स का विचार - जो आचार्य महाप्रज्ञ ने भारतीय दर्शन के आधार पर प्रस्तुत किया. रिलेटिव इकोनॉमिक्स विकास की एक ऐसी आधारशिला है जिसमे हम विकास की योजना बनाते समय निम्न को प्राथमिकता देते हैं : -

 

१. मानवीय मूल्य,

२. नीतिशास्त्र

३. संतुलित विकास की अवधारणा

४. मानवीय मूल्यों पर आधारित विकास के सोपान

५. अहिंसा और अपरिग्रह पर आधारित आर्थिक और सामाजिक ढांचा

६. विविधता को संजोने और संरक्षित करने वाली नीतियां

 

वर्तमान आर्थिक योजनाओं का केंद्र सिर्फ जीडीपी रहता है यानी येन केन प्रकरण उत्पादन बढ़ाना और उसके आंकड़ों से विकास को मापना - भले ही इस प्रक्रिया में समाज के लिए हानिकारक वस्तुओं का उत्पादन बढे. समाज पर उत्पादों के प्रभाव का विश्लेषण नहीं किया जाता है और इन सब प्रश्नों  को "मार्किट फोर्सेज" के हवाले कर दिया जाता है. आज का नीति निर्माता यह नहीं देखता की उसके द्वारा उपभोग को बढ़ावा देने की नीति के कारण किस प्रकार की वस्तुओं और किस प्रकार के मूल्यों को बढ़ावा मिल रहा है. आज का अर्थशाष्त्री अपने को नीतिशास्त्र से दूर रखना चाहता है. इन सभी कारणों से आज के आर्थिक योजनाकारों ने ऐसी योजनाएं बना दी हैं जिनके कारण समाज, परिवार और यहाँ तक की मानव मात्र का मूल्यों से नाता टूट रहा है. इस विखंडित होते समाज को देख कर सभी लोग दुखी हैं और आज सब यह मान रहें हैं की मूल्य विहीन आर्थिक नीतियां समाज को नुक्सान पहुंचा रही हैं.हमारी नीतियों के कारण हर रोज अनेक वनस्पतियां लुप्त हो रहीं हैं और जैव-विविधता को खतरा हो गया है. हर दिन किसी ने किसी प्रजाति के लुप्त होने  की स्थितियां बनाने के लिए हमारी आर्थिक नीतियां भी जिम्मेदार हैं. आज मानवीय लिप्सा के कारण जंगल, पेड़, वन्य प्राणी और जीव जंतु सबके अस्तित्व को खतरा है.  आज आर्थिक नीति निर्माताओं को एक विकल्प की जरुरत है क्योंकि अगर इसी प्रकार की नीतियां जारी रहीं तो मानव मात्र के अस्तित्व को भी खतरा हो जाएगा. आर्थिक नीति निर्माताओं के पास कोई विकल्प नहीं हैं. आज हम सब को एक विकल्प नजर आ रहा है जो आचार्य महाप्रज्ञ जी ने रिलेटिव इकनोमिक के रूप में दिया था. आचार्य महाप्रज्ञ जी ने रिलेटिव इकोनॉमिक्स के रूप में हमें भविष्य की समस्याओं का एक समाधान दिया है. आने वाले समय में निम्न समस्याओं का सामना करने के लिए हम पूरी तरह से तैयार नहीं हैं और यह बात संयुक्त राष्ट्र भी मानता है : -

 

अ. क्लाइमेट चेंज - यानी बढ़ते तापमान के कारण होने वाली समस्याएं

आ . मानवाधिकारों के उल्लंघन की समस्या व् बढ़ती हिंसा व् असंतोष

इ . प्रदुषण व् अन्य मानव  कृत समस्याएं जो हम सब व्यक्तियों के लिए अस्तित्व का खतरा बना सकता है

ई . पर्यावरण व्  जैव-विविधता को खतरा

 

उपर्युक्त सभी समस्याओं की जड़ में जाते हैं तो हम पाते हैं की हमारी भोगवादी आर्थिक नीतियां ही इन समस्याओं के लिए जिम्मेदार हैं. आज अनेक अर्थशाष्त्री यह मान रहें हैं की वर्तमान आर्थिक नीतियां हमारी समस्याओं का समाधान करने की जगह हमें मुश्किलों में दाल रहीं हैं. हमारी आर्थिक नीतियां बनाने वाले लोग स्वयं मान रहें हैं की उनकी आर्थिक नीतियां "सस्टेनेबल डेवलपमेंट" नहीं कर सकती. आज तो प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी मान लिया है की योजना आयोग को हटा कर इसकी जगह कोई नयी संस्था बनाने की जरुरत है ताकि एक बेहतर और विस्तृत योजना बनायीं जा सके जो इस देश के विकास में मदद कर सके.

 

रिलेटिव इकोनॉमिक्स का आधार भगवान महावीर का जीवन दर्शन है. भगवान महावीर ने गृहस्थों को जीवन जीने के लिए कई मार्गदर्शन प्रदान किये थे, जैसे : -

अ. उपभोग में संयम की जरुरत है. सिर्फ उपभोग के लिए उपभोग नहीं होना चाहिए बल्कि मानव के कल्याण के लिए उपभोग होना चाहिए

आ . स्याद्वाद के रूप में एक ऐसी व्यवस्था जिसमे लोग अपने विचारों से अलग विचारों का भी सम्मान कर सकें और विचारों में विविधता को स्वीकार सकें

ई . प्रकृति में हर प्राणी, हर आत्मा को अपना कल्याण करने का हक है और अपनी गति से जीने और रहने का हक है. महावीर ने तो भूमि, अग्नि, और जल में भी आत्मा की अभिव्यक्ति को स्वीकारा है. यानी प्रकृति के साथ किसी भी रूप में अन्याय नहीं होना चाहिए. यही मन्त्र आज जय-विविधता को बचने के लिए जरुरी है.

 

रिलेटिव इकोनॉमिक्स को एक जीवन प्रशिक्षण के रूप में लागू किया जाना

कई विश्व-विद्यालय रिलेटिव इकोनॉमिक्स को एक विषय के रूप में शुरू कर रहें हैं. आज यह मन जा रहा है की रिलेटिव इकोनॉमिक्स के प्रशिक्षण से हम नै पीढ़ी को एक बेहतर इंसान बना पाएंगे और उनको मानवीय मूल्यों से जोड़ पाएंगे. आज हमें युवाओं में मूल्यों पर आधारित नेतृत्व का अभाव नजर रहा है जिसका कारन हमारी शिक्षा व्यवस्था है.  रिलेटिव इकोनॉमिक्स मूल्य आधारित व्यवस्थाओं को स्थापित करने की दिशा में एक अभिनव पाठ्यक्रम साबित होगा.

 

रिलेटिव इकोनॉमिक्स के मुख्य प्रशिक्षण बिंदु

रिलेटिव इकोनॉमिक्स में निम्न बिन्दुओं पर मुख्य रूप से प्रशिक्षण दिया जाएगा : -

अ. मानवीय जीवन मूल्य आधारित संयम को प्रोत्साहित करने वाली आर्थिक और सामजिक नीतियां और व्यवस्थाएं

आ. सोशल आंतरप्रीन्यूरशिप - यानी सामजिक उद्यमिता  - जिससे युवा वर्ग समाज का विकास करने के लिए अपना व्यापर या उद्यम स्थापित करे और समाज के विकास को प्राथमिक लक्ष रख कर ही नए उत्पाद और नयी सेवाएं विकसित करें. उद्यमिता की प्रक्रिया में नए उत्पाद और नयी सेवाओं के निर्माण की प्रक्रिया भी इस के प्रशिक्षण का हिस्सा होगा यानी जो भी उत्पाद या सेवाएं बनायीं जाएँ उनका आधार प्रकृति और पर्यावरण से तालमेल होना चाहिए.

