Wednesday, February 11, 2015

कैसे मिले थार के उद्योगों को एक नयी पहचान





थार मरुस्थल का प्रदेश कई मुश्किलों का प्रदेश है जैसे की गर्मी में यहाँ ज्यादा गर्मी और सर्दी में यहाँ ज्यादा ठण्ड पड़ती है. लेकिन कुछ मामलों में यहाँ की आबो हवा ही यहाँ के लिए वरदान  है. यहाँ का शुष्क वायुमंडल खाद्य उद्योग, लकड़ी पर आधारीत उद्योग, सिरेमिकस उद्योग आदि के लिए काफी लाभप्रद है. इस हेतु इस क्षेत्र में समुचित व्यवस्था होनी चाहिए.   इस हेतु इन उद्योगों को एक क्लस्टर के रूप में विकसित किया जाना चाहिए.जब माइक्रो स्माल और मध्यम इंटरप्राइजेज विभाग की वेबसाइट देखते हैं तो बीकानेर का नाम दो इंडस्ट्रियल क्लस्टर के लिए आता है - एक है पापड़ व् नमकीन का और दूसरा है प्लास्टर ऑफ़ पेरिस का. इन उद्योगों के क्लस्टर के रूप में विकास करने की प्रचुर संभावनाएं हैं अगर सरकार इस हेतु कुछ सार्थक पहल करे.  इन उद्योगों के लिए आवश्यक रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर व् मार्केटिंग सेंटर भी सरकार को स्थापित करना चाहिए ताकि छोटे उद्यमी भी इसका फायदा उठा सकें. इन उद्योगों में अंतरास्ट्रीय बाजार में बहुत संभावनाएं हैं. इस हेतु यह जरुरी है की यहाँ के उद्यमियों को क्वालिटी मैनेजमेंट का प्रशिक्षण दिया जाए. सरकार की एक योजना है की जो भी उद्यमी क्वालिटी मैनेजमेंट लागू करता है उसको ७५०००  या ७५% तक की सहायता दी जाती है. इस योजना के प्रभावी ढंग से लागू करने के  लिए यहाँ के उद्योग संगठन को साथ में जोड़ने की जरुरत है. यहाँ बनने वाले उत्पाद अगर अंतररस्तरीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर पाएंगे और इंटरनेट के जरिये ब्रांडिंग और मार्केटिंग कर पाएंगे तो यहाँ के लोगों को प्रचुर रोजगार संभावनाएं मिल जाएंगी. 

उद्योग तभी विकास कर पाएंगे जब इस हेतु उनको आवश्यक कच्चा माल, ईंधन, श्रमिक और बाजार उपलभ्द होंगे. कई मामलों में सरकारी सहयोग जरुरी है. जैसे की सिरॅमिक्स उद्योग तभी प्रगति कर सकता है जब सरकार इस उद्योग हेतु गैस की पाइप लाइन तैयार करे ताकि इस उद्योग को सस्ता ईंधन मिल सके. खाद्य उद्योग तभी विकसित हो सकता है जब यहाँ अंतरास्ट्रीय स्तर की लेबोरेटरी और पैकेजिंग रिसर्च सेंटर हो. ये सब सुविद्याएँ सरकारी सहयोग से ही हो पाएगी. 

मरुस्थल में कार्य करने वाले प्रशिक्षत लोगों की भी कमी रहती है. दूर दराज से लोग यहाँ आ कर काम करना नहीं चाहते. यहाँ के लोगों को आवश्यक प्रशिक्षण की जरुरत है ताकि वे प्रशिक्षित हो कर यहाँ की जरुरत के अनुसार उद्योग शुरू कर सकें और यहाँ के उद्योगों में काम कर सकें. यहाँ ऐसे तकनीकी प्रशिक्षण संस्थाओं की जरुरत है जो यहाँ के लोगों को यहाँ के क्षेत्र की जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षित कर सकें और उनको उद्योगों के साथ जोड़ सके. 


सारांश में मैं निम्न सुझाव प्रस्तुत करना चाहता हूँ : - 

१. मरुस्थल के क्षत्र में सरकार का उद्योग विभाग (जिला उद्योग केंद्र) इतना सक्षम हो की वो सभी सरकारी योजनावों (जैसे की क्वालिटी मैनेजमेंट की योजना ) को उद्यमियों को प्रदान कर सके. इस क्षेत्र में अंतररस्तरीय स्तर पर ब्रांडिंग और मार्केटिंग की प्रचुर सम्भावना है. इस हेतु सहयोग जरुरी है. 
२. इस क्षेत्र में ऐसी संस्थाओं की जरुरत है जो युवाओं को खाद्य उद्योग, सिरॅमिक्स उद्योग, और यहाँ के अन्य उद्योगों के लिए तैयार करे. ये संस्थाएं अगर उद्योगों के साथ मिल कर काम करे तो बेहतर होगा. 