ई. पर्यावरण और प्रकृति केंद्रित व्यवष्टयं : -समाज के बहुआयामी विकास के लिए नयी व्यवस्थाएं बनाने हेतु नेतृत्व - जो हर क्षेत्र में प्राणी मात्र के सह-अस्तित्व को स्वीकार करे. 

 

रिलेटिव इकोनॉमिक्स आधारित एनवायरनमेंट एंड सोशल ऑडिट

आज का अंकेक्षक सिर्फ लाभ हानि या मौद्रिक मूल्याङ्कन पर ही नजर रखता है. रिलेटिव इकोनॉमिक्स पर्यावरण और समाज पर पड़ने वाले परिणाम के मूल्याङ्कन पर जोर देता है अतः भविष्य की जरुरत के अनुसार अंकेक्षण का दायरा भी विस्तृत होना चाहिए.

 

नयी तकनीक, नयी जीवन-शैली

फैशन के बारे में कहा जाता है की यह घूम फिर कर वापस आती है. रिलेटिव इकोनॉमिक्स हमारे टेक्नोलॉजिस्ट्स को फिर से जमीन से जुड़े उत्पाद बनाने के लिए प्रेरित कर फिर से नए उत्पाद और नयी जीवन शैली को प्रोत्साहित करता है जो की काफी सीमा तक हमारी परम्परों से जुड़ा है. यानी जो उत्पाद और जो जीवन शैली भारत के भू भाग से लुप्त हो गयी है उसको वापस खोजने की जरुरत है. अब ऐसे उत्पाद बनाने पड़ेंगे जो पर्यावरण के अनुकूल होंगे, जैसे हम लोग सैकड़ों वर्ष पहले प्रकृति की गोद में रह कर बिना प्रकृति को नुक्सान पहुंचाए उपभोग करते थे. आज फिर से ऐसे शोध कर्ताओं की जरुरत होगी जो प्रकृति - प्रेमी हों और प्रकृति के अनुकूल नयी तकनीक को प्रोत्साहन देवें.

वर्तमान आर्थिक योजनाओं को रिलेटिव इकोनॉमिक्स की जरुरत

आज हम देख रहें हैं की योजना बनाते समय हमारे योजनविद मानवीय मूल्यों को यह मानते हुए नजर-अंदाज कर देते हैं की इनका आंकड़ों में प्रस्तुतिकरण सम्भव नहीं है. इस प्रकार हमारी योजनाएं मानवीय मूल्यों से निरपेक्ष होती हैं. मूल्य विहीन योजनाएं हमें अपने जीवन और चेतना से भी विहीन कर देगी. अतः आज फिर से एक मुहीम की जरुरत है की जो भी नीति निर्माता हो वे मूल्य आधारित नियोजन यानी रिलेटिव इकोनॉमिक्स का प्रशिक्षण लेवें और इसी के लिए अपने आप को तैयार करें.

 

अंतरास्ट्रीय सम्मलेन

दिनांक १ व् २ नवम्बर २०१४ को दिल्ली में रिलेटिव इकोनॉमिक्स का  ९ वां संमेलन आयोजित किया गया. इस अवसर पर आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा की अर्थशास्त्रियों को भी जीवन मूल्यों और जीवन दर्शन को अपनी योजनावों का आधार बनाना चाहिए. इसी अवसर पर पधारे विविध विषय विशेषज्ञों ने भी इस बात को माना की आज एक ऐसे आर्थिक ढांचे की जरुरत है जिसमे हम मानव जीवन  मूल्यों को आधार बना कर अपनी योजनाएं बनायें न की योजनाओं को बनाते समय  मानव मूल्यों को नजर अंदाज करें. इसी सम्मलेन में मैंने रिलेटिव इकोनॉमिक्स के लिए प्रस्तावित रिसर्च और डॉक्यूमेंटेशन सेंटर का प्रारूप प्रस्तुत किया. आज सभी शिक्षा विद यह मान रहें हैं की रिलेटिव इकोनॉमिक्स की जरुरत है और जैसे ही रिलेटिव इकोनॉमिक्स पर आधारित पाठ्य पुस्तकें उपलभ्ध होंगी, वे उन को लागू कर के युवाओं को एक नयी दिशा देने का प्रयास करेंगे.

योजना निर्माण की नयी प्रणाली

आज फिर से योजना आयोग के पुनर्गठन की बात हो रही है. प्रधान-मंत्री महोदय ने योजना आयोग की जगह पर एक नयी संस्था के गठन की बात कही है. अगर हम अंतरास्ट्रीय स्टार पर देखें तो पाते हैं की १९४५ में स्थापित संयुक्त राष्ट्र ने जीवन के विविध आयामों पर विविध नीति निर्मात्री संस्थाओं का गदहन किया है जैसे १९८८ में ipcc , १९६५ में UNDP  आदि. फिर भी संयुक्त राष्ट्र आज भी मानवीय मूल्यों को प्रोत्साहित करने वाली एक संस्था की कमी महसूस कर रहा है. इसी प्रक्रिया में २००६ में एक प्रस्ताव पारित कर मानव अधिकार कौंसिल स्थापित करने का फैसला लिया गया. भारत में भी आज समय की मांग यही है की योजगा बनाने वाली संस्था एक जीवन मूल्यों को आधार बना कर योजना बनाने वाली संस्था बने. हमें उम्मीद है की हमारे देश में इस प्रकार जीवन  मूल्य आधारित नियोजन की प्रक्रिया की शुरुआत हो जायेगी. यही रिलेटिव इकोनॉमिक्स का आधार है.

अर्थशास्त्र से परे....... रिलेटिव इकोनॉमिक्स और अन्य दर्शन

अर्थशास्त्र से परे....... रिलेटिव इकोनॉमिक्स और अन्य दर्शन


अर्थशास्त्र लोगों को सिर्फ और सिर्फ भौतिक प्रगति और आर्थिक साधनों पर ही केंद्रित करता है - जो देश के समग्र विकास के लिए उचित नहीं है. आज जरुरत है अलग सोच. भूटान जैसे देश ने हैप्पीनेस को आधार बना कर एक आदर्श प्रस्तुत किया है. प्रस्तुत है रिलेटिव इकोनॉमिक्स का विचार - जो आचार्य महाप्रज्ञ ने भारतीय दर्शन के आधार पर प्रस्तुत किया. रिलेटिव इकोनॉमिक्स विकास की एक ऐसी आधारशिला है जिसमे हम विकास की योजना बनाते समय निम्न को प्राथमिकता देते हैं : -

 

१. मानवीय मूल्य,

२. नीतिशास्त्र

३. संतुलित विकास की अवधारणा

४. मानवीय मूल्यों पर आधारित विकास के सोपान

५. अहिंसा और अपरिग्रह पर आधारित आर्थिक और सामाजिक ढांचा

६. विविधता को संजोने और संरक्षित करने वाली नीतियां

 

वर्तमान आर्थिक योजनाओं का केंद्र सिर्फ जीडीपी रहता है यानी येन केन प्रकरण उत्पादन बढ़ाना और उसके आंकड़ों से विकास को मापना - भले ही इस प्रक्रिया में समाज के लिए हानिकारक वस्तुओं का उत्पादन बढे. समाज पर उत्पादों के प्रभाव का विश्लेषण नहीं किया जाता है और इन सब प्रश्नों  को "मार्किट फोर्सेज" के हवाले कर दिया जाता है. आज का नीति निर्माता यह नहीं देखता की उसके द्वारा उपभोग को बढ़ावा देने की नीति के कारण किस प्रकार की वस्तुओं और किस प्रकार के मूल्यों को बढ़ावा मिल रहा है. आज का अर्थशाष्त्री अपने को नीतिशास्त्र से दूर रखना चाहता है. इन सभी कारणों से आज के आर्थिक योजनाकारों ने ऐसी योजनाएं बना दी हैं जिनके कारण समाज, परिवार और यहाँ तक की मानव मात्र का मूल्यों से नाता टूट रहा है. इस विखंडित होते समाज को देख कर सभी लोग दुखी हैं और आज सब यह मान रहें हैं की मूल्य विहीन आर्थिक नीतियां समाज को नुक्सान पहुंचा रही हैं.हमारी नीतियों के कारण हर रोज अनेक वनस्पतियां लुप्त हो रहीं हैं और जैव-विविधता को खतरा हो गया है. हर दिन किसी ने किसी प्रजाति के लुप्त होने  की स्थितियां बनाने के लिए हमारी आर्थिक नीतियां भी जिम्मेदार हैं. आज मानवीय लिप्सा के कारण जंगल, पेड़, वन्य प्राणी और जीव जंतु सबके अस्तित्व को खतरा है.  आज आर्थिक नीति निर्माताओं को एक विकल्प की जरुरत है क्योंकि अगर इसी प्रकार की नीतियां जारी रहीं तो मानव मात्र के अस्तित्व को भी खतरा हो जाएगा. आर्थिक नीति निर्माताओं के पास कोई विकल्प नहीं हैं. आज हम सब को एक विकल्प नजर आ रहा है जो आचार्य महाप्रज्ञ जी ने रिलेटिव इकनोमिक के रूप में दिया था. आचार्य महाप्रज्ञ जी ने रिलेटिव इकोनॉमिक्स के रूप में हमें भविष्य की समस्याओं का एक समाधान दिया है. आने वाले समय में निम्न समस्याओं का सामना करने के लिए हम पूरी तरह से तैयार नहीं हैं और यह बात संयुक्त राष्ट्र भी मानता है : -

 

अ. क्लाइमेट चेंज - यानी बढ़ते तापमान के कारण होने वाली समस्याएं

आ . मानवाधिकारों के उल्लंघन की समस्या व् बढ़ती हिंसा व् असंतोष

इ . प्रदुषण व् अन्य मानव  कृत समस्याएं जो हम सब व्यक्तियों के लिए अस्तित्व का खतरा बना सकता है

ई . पर्यावरण व्  जैव-विविधता को खतरा

 

उपर्युक्त सभी समस्याओं की जड़ में जाते हैं तो हम पाते हैं की हमारी भोगवादी आर्थिक नीतियां ही इन समस्याओं के लिए जिम्मेदार हैं. आज अनेक अर्थशाष्त्री यह मान रहें हैं की वर्तमान आर्थिक नीतियां हमारी समस्याओं का समाधान करने की जगह हमें मुश्किलों में दाल रहीं हैं. हमारी आर्थिक नीतियां बनाने वाले लोग स्वयं मान रहें हैं की उनकी आर्थिक नीतियां "सस्टेनेबल डेवलपमेंट" नहीं कर सकती. आज तो प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी मान लिया है की योजना आयोग को हटा कर इसकी जगह कोई नयी संस्था बनाने की जरुरत है ताकि एक बेहतर और विस्तृत योजना बनायीं जा सके जो इस देश के विकास में मदद कर सके.

 

रिलेटिव इकोनॉमिक्स का आधार भगवान महावीर का जीवन दर्शन है. भगवान महावीर ने गृहस्थों को जीवन जीने के लिए कई मार्गदर्शन प्रदान किये थे, जैसे : -

अ. उपभोग में संयम की जरुरत है. सिर्फ उपभोग के लिए उपभोग नहीं होना चाहिए बल्कि मानव के कल्याण के लिए उपभोग होना चाहिए

आ . स्याद्वाद के रूप में एक ऐसी व्यवस्था जिसमे लोग अपने विचारों से अलग विचारों का भी सम्मान कर सकें और विचारों में विविधता को स्वीकार सकें

ई . प्रकृति में हर प्राणी, हर आत्मा को अपना कल्याण करने का हक है और अपनी गति से जीने और रहने का हक है. महावीर ने तो भूमि, अग्नि, और जल में भी आत्मा की अभिव्यक्ति को स्वीकारा है. यानी प्रकृति के साथ किसी भी रूप में अन्याय नहीं होना चाहिए. यही मन्त्र आज जय-विविधता को बचने के लिए जरुरी है.

 

रिलेटिव इकोनॉमिक्स को एक जीवन प्रशिक्षण के रूप में लागू किया जाना

कई विश्व-विद्यालय रिलेटिव इकोनॉमिक्स को एक विषय के रूप में शुरू कर रहें हैं. आज यह मन जा रहा है की रिलेटिव इकोनॉमिक्स के प्रशिक्षण से हम नै पीढ़ी को एक बेहतर इंसान बना पाएंगे और उनको मानवीय मूल्यों से जोड़ पाएंगे. आज हमें युवाओं में मूल्यों पर आधारित नेतृत्व का अभाव नजर रहा है जिसका कारन हमारी शिक्षा व्यवस्था है.  रिलेटिव इकोनॉमिक्स मूल्य आधारित व्यवस्थाओं को स्थापित करने की दिशा में एक अभिनव पाठ्यक्रम साबित होगा.

 

रिलेटिव इकोनॉमिक्स के मुख्य प्रशिक्षण बिंदु

रिलेटिव इकोनॉमिक्स में निम्न बिन्दुओं पर मुख्य रूप से प्रशिक्षण दिया जाएगा : -

अ. मानवीय जीवन मूल्य आधारित संयम को प्रोत्साहित करने वाली आर्थिक और सामजिक नीतियां और व्यवस्थाएं

आ. सोशल आंतरप्रीन्यूरशिप - यानी सामजिक उद्यमिता  - जिससे युवा वर्ग समाज का विकास करने के लिए अपना व्यापर या उद्यम स्थापित करे और समाज के विकास को प्राथमिक लक्ष रख कर ही नए उत्पाद और नयी सेवाएं विकसित करें. उद्यमिता की प्रक्रिया में नए उत्पाद और नयी सेवाओं के निर्माण की प्रक्रिया भी इस के प्रशिक्षण का हिस्सा होगा यानी जो भी उत्पाद या सेवाएं बनायीं जाएँ उनका आधार प्रकृति और पर्यावरण से तालमेल होना चाहिए.

ई. पर्यावरण और प्रकृति केंद्रित व्यवष्टयं : -समाज के बहुआयामी विकास के लिए नयी व्यवस्थाएं बनाने हेतु नेतृत्व - जो हर क्षेत्र में प्राणी मात्र के सह-अस्तित्व को स्वीकार करे. 

 

रिलेटिव इकोनॉमिक्स आधारित एनवायरनमेंट एंड सोशल ऑडिट

आज का अंकेक्षक सिर्फ लाभ हानि या मौद्रिक मूल्याङ्कन पर ही नजर रखता है. रिलेटिव इकोनॉमिक्स पर्यावरण और समाज पर पड़ने वाले परिणाम के मूल्याङ्कन पर जोर देता है अतः भविष्य की जरुरत के अनुसार अंकेक्षण का दायरा भी विस्तृत होना चाहिए.

 

नयी तकनीक, नयी जीवन-शैली

फैशन के बारे में कहा जाता है की यह घूम फिर कर वापस आती है. रिलेटिव इकोनॉमिक्स हमारे टेक्नोलॉजिस्ट्स को फिर से जमीन से जुड़े उत्पाद बनाने के लिए प्रेरित कर फिर से नए उत्पाद और नयी जीवन शैली को प्रोत्साहित करता है जो की काफी सीमा तक हमारी परम्परों से जुड़ा है. यानी जो उत्पाद और जो जीवन शैली भारत के भू भाग से लुप्त हो गयी है उसको वापस खोजने की जरुरत है. अब ऐसे उत्पाद बनाने पड़ेंगे जो पर्यावरण के अनुकूल होंगे, जैसे हम लोग सैकड़ों वर्ष पहले प्रकृति की गोद में रह कर बिना प्रकृति को नुक्सान पहुंचाए उपभोग करते थे. आज फिर से ऐसे शोध कर्ताओं की जरुरत होगी जो प्रकृति - प्रेमी हों और प्रकृति के अनुकूल नयी तकनीक को प्रोत्साहन देवें.