शिक्षा में सुधार के लिए मेरे कुछ अनुरोध




बजट आने वाला है और सरकार अपना पिटारा खोलने वाली है. बजट में शिक्षा पर राशि बढ़ाने के लिए सभी लोग जोर दे रहे हैं. कुछ लोग कह रहे हैं की उच्च शिक्षा और शोध पर ज्यादा राशि होनी चाहिए तो कुछ प्राथमिक शिक्षा पर ज्यादा राशि के लिए आवाज उठा रहे हैं. मैं यह महसूस करता हूँ की आज हमारी समस्या यह नहीं है की हम उच्च शिक्षा कैसे प्रदान करें, आज यह समस्या है की पढ़े लिखे लोगों को रोजगार कैसे देवें. अधिकाँश सर्वेक्षण यह दावा करते हैं की पढ़े लिखे अधिकाँश विद्यार्थी ऐसे हैं जिनको रोजगार नहीं दिया जा सकता है, यानी की वे रोजगार देने के लायक ही नहीं है. ऐसा सिर्फ एक या दो नहीं अधिकाँश सर्वेक्षणों का कहना है और वह भी आंकड़ों के आधार पर. यह सभी जानते हैं की उच्च शिक्षा और शोध के श्रेष्ठतम संस्थाओं का फायदा भारत को कम बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को ज्यादा मिलता है (क्योंकि  आईआईटी और इसकी समकक्ष संस्थाओं से पढ़ कर निकलने वाले अधिकाँश विद्यार्थी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए ही तयारी करते हैं और वहीँ पर नौकरी करना चाहते हैं). प्रश्न है की हम सच्चे अर्थ में भारत की भलाई के लिए कब सोचेंगे और कब सच्ची सच्ची बात कहेंगे. प्रश्न है की कब तक हम झूठ और भ्रम जाल के बीच अपने लोगों को बरगलाते रहेंगे. कब तक हम आम भारतीय की पीड़ा को नजरअंदाज करेंगे. मैं आज इस मुद्दे पर आप सबसे खुल कर अपनी बात कहने के लिए अनुरोध करता हूँ क्योंकि इस देश का बजट आप सबका बजट है और जिस प्रकार से बजट में बंटवारा होगा, वाही तय करेगा आप और इस देश का भविष्य. आज इस देश पर किसी विदेशी सरकार का शासन नहीं है, पर सच्चे अर्थ मैं आजादी तो तभी आएगी जब आप हम और हम जैसे सभी आम आदमी सच्चाई को खुल कर कह पाएंगे और अपने देश के विकास की दिशा को बदल पाएंगे. 

भारत जैसे विकासशील देशों में व्यावसायिक, औद्योगिक और हुनर आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने की जरुरत है. इससे न केवल बेरोजगारी घटेगी बल्कि विद्यार्थियों का असली विकास शुरू होगा. वाही व्यक्ति आगे तरक्की करता है जो शारीरिक शर्म करता है और श्रम आधारित तकनीक को अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करता है. वर्तमान में इस प्रकार की शिक्षा को आखिरी विकल्प के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि ऐसा माना जा रहा है की जो भी व्यक्ति पढ़ाई में कमजोर होगा वाही व्यक्ति व्यावसायिक शिक्षा की तरफ बढ़ेगा. व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा देने में कई अड़चने हैं. आज व्यावसायिक शिक्षा के बाद यूनिवर्सिटी की पढाई, आईएएस की परीक्षा और इसतरह के अन्य प्रतियोगी विकल्पों के लिए रास्ते बंद हो जाते हैं. एक आईटीआई डिप्लोमा व्यक्ति जिसके पास शानदार व्यावसायिक शिक्षा है वह कभी भी भारतीय इंजीनियरिंग सेवा की परीक्षा नहीं दे सकता. ऐसा क्यों है? इस हेतु हमें हमारे देश के नीति निर्माताओं से अनुरोध करना है. 

जिस जिस देश में वाकई तरक्की हो रही है और लोगों को बेहतरीन रोजगार मिलरहे हैं वे वहीँ हैं जहाँ पर व्यावसायिक शिक्षा को प्रोत्साहन है और व्यावसायिक शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा में आने के विकल्प खुले हैं. जहाँ जहाँ भी व्यावसायिक शिक्षा के बाद प्राप्त अनुभव को प्राथमिकता दी गयी है वहां वहां पर इसके शानदार परिणाम आये हैं. आप जापान, फिनलैंड और ऐसे अनेक देश देख सकते हैं जहाँ पर व्यावसायिक शिक्षा को वाकई में प्राथमिकता दी जा रही है. 