वर्तमान आर्थिक योजनाओं को रिलेटिव इकोनॉमिक्स की जरुरत

आज हम देख रहें हैं की योजना बनाते समय हमारे योजनविद मानवीय मूल्यों को यह मानते हुए नजर-अंदाज कर देते हैं की इनका आंकड़ों में प्रस्तुतिकरण सम्भव नहीं है. इस प्रकार हमारी योजनाएं मानवीय मूल्यों से निरपेक्ष होती हैं. मूल्य विहीन योजनाएं हमें अपने जीवन और चेतना से भी विहीन कर देगी. अतः आज फिर से एक मुहीम की जरुरत है की जो भी नीति निर्माता हो वे मूल्य आधारित नियोजन यानी रिलेटिव इकोनॉमिक्स का प्रशिक्षण लेवें और इसी के लिए अपने आप को तैयार करें.

 

अंतरास्ट्रीय सम्मलेन

दिनांक १ व् २ नवम्बर २०१४ को दिल्ली में रिलेटिव इकोनॉमिक्स का  ९ वां संमेलन आयोजित किया गया. इस अवसर पर आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा की अर्थशास्त्रियों को भी जीवन मूल्यों और जीवन दर्शन को अपनी योजनावों का आधार बनाना चाहिए. इसी अवसर पर पधारे विविध विषय विशेषज्ञों ने भी इस बात को माना की आज एक ऐसे आर्थिक ढांचे की जरुरत है जिसमे हम मानव जीवन  मूल्यों को आधार बना कर अपनी योजनाएं बनायें न की योजनाओं को बनाते समय  मानव मूल्यों को नजर अंदाज करें. इसी सम्मलेन में मैंने रिलेटिव इकोनॉमिक्स के लिए प्रस्तावित रिसर्च और डॉक्यूमेंटेशन सेंटर का प्रारूप प्रस्तुत किया. आज सभी शिक्षा विद यह मान रहें हैं की रिलेटिव इकोनॉमिक्स की जरुरत है और जैसे ही रिलेटिव इकोनॉमिक्स पर आधारित पाठ्य पुस्तकें उपलभ्ध होंगी, वे उन को लागू कर के युवाओं को एक नयी दिशा देने का प्रयास करेंगे.

योजना निर्माण की नयी प्रणाली

आज फिर से योजना आयोग के पुनर्गठन की बात हो रही है. प्रधान-मंत्री महोदय ने योजना आयोग की जगह पर एक नयी संस्था के गठन की बात कही है. अगर हम अंतरास्ट्रीय स्टार पर देखें तो पाते हैं की १९४५ में स्थापित संयुक्त राष्ट्र ने जीवन के विविध आयामों पर विविध नीति निर्मात्री संस्थाओं का गदहन किया है जैसे १९८८ में ipcc , १९६५ में UNDP  आदि. फिर भी संयुक्त राष्ट्र आज भी मानवीय मूल्यों को प्रोत्साहित करने वाली एक संस्था की कमी महसूस कर रहा है. इसी प्रक्रिया में २००६ में एक प्रस्ताव पारित कर मानव अधिकार कौंसिल स्थापित करने का फैसला लिया गया. भारत में भी आज समय की मांग यही है की योजगा बनाने वाली संस्था एक जीवन मूल्यों को आधार बना कर योजना बनाने वाली संस्था बने. हमें उम्मीद है की हमारे देश में इस प्रकार जीवन  मूल्य आधारित नियोजन की प्रक्रिया की शुरुआत हो जायेगी. यही रिलेटिव इकोनॉमिक्स का आधार है.

सरकार और लोगों के बीच की खाई

सरकार और लोगों के बीच  की खाई 

किसी भी समाज की हालत जांचने के लिए वहां के लोगों के साथ बात करिये - उनके ज्ञान,  आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान से आप समाज की स्थिति का अनुमान लगा सकते हैं. हमारे आस पास क्या हो रहा है? समाज में हर तबके के लोग मिल जुल कर एक दूसरे की मदद कर के विकास का मार्ग प्रशश्त करते हैं. आज सरकारें अनेक योजनाएं ले कर आ रही है - लेकिन पहले तो सरकारी अधिकारी ही उन योजनाओं को असफल बनाने में लगे हैं और फिर आम लोगों को वो योजनाएं समझ में भी नहीं आ रही है. नतीजा है की कुछ गिने चुने लोग ही उन योजनाओं का लाभ ले पा रहे हैं. आप लोगों से बात करते हैं तो वे पूछते हैं -" हमारे लिए सरकार ने क्या किया?"   क्या सैकड़ों सरकारी योजनाओं में उनके लिए भी कुछ है ? असल में सरकार और लोगों के बीच एक खाई है और ये खाई लगातार बढ़ती जा रही है. सरकार लोगों के लिए कुछ करना चाहती है लेकिन लोगों को हकीकत में कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है.

आज राजस्थान सरकार २५००० मेगावाट सौर ऊर्जा के उत्पादन के लक्ष्य के लिए काम कर रही है. क्या आम राजस्थानी इस योजना में भाग नहीं ले सकता है? अगर हर व्यक्ति इस योजना में भाग ले तो ये लक्ष्य बहुत जल्द हासिल हो सकता है. लेकिन क्या कोई ऐसे प्रयास हो रहे हैं जिनसे अधिक से अधिक लोग  इन योजनाओं का लाभ ले सके और इनमे भागिदार बन सके? (अधिकांश सरकारी योजनाएं आज भी अंग्रेजी में बहुत ही मुश्किल भाषा में है और उनके क्रियान्वयन  की जिम्मेदारी आम तोर पर ऐसे अधिकारियों के हाथ में है जो उन योजनाओं को जटिल बनाने के चक्रव्यूह को गढ़ने की कला में सिद्धहस्त हैं. 

अभी सरकारी योजनाओं की एक लिस्ट आप सभी देख रहे हैं: -
राजस्थान स्टार्टअप पालिसी
सोलर एनर्जी पालिसी
जन आवास योजना
सरकार आपके द्वार
टूरिज्म यूनिट पालिसी
स्किल लाइवलीहुड डेवलपमेंट योजना
पालनहार योजना
आपका जिला आपकी सरकार
जन स्वावलम्बन योजना
भामाशाह स्वास्थ्य  बीमा  योजना
अन्नपूर्णा भण्डार योजना
मुख्यमंत्री हमारी बेटी योजना
राजस्थान संपर्क योजना
भामाशाह योजना
राजश्री योजना
अन्नपूर्णा रसोई
न्याय आपके द्वार
इ-मित्र योजना
राजस्थान डिजिफेस्ट

इन योजनाओं को लाने के लिए सरकार बधाई की पात्र है लेकिन असल कार्य योजना लाना नहीं बल्कि योजना से जन-जन को लाभान्वित करना है. 
अन्नपूर्णा रसोई, इ-मित्र और भामाशाह को छोड़ कर अन्य योजनाओं से आमजन अनभिज्ञ है. जो व्यक्ति अंग्रेजी नहीं जानते, इंटरनेट नहीं जानते, सरकारी महकमों में जुते घिसना नहीं जानते - उन लोगों को भी इन योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए. सरकारी योजनाओं को आम लोगों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी सहयोगी राजनीतिक दलों की होती है - जिनको चाहिए की इन योजनाओं को आम लोगों की भाषा में अनुवाद कर के हर व्यक्ति को समझाएं और हर व्यक्ति को इन का लाभ पहुंचाएं. लेकिन ऐसा नहीं होता है. राजनीतिक संगठन सरकार के साथ कदम से कदम मिला कर काम करे तभी सरकार सफल हो सकती है - लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. विपक्षी दलों को भी सरकारी योजनाओं की कमियों को रेखांकित करने की अपनी भूमिका को अंजाम देना चाहिए - लेकिन वो भी ऐसा नहीं कर पा रहे हैं.

सरकारी योजनाओं की सफलता के लिए ये जरुरी है की इन योजनाओं की क्रियान्विति को बहुत ही बारीकी से जांचा जाए. ये सिर्फ अमुक सरकार की योजना नहीं है  -  ये आम लोगों की मेहनत की कमाई की गंगा है.  सरकारों  को भी पुनः चुन कर आने के लिए ये सुनिश्चित करना चाहिए की उनकी योजनाओं को हर व्यक्ति समझ रहा है और उनसे लाभान्वित हो रहा है.

अगर पिछले ८  सालों की सरकारी योजनाओं और नीतियों की सूचि बनायी जाए तो इस सूचि में करीब २०० योजनाएं और नीतियां शामिल होगी. लेकिन उनमे से कितनी हैं जो लोगों को याद है या जिनसे लोग लाभान्वित हुए हैं? चुनाव आते हैं तो योजनाओं  और नौकरियों जैसे लुभावने आकाश-कुसुमों  की बरात शुरू  हो जाती  है लेकिन नतीजा क्या निकलता है? अधिकाँश योजनाएं किसी वर्ग विशेष के लिए होती है या उसमे कई ऐसे नियम बना दिए जाते हैं की अधिकाँश लोग उन योजनाओं का लाभ ही नहीं ले सकें. स्किल डेवलपमेंट योजनाओं की बात करते हैं. अधिकाँश प्रशिक्षण संस्थान उन योजनाओं का लाभ ही नहीं ले पाते हैं क्योंकि उन योजनाओं की पात्रता के लिए १.५ करोड़ का सालाना टर्नओवर (सालाना बिक्री)  जरुरी है. 
सौर ऊर्जा की अधिकाँश योजनाएं आसानी से गरीबों की मदद कर सकती है लेकिन योजना बनाने वालों ने इस प्रकार से योजनाएं बनायीं हैं की उनका फायदा बहुत गिने चुने लोग ले पाएं. प्रतिस्पर्धा और स्किल डेवलपमेंट की कई योजनाएं सिर्फ एक वर्ग विशेष के लिए होती है - क्यों? क्या अन्य लोगों को उनकी जरूरत नहीं है? क्या सिर्फ एक वर्ग विशेष के लोग उनसे फायदा ले पाएंगे? नतीजा ये निकलता है की समाज की समरसता कम होती है. योजनाएं भी असफल हो जाती है. सिर्फ एक वर्ग विशेष के लोग अगर एक कक्षा में पढ़ाई करते हैं तो उनमे सहिष्णुता और अन्य लोगों के साथ सामंजस्य स्थापित करने की कला का विकास नहीं हो पाता है. होना तो ये चाहिए की सरकारी पैसे से चलने वाली हर योजना, हर शिक्षण संस्था, हर प्रशिक्षण संस्था का लाभ हर व्यक्ति को मिलना चाहिए - और किसी एक वर्ग विशेष के ही सारे विद्यार्थी तो हर हाल में नहीं होने चाहिए ताकि लोगों को मिल जुल कर पढ़ाई करने और मिल जुल कर अपने भविष्य की तैयारी करने का मौका मिले और इस प्रकार हर व्यक्ति अन्य वर्ग के लोगों को मदद देना शिक्षण संस्था से ही सीख जाए.  

तकनीक का बहुत अधिक इस्तेमाल लोगों को तोड़ता है और उनमे आपसी रिश्ते नहीं बनने देता. जैसे जैसे तकनीक हावी हो रही है लोगों का आपसी नाता कमजोर हो रहा है. माता-पिता, भाई-बहिन, गुरु-शिष्य आदि सभी रिश्ते कमजोर हो रहे हैं. तकनीक हमारी मदद के लिए है लेकिन तकनीक लोगों की एक दूसरे पर निर्भरता कम कर देती है और लोगों को एक दूसरे की मदद करने के मोके भी नहीं देती है. वर्तमान सरकारें तकनीक के अत्यधिक इस्तेमाल पर जोर दे रही है. अकुशल सरकारी विभागों से लोगों को मुक्ति दिलाने के लिए तो ये उपाय प्रशंशनीय हैं लेकिन अगर कर्मठ सरकारी कर्मचारियों को इन योजनाओं को लागू करने की जिम्मेदारी दी जाती तो शायद हर व्यक्ति तक ये योजनाएं पहुँच पाती. आज न तो सरकारी कर्मचारी और न आम जनता सरकार के साथ हैं. सरकारी कर्मचारी किसी तरह से अपनी "ड्यूटी" पूरी कर रहे हैं और आम लोगों को लगता है की उनकी कोई सुनता ही नहीं है.

एक उदाहरण से अपनी बात कहता हूँ: - आजादी से पहले शहर में सड़क के निर्माण कार्य में हर व्यक्ति की बड़ी रूचि होती थी. सड़कों के दोनों तरफ नालियां होती थी और पानी के निकासी के लिए समुचित व्यवस्था होती थी. अगर सड़क निर्माण के समय नाली नहीं बनायीं जाती तो मोहल्ले के लोग सड़क बनाने वाले से जिरह कर के नाली बनवा ही लेते थे. आज सड़कें तो बनवायी जाती है लेकिन उनके दोनों तरफ नाली नहीं बनवायी जाती - और बारिश होते ही सड़कों पर पानी इकठा हो जाता है. लोगों को लगता है की लोक निर्माण विभाग के इंजीनियर  सक्षम हैं - और इंजीनियर को सिर्फ कागजी "ड्यूटी" पूरी करके अपनी नौकरी बचाने की चिंता है. न लोगों की कोई सुनता है न प्रशाशन को कोई चिंता है - सरकारी योजनाओं का पैसा बह रहा है - लेकिन लोगों को फायदा नहीं मिल रहा है.

एक और उदाहरण देना चाहता हूँ. आज अनेक सरकारी शिक्षण संस्थाओं में शिक्षकों की कमी है. विद्यार्थी परेशान है क्योंकि गणित जैसे मुश्किल विषय पढ़ाने के लिए कोई शिक्षक नहीं है. आसान विषय तो विद्यार्थी स्वयं ही पढ़ लेते हैं. शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सरकार इग्नू और अन्य शिक्षण संस्थाओं की मदद से ऑनलाइन कक्षाएं संचालित करती है - लेकिन वे भी अक्सर ऐसे विषय पर होती है जो विद्यार्थी स्वयं ही पढ़ सकते हैं   - वो विषय नहीं रखे जाते जो विद्यार्थी को हर हाल में चाहिए. सरकारी शिक्षक अपनी जुगाड़ बिठा कर सरकार में कोई न कोई अधिकारी या इन्स्पेक्टर बन कर खुश हो जाते हैं और उनकी जगह पर कोई शिक्षक नहीं जा पाता है. अगर कोई ये पूछे की इन इंस्पेक्टर की ज्यादा जरुरत है या शिक्षकों की - तो उत्तर साफ़ है - शिक्षकों की - लेकिन सरकारी अधिकारियों को भी अपने लोगों की मदद करनी है और लोगों की कोई सुनता भी नहीं है. 