देश में उधोग धंधों और व्यवसायों में काम करने वाले अधिकांश लोग वे हैं जो आईटीआई और इस तरह के व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थाओं से प्रशिक्षित हुए हैं. इन प्रशिक्षित लोगों को पर्याप्त तबज्जु देने की जरुरत है और गरीब से गरीब व्यक्ति को उस शिक्षा से जोड़ने की जरुरत है जो उसको एक हुनर से जोड़ सके और देश को एक कर्मठ और ईमानदार कारकर्ता दे सके. इस हेतु प्रयास तभी हो पाएंगे जब हम वाकई में व्यावसायिक शिक्षा के लिए आवाज उढायेंगे और देश के शिक्षा सम्बन्धी कानूनों को बदलने के लिए आवाज उढायेंगे. लेकिन आज ऐसा नहीं हैं. आज हम देखते हैं की व्यावसायिक शिक्षा की जगह पर उच्च शिक्षा और शोध के लिए तो बात करने वाले बहुत हैं परन्तु व्यावसायिक और हुनर आधारित शिक्षा की वकालात करने वाले कोई नहीं हैं. काश आप जैसे लोग अपनी चुप्पी तोड़ दें तो हम सब मिलकर आम आदमी की आवाज को एक मजबूती प्रदान कर सकते हैं. कब तक सरकार आम भारतीय को नजरअंदाज कर सकती है? . 

 . 

बच्चों को सिखाइये संवाद कला



आज हर घर, हर दफ्तर, हर संगठन की एक ही समस्या है वह है संवाद की. जैसे जैसे विकास हो रहा है, हम इस समस्या को और ज्यादा से महसूस कर पा रहे हैं. संवाद की कमी के कारण घर टूट रहे हैं, दफ्तर बंद हो जाते हैं, संगठन राजनीति का अखाड़ा बन जाते हैं और स्वर्ग सा हमारा आशिया नरक में बदल जाता है. हर समस्या का एक ही समाधान है संवाद कला पर जोर देना. 

डॉक्टर मरीज से प्रेम से बात कर ले तो उसका क्या बिगड़े, इंजीनयर अगर अपने मातहत को प्रेम से समझा दे तो क्या बिगड़े, पति यदि पत्नी को अच्छे खाने के लिए धन्यवाद दे दे तो उसका क्या बिगड़े? पर समस्या सिर्फ इतनी ही नहीं है. हर व्यक्ति आज कुंठित, व्यथित, उग्र, और आपे से बाहर है. जो कहना है वह नहीं कहता है, जो नहीं कहना वह सब कहता है. विद्यार्थी अपने अध्यापक से बात नहीं करता, बच्चे माँ बाप से बात नहीं करते, कर्मचारी अपने मालिक से बात नहीं करते. हर जगह पर एक दीवार सी है जो नजर भी नहीं आती. इंसान अपना पूरा जीवन भी संवाद कला को सीखने में लगा तो तो भी काम है. फिर आज के जमाने में संवाद सिखाने वाले कोई है ही नहीं. आप कहेंगे की हर दूसरे कोने पर एक दूकान खुली है जो कम्युनिकेशन ट्रेनिंग देती है. आप कहेंगे की हर स्कुल और कॉलेज संवाद कला का प्रशिक्षण देती है. आप कहेंगे हर फिल्म संवाद कला का प्रशिक्षण देती है. बस यही तो कमी है. ये सभी संस्थाएं वो सीखा रहे हैं जो संवाद कला नहीं बल्कि सिर्फ एक मनोरंजन मात्र है. संवाद कला को सिखाने के लिए व्याख्यान नहीं एक माहोल की जरुआत है, इसके लिखे  जीवंत प्रशिक्षण की जरुरत है. इसके लिए पास बैठ कर धीरे से समझाने वाले और बड़े इत्मीनान से सुनने वाले चाहिए - कहाँ है वो प्रशिक्षक ? 

आज आपको पता चलेगा की पुराने जमाने के दादा दादी और चाचा चाची की कोई विकल्प नहीं है. जितने इत्मीनान से वे संवाद कला सीखते थे उतने इत्मीनान से संवाद कला सिखाने वाला किसी भी कम्युनिकेशन ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट में नहीं मिलता. 

उत्तर साफ़ है - चाहे आप स्कुल, कॉलेज, पॉलिटेक्निक, मेडिकल कॉलेज या यूनिवर्सिटी कुछ भी पढ़ाई करें संवाद कला में प्रशिक्षण ही आपको जीवन में असली सफलता और असली ख़ुशी का मौका दे सकता है. अतः हर पढ़ाई के साथ संवाद कला का प्रशिक्षण जरुरी है. और संवाद कला से मेरा मतलब अंग्रेजी प्रशिक्षण से नहीं बल्कि इंसानी रिश्तो में मजबूती  लाने के लिए भाषा रूपी सशक्त माध्यम के द्वारा जीवन में एक नया सवेरा लाने से है. यह कला ही हर डॉक्टर को बेहतर डॉक्टर, हर इंजीनियर को बेहतर इंजीनियर और हर इंसान को सफल इंसान बना सकती है. आईये हम सब मिल कर हर स्टार पर संवाद कला को बढ़ावा देने के लिए प्रयास करें. 