सरकार और लोगों के बीच की खाई

सरकार और लोगों के बीच  की खाई 

किसी भी समाज की हालत जांचने के लिए वहां के लोगों के साथ बात करिये - उनके ज्ञान,  आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान से आप समाज की स्थिति का अनुमान लगा सकते हैं. हमारे आस पास क्या हो रहा है? समाज में हर तबके के लोग मिल जुल कर एक दूसरे की मदद कर के विकास का मार्ग प्रशश्त करते हैं. आज सरकारें अनेक योजनाएं ले कर आ रही है - लेकिन पहले तो सरकारी अधिकारी ही उन योजनाओं को असफल बनाने में लगे हैं और फिर आम लोगों को वो योजनाएं समझ में भी नहीं आ रही है. नतीजा है की कुछ गिने चुने लोग ही उन योजनाओं का लाभ ले पा रहे हैं. आप लोगों से बात करते हैं तो वे पूछते हैं -" हमारे लिए सरकार ने क्या किया?"   क्या सैकड़ों सरकारी योजनाओं में उनके लिए भी कुछ है ? असल में सरकार और लोगों के बीच एक खाई है और ये खाई लगातार बढ़ती जा रही है. सरकार लोगों के लिए कुछ करना चाहती है लेकिन लोगों को हकीकत में कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है.

आज राजस्थान सरकार २५००० मेगावाट सौर ऊर्जा के उत्पादन के लक्ष्य के लिए काम कर रही है. क्या आम राजस्थानी इस योजना में भाग नहीं ले सकता है? अगर हर व्यक्ति इस योजना में भाग ले तो ये लक्ष्य बहुत जल्द हासिल हो सकता है. लेकिन क्या कोई ऐसे प्रयास हो रहे हैं जिनसे अधिक से अधिक लोग  इन योजनाओं का लाभ ले सके और इनमे भागिदार बन सके? (अधिकांश सरकारी योजनाएं आज भी अंग्रेजी में बहुत ही मुश्किल भाषा में है और उनके क्रियान्वयन  की जिम्मेदारी आम तोर पर ऐसे अधिकारियों के हाथ में है जो उन योजनाओं को जटिल बनाने के चक्रव्यूह को गढ़ने की कला में सिद्धहस्त हैं. 

अभी सरकारी योजनाओं की एक लिस्ट आप सभी देख रहे हैं: -
राजस्थान स्टार्टअप पालिसी
सोलर एनर्जी पालिसी
जन आवास योजना
सरकार आपके द्वार
टूरिज्म यूनिट पालिसी
स्किल लाइवलीहुड डेवलपमेंट योजना
पालनहार योजना
आपका जिला आपकी सरकार
जन स्वावलम्बन योजना
भामाशाह स्वास्थ्य  बीमा  योजना
अन्नपूर्णा भण्डार योजना
मुख्यमंत्री हमारी बेटी योजना
राजस्थान संपर्क योजना
भामाशाह योजना
राजश्री योजना
अन्नपूर्णा रसोई
न्याय आपके द्वार
इ-मित्र योजना
राजस्थान डिजिफेस्ट

इन योजनाओं को लाने के लिए सरकार बधाई की पात्र है लेकिन असल कार्य योजना लाना नहीं बल्कि योजना से जन-जन को लाभान्वित करना है. 
अन्नपूर्णा रसोई, इ-मित्र और भामाशाह को छोड़ कर अन्य योजनाओं से आमजन अनभिज्ञ है. जो व्यक्ति अंग्रेजी नहीं जानते, इंटरनेट नहीं जानते, सरकारी महकमों में जुते घिसना नहीं जानते - उन लोगों को भी इन योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए. सरकारी योजनाओं को आम लोगों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी सहयोगी राजनीतिक दलों की होती है - जिनको चाहिए की इन योजनाओं को आम लोगों की भाषा में अनुवाद कर के हर व्यक्ति को समझाएं और हर व्यक्ति को इन का लाभ पहुंचाएं. लेकिन ऐसा नहीं होता है. राजनीतिक संगठन सरकार के साथ कदम से कदम मिला कर काम करे तभी सरकार सफल हो सकती है - लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. विपक्षी दलों को भी सरकारी योजनाओं की कमियों को रेखांकित करने की अपनी भूमिका को अंजाम देना चाहिए - लेकिन वो भी ऐसा नहीं कर पा रहे हैं.

सरकारी योजनाओं की सफलता के लिए ये जरुरी है की इन योजनाओं की क्रियान्विति को बहुत ही बारीकी से जांचा जाए. ये सिर्फ अमुक सरकार की योजना नहीं है  -  ये आम लोगों की मेहनत की कमाई की गंगा है.  सरकारों  को भी पुनः चुन कर आने के लिए ये सुनिश्चित करना चाहिए की उनकी योजनाओं को हर व्यक्ति समझ रहा है और उनसे लाभान्वित हो रहा है.

अगर पिछले ८  सालों की सरकारी योजनाओं और नीतियों की सूचि बनायी जाए तो इस सूचि में करीब २०० योजनाएं और नीतियां शामिल होगी. लेकिन उनमे से कितनी हैं जो लोगों को याद है या जिनसे लोग लाभान्वित हुए हैं? चुनाव आते हैं तो योजनाओं  और नौकरियों जैसे लुभावने आकाश-कुसुमों  की बरात शुरू  हो जाती  है लेकिन नतीजा क्या निकलता है? अधिकाँश योजनाएं किसी वर्ग विशेष के लिए होती है या उसमे कई ऐसे नियम बना दिए जाते हैं की अधिकाँश लोग उन योजनाओं का लाभ ही नहीं ले सकें. स्किल डेवलपमेंट योजनाओं की बात करते हैं. अधिकाँश प्रशिक्षण संस्थान उन योजनाओं का लाभ ही नहीं ले पाते हैं क्योंकि उन योजनाओं की पात्रता के लिए १.५ करोड़ का सालाना टर्नओवर (सालाना बिक्री)  जरुरी है. 
सौर ऊर्जा की अधिकाँश योजनाएं आसानी से गरीबों की मदद कर सकती है लेकिन योजना बनाने वालों ने इस प्रकार से योजनाएं बनायीं हैं की उनका फायदा बहुत गिने चुने लोग ले पाएं. प्रतिस्पर्धा और स्किल डेवलपमेंट की कई योजनाएं सिर्फ एक वर्ग विशेष के लिए होती है - क्यों? क्या अन्य लोगों को उनकी जरूरत नहीं है? क्या सिर्फ एक वर्ग विशेष के लोग उनसे फायदा ले पाएंगे? नतीजा ये निकलता है की समाज की समरसता कम होती है. योजनाएं भी असफल हो जाती है. सिर्फ एक वर्ग विशेष के लोग अगर एक कक्षा में पढ़ाई करते हैं तो उनमे सहिष्णुता और अन्य लोगों के साथ सामंजस्य स्थापित करने की कला का विकास नहीं हो पाता है. होना तो ये चाहिए की सरकारी पैसे से चलने वाली हर योजना, हर शिक्षण संस्था, हर प्रशिक्षण संस्था का लाभ हर व्यक्ति को मिलना चाहिए - और किसी एक वर्ग विशेष के ही सारे विद्यार्थी तो हर हाल में नहीं होने चाहिए ताकि लोगों को मिल जुल कर पढ़ाई करने और मिल जुल कर अपने भविष्य की तैयारी करने का मौका मिले और इस प्रकार हर व्यक्ति अन्य वर्ग के लोगों को मदद देना शिक्षण संस्था से ही सीख जाए.  

तकनीक का बहुत अधिक इस्तेमाल लोगों को तोड़ता है और उनमे आपसी रिश्ते नहीं बनने देता. जैसे जैसे तकनीक हावी हो रही है लोगों का आपसी नाता कमजोर हो रहा है. माता-पिता, भाई-बहिन, गुरु-शिष्य आदि सभी रिश्ते कमजोर हो रहे हैं. तकनीक हमारी मदद के लिए है लेकिन तकनीक लोगों की एक दूसरे पर निर्भरता कम कर देती है और लोगों को एक दूसरे की मदद करने के मोके भी नहीं देती है. वर्तमान सरकारें तकनीक के अत्यधिक इस्तेमाल पर जोर दे रही है. अकुशल सरकारी विभागों से लोगों को मुक्ति दिलाने के लिए तो ये उपाय प्रशंशनीय हैं लेकिन अगर कर्मठ सरकारी कर्मचारियों को इन योजनाओं को लागू करने की जिम्मेदारी दी जाती तो शायद हर व्यक्ति तक ये योजनाएं पहुँच पाती. आज न तो सरकारी कर्मचारी और न आम जनता सरकार के साथ हैं. सरकारी कर्मचारी किसी तरह से अपनी "ड्यूटी" पूरी कर रहे हैं और आम लोगों को लगता है की उनकी कोई सुनता ही नहीं है.

एक उदाहरण से अपनी बात कहता हूँ: - आजादी से पहले शहर में सड़क के निर्माण कार्य में हर व्यक्ति की बड़ी रूचि होती थी. सड़कों के दोनों तरफ नालियां होती थी और पानी के निकासी के लिए समुचित व्यवस्था होती थी. अगर सड़क निर्माण के समय नाली नहीं बनायीं जाती तो मोहल्ले के लोग सड़क बनाने वाले से जिरह कर के नाली बनवा ही लेते थे. आज सड़कें तो बनवायी जाती है लेकिन उनके दोनों तरफ नाली नहीं बनवायी जाती - और बारिश होते ही सड़कों पर पानी इकठा हो जाता है. लोगों को लगता है की लोक निर्माण विभाग के इंजीनियर  सक्षम हैं - और इंजीनियर को सिर्फ कागजी "ड्यूटी" पूरी करके अपनी नौकरी बचाने की चिंता है. न लोगों की कोई सुनता है न प्रशाशन को कोई चिंता है - सरकारी योजनाओं का पैसा बह रहा है - लेकिन लोगों को फायदा नहीं मिल रहा है.

एक और उदाहरण देना चाहता हूँ. आज अनेक सरकारी शिक्षण संस्थाओं में शिक्षकों की कमी है. विद्यार्थी परेशान है क्योंकि गणित जैसे मुश्किल विषय पढ़ाने के लिए कोई शिक्षक नहीं है. आसान विषय तो विद्यार्थी स्वयं ही पढ़ लेते हैं. शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सरकार इग्नू और अन्य शिक्षण संस्थाओं की मदद से ऑनलाइन कक्षाएं संचालित करती है - लेकिन वे भी अक्सर ऐसे विषय पर होती है जो विद्यार्थी स्वयं ही पढ़ सकते हैं   - वो विषय नहीं रखे जाते जो विद्यार्थी को हर हाल में चाहिए. सरकारी शिक्षक अपनी जुगाड़ बिठा कर सरकार में कोई न कोई अधिकारी या इन्स्पेक्टर बन कर खुश हो जाते हैं और उनकी जगह पर कोई शिक्षक नहीं जा पाता है. अगर कोई ये पूछे की इन इंस्पेक्टर की ज्यादा जरुरत है या शिक्षकों की - तो उत्तर साफ़ है - शिक्षकों की - लेकिन सरकारी अधिकारियों को भी अपने लोगों की मदद करनी है और लोगों की कोई सुनता भी नहीं है. 

यु वा ये जमाना है तुम्हारा

यु वाः:  ये जमाना है तुम्हारा 

है जोश होश  जूनून जिसमे - उसको मैं क्या  नाम दूँ
है उम्मीद और यकीन फिर भी क्योंकर उसको काम दूँ 
जो एक उम्मीद है मुझे फिर भी मैं कैसे मान लूँ 
है मुझसे बेहतर लेकिन फिर भी कैसे स्वीकार लूँ 
जो रोकने से ना रुके - रुक जाए तो तूफ़ान हो 
जो कल्पना के पंख से सपनों में खोया खोया हो 
कैसे कैसे सवाल पूछे - उत्तर भी खुद ही ले आये 
हर उत्तर में फिर सवालों का जो झंझावात ले आये 
मनाने से जो न माने, डराने से तो न डरे 
तर्क की कसौटी पर जो हर बात को तोले
वक्त की आंधी से ज्यादा वक्त को भी जो बदल दे 
कल की तैयारी से कैसे आज के सूरज को देखूं 
जिसको समझने के लिए मुझ को भुलाना ही है खुद को 
तोड़ तो कल की वो राहें - भुला दो कल की कहानी 
छोड़ तो इतिहास की बातें - मिटा दो कल की वो बातें 
आज जो खुद हाथ से अपने बनाएगा जमाना 
स्वागत कर आह्लादित हो वो - विश्व का ये नव - निर्माता 



पूरी दुनिया पर आज संकट के बदल है  - अनेक परेशानियां है - लेकिन उस सबका समाधान सिर्फ युवा वर्ग ही निकाल सकते हैं क्योंकि उन सबका समाधान सिर्फ और सिर्फ नवाचार के द्वारा ही किया जा सकता है - और नवाचार आज के समय में सिर्फ युवा वर्ग ही कर सकता है. चाहे पर्यावरण संकट की बात करें, चाहे जल संकट की बात करें, या बढ़ते भ्रस्टाचार की बात करें - या बढ़ते दुराचार की बात करें. इन सभी समस्याओं का समाधान सिर्फ और सिर्फ युवाओं के जरिये ही किया जा सकता है. आज युवाओं को जोड़ने, सहभागी बनाने और भविष्य के निर्माता के रूप में स्थापित करने की जरुरत है. 

१२ अगस्त को संयुक्त राष्ट्र संगठन विश्व युवा दिवस के रूप में मनाता है. भारत में युवाओं की जनसंख्या सर्वाधिक है. युवाओं का आने वाले समय में अद्भुत योगदान होगा. युवा सृजनशील, नवाचारी, कर्मठ और जुझारू हैं. वे सपने भी देखते हैं - तो अद्भुत सक्रियता से सपनों को हासिल भी करते हैं. वे हर समस्या के समाधान तक पहुँचते हैं. आम तौर पर युवाओं को किसी भी तरह की संकीर्ण सोच या संकीर्ण मानसिकता से ऊपर पाएंगे. आप पाएंगे की आज के युवा बहुत सकारात्मक सोच ले कर बड़े हो रहे हैं. इन्हें ना तो मंजूर ही नहीं  हैं. इनके शब्दकोष में असम्भव शब्द नहीं है. ये जो ठानते हैं वो कर के दिखाते हैं. 