बच्चों को प्रतिस्पर्धा से दूर रखिये




दुनिया की भेड़चाल  : - 
आज सारी दुनिया बच्चों को प्रतिस्पर्धा की तरफ बढ़ा रही है. आज हर माता पिता अपने बच्चों को अधिक से अधिक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार कर रहे हैं लेकिन मैं यहाँ आप को इस तरफ न जाने के लिए अनुरोध कर रहा हूँ. मैं शायद पूरी दुनिया का विरोध कर रहा हूँ लेकिन सच यही है की अगर हमें अपने बच्चों को श्रेष्ठ व्यक्ति बनाना है तो उनको प्रतिस्पर्धा से दूर रखना होगा. प्रतिस्पर्धा बच्चों में कुंठा, द्वेष, और वैमनस्य पैदा कर देती है. एक विद्यार्थी जीतता है लेकिन बाकी सभी विद्यार्थी हार की भावना से ग्रस्त हो जाते हैं. प्रतिस्पर्धा के स्थान पर आपसी सहयोग, समर्पण, और मेलजोल को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. यही विद्यार्थी आगे चल कर प्रतिस्पर्धी विद्यार्थियों से ज्यादा अच्छा कार्य करेंगे. 

फर्स्ट आने के लिए नहीं बल्कि ज्ञान और विकास के लिए हो अध्ययन 
आज हर विद्यार्थी को टॉप करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है और टॉप करने के लिए ही उसको पढ़ाई करनी होती है. इसका परिणाम यह है की हर विद्यार्थी एकाकी हो रहा है और उसे अन्य विद्यार्थियों से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाता. वह स्वयं भी अन्य विद्यार्थियों को प्रतियोगी मान कर उनका ज्यादा सहयोग नहीं करना चाहता है. आज इस मानसिकता के कारण विद्यार्थी के विकास का एक बेहतरीन मौका चला जाता है. जब विद्यार्थी बड़ा होता है तो यह पाता है की वह क्यों छोटे छोटे से मुद्दों पर अपने साथियों से कटा रहा और उसको एक भी अच्छा दोस्त नजर नहीं आता है. जरुरी है की हम इस को बदलें और एक ऐसी व्यवस्था स्थापित करें जहां पर ज्ञान और विकास के लिए विद्यार्थी मिल कर सम्मिलित प्रयास करें. अध्ययन की प्रक्रिया में अध्यापक से भी ज्यादा जरुरी है विद्यार्थियों का आपसी तालमेल और एक दूसरे को सिखाने और बताने की प्रवृति. 


कोई स्कुल नहीं कर रही शुरुआत : - 
आज हर स्कुल प्रतिस्पर्धा पर आधारित व्यवस्था को ही श्रेष्ठ मान रही है और कोई भी स्कुल नयी शुरुआत नहीं कर रही है. इस हेतु तुरंत प्रयास करने की जरुरत है ताकि हम एक बेहतर कल का निर्माण कर सकें. 

Monday, January 26, 2015

NAMO REPUBLIC

नमो गणतंत्र 

(गणतंत्र दिवस विशेष )
कहीं इतिहास के पन्नों पर न खो जाए
की किसी रोज मेरे देश में भी लोग हँसते गाते थे. 
कहीं किसी और को पता न चल जाए 
मेरे देश में ऐसे भी बच्चे  है भूखे पेट
कहीं  शर्म न आ जाए ये देख कर
हुनर के बिना ही रही १८ साल की पढ़ाई . 
आज भी जिन्दा है सपने आजाद और बिस्मिल के  
क्योंकि आप भी तो वाही चाहते हैं. 
कहाँ गया देश का पैसा, विकास के रस्ते पर क्यों है  फाटक , 
जब लोग  आवाज उढ़ायेंगे, क्या तभी  बदलेंगे  बजट  

विकास के आंकड़ों का मोहताज नहीं ये देश 

देश का त्योंहार आ गया. एक बार फिर वक्त आ गया है की हम देश की किस्मत और देश के कर्णधारों की तरफ देखें और इस देश की तरक्की से भी ज्यादा अहम सवाल उड़ाएं. आज हर व्यक्ति को विकास दर और प्रगति के आंकड़े भ्रम में दाल रहे हैं. प्रश्न है की विकास के मायने क्या हैं. वह विकास किस काम का जिसका परिणाम एक तरफ गगनचुम्बी इमारते हैं और दूसरी तरफ भूखे लोग हैं. विकास की परिभाषा अगर सिर्फ औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने से है तो ऐसी परिभाषा का तिरस