यहाँ में कुछ ऐसे युवाओं की कहानी आपके साथ साझा कर रहा हूँ जिनको मैंने कार्य करते हुए इन वर्षों में देखा है. एक युवा की सोच थी की थ्री डी प्रिंटर के इस्तेमाल से कृत्रिम दांत, कृत्रिम अंग बनाये जा सकते हैं. उसने प्रयोग किये, सफल हुआ और फिर अपना स्टार्टअप शुरू कर दिया. आज वो अपने जैसे अनेक युवाओं को रोजगार और जीवन की एक दिशा दिखा रहा है. एक युवा की माँ का कैंसर की बिमारी से असामयिक निधन हो गया. वो एक बार के लिए टूट गया. फिर उसने कैंसर के खिलाफ जंग शुरू कर दीं. आज वो घर घर आर्गेनिक शब्जियां लगवा रहा है. हर घर की छत पर वो एक बगीचा लगता है जिसमे इतनी सब्जियां हो जाती है जो पुरे परिवार के लिए पर्याप्त हो. ये सब्जियां पूरी तरह से आर्गेनिक खेती से उगाई जाती है - यानी न कोई केमिकल - न कोई हानिकारक कीटनाशक. वो शहर शहर में आर्गेनिक खेती को बढ़ावा दे रहा है. पिछले १ साल में १६ शहरों में अपनी शाखाएं शुरू कर चुका है. आगरा शहर में तो कई हेक्टेयर भूमि पर आर्गेनिक खेती करवा रहा है. एक अन्य युवा की बात करता हूँ उसको ये लगा की अनेक मरीज सिर्फ इस कारण परेशान हैं क्योंकि डॉक्टर के यहाँ पर उनको लाइन में लगना पड़ता है. उसने एक एप बनवाया जिसमे डॉक्टर और मरीज विडिओ कॉन्फ्रेंस के जरिये बात कर सकते हैं. मरीज जब चाहे डॉक्टर से सम्पर्क कर सकता है. डॉक्टर लेबोरटरी से उसकी रिपोर्ट मंगवा कर उस मरीज को सलाह दे सकता है. डॉक्टर दिल्ली में बैठा बैठा दूर किसी शहर या गांव के मरीज का इलाज कर सकता है. उसके इस एप ने अनेक डॉक्टरों को एक एक दिन में हजारों मरीजों की मदद करने की क्षमता प्रदान की है. अनेक मरीज आज उसके शुक्रगुजार हैं.  एक अन्य युवा की बात बताता हूँ - वो विदेशी सैलानियों को भारत की लुप्त हो रही संस्कृति से रूबरू करवाता है. वो गावों और दूर दराज के कस्बों में विदेशी सैलानियों को ले जाता है और उनको गावों के स्वाभाविक परिवेश में रहने और समझने का मौका देता है. उसकी कम्पनी का मकसद है लोगों को हमारी संस्कृति की जड़ों तक पहुंचाना और इसी लिए उसने अपनी कम्पनी का नाम रखा है "टू रूट्स".  एक अन्य युवा ने प्लेस्मेंट (नौकरी) में मदद प्रदान करने के लिए एक कम्पनी शुरू की है. वो कंपनियों को शिक्षण संस्थाओं में ले कर आता है. कंपनियों को बेहतरीन युवा अधिकारी उपलभ्ध करवाता है तो शिक्षण संस्थाओं को प्लेस्मेंट में मदद करता है. ऐसे अनेक युवाओं की कानियाना आज मेरे जहाँ में है जो मैं आपसे बांटना चाहता हूँ. लेकिन मेरा मकसद कहानी सुनाना नहीं बल्कि युवाओं की विशेषताओं को रेखांकित करना है. 


आज के युवा अपनी पिछली पीढ़ी से कुछ अलग हैं. इस पीढ़ी ने सुख, समृद्धि, और आशावादिता का अद्भुत समय देखा है. इस पीढ़ी ने परम्पराओं और रूढ़ियों की जगह पर परिवर्तन और विकास की गाथाएं देखि हैं. इस पीढ़ी को जिद कर के कुछ नया करना अच्छा लगता है. इस पीढ़ी को तकनीक से बहुत प्यार है तो इस पीढ़ी को तकनीक के इस्तेमाल से लोगों का भला करना भी आता है. जरुरत है इस पीढ़ी को समझ कर इसको सही तरह से मदद प्रदान करने की. 

ये वो पीढ़ी है जिसको आदेश से नहीं - जूनून से प्रेरित किया जा सकता है. अगर आप ये सोचते हैं की इस पीढ़ी को निर्देशित कर के आप अपने लक्ष्य हासिल कर लेंगे - तो आप गलत हैं. लेकिन अगर आप इस पीढ़ी को किसी जूनून से जोड़ कर सही दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर सकें तो ये पीढ़ी अद्भुत परिणाम दिखाएगी. इस पीढ़ी के साथ काम करने वाली हर सख्शियत और  हर व्यक्ति की  अभिप्रेरणा और नेतृत्व क्षमता की परीक्षा होगी. ये वो पीढ़ी है जो डर कर नहीं बल्कि तर्क और उद्देश्य से ही प्रेरित हो कर काम करती है. 

अभिभवकों और शिक्षकों का कर्तव्य: 

आज के समय में ये जरुरी है की हम युवाओं को बेहतरीन लक्ष्य के लिए प्रेरित करें. आज के युवाओं को देश के श्रेष्ठ सामाजिक कार्यकर्ताओं और सृजनशील युवाओं के साथ मिला कर प्रेरित करने की जरुरत है. आज के युवाओं के सामने कोई भी महान आदर्श प्रस्तुत करो - वो तब तक विश्वास नहीं करेंगे जब तक आँखों से नहीं देख लेंगे - अतः इतिहास की नहीं वर्तमान की बात करो. सौभाग्य से हमारे देश में अनेक महान व्यक्ति हर काल में मौजूद रहते हैं. आज भी अनेक महान लोग लगभग हर शहर में मौजूद है. उन लोगों ने जिन्होंने जीवन मूल्यों को संजोने और श्रेष्ठ लाखों के लिए कार्य करने में अपनी जिंदगी बितादि -उनको युवाओं के साथ में रूबरू करवाइये - इससे युवाओं को जीवंत आदर्श मिलेंगे और वे भी अद्भुत लक्ष्यों के लिए कार्य शुरू कर्नेगे. आज के युवा कल के सामाजिक उद्यमी बन जाएंगे अगर हम उन को आज सामाजिक उद्यमियों से मिलवाएंगे और सकारात्मक प्रेरणा से उनको प्रेरित करेंगे. 

स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया से जोड़ने की जरुरत
आज देश में युवाओं को ध्यान में रख कर अनेक योजनाएं शुरू की गयी हैं. इन योजनाओं का लाभ गिने चुने युवा ही ले पा रहे हैं. अनेक युवाओं को इनकी जानकारी नहीं है या उनको नहीं पता की इन योजनाओं का लाभ वो कैसे लेवें. आज जरुरत है की युवाओं को इन योजनाओं के बारे में बताएं और प्रशिक्षित करें ताकि वे भी इन योजनाओं का लाभ ले सकें. हर विद्यालय - महाविद्यालय को युवाओं को इन योजनाओं से अवगत करवाना चाहिए और इन योजनाओं में भाग लेने में मदद करनी चाहिए. 

शारीरिक श्रम और खेल से जोड़ने की जरुरत
मोबाइल ने युवाओं को खेल कूद की दुनिया से अलग कर दिया है. वो दिन रात मोबाइल में खोये रहते हैं. ये हमारी भी गलती है. हमें युवाओं को शारीरिक श्रम से जोड़ना है और ऐसे खेलों से जोड़ना है जिसमे शारीरिक श्रम हो - जैसे फ़ुटबाल, बालीबाल, दौड़, कबड्डी, खो खो आदि. युवाओं को फिर से श्रम से जोड़ने के लिए पहल हमें ही करनी होगी. हर मोहल्ले से खेल और श्रम के लिए प्रतियोगिताएं आयोजित करनी पड़ेगी. 

विविधता की संस्कृति से जोड़ना
आज के युवा वर्ग को विविधता की संस्कृति से जोड़ने के लिए भारत भ्रमण पर ले जाने की जरुरत है. हर शिक्षण संस्थान को चाहिए की ऐसे आयोजन हो जिसमे विद्यार्थियों को भारत की विविधता से लगाव हो और सीखने और जुड़ने का मौका मिले. सावधान रहें  - कुछ विदेशी ताकते हारे युवाओं को भर्मित कर रही है और उनको सिर्फ विदेश आने के लिए प्रेरित कर रही है - और युवा भ्रमित भी जल्दी हो जाते हैं. अगर कोई भी युवा आपको कहते मिले "भारत में क्या रखा है - मैं तो फलां देश जाऊंगा " तो तैयार हो जाएँ - ये आपकी परीक्षा की घडी है - युवाओं को देश और संस्कृति से जोड़ना आप - हम सबका कर्तव्य है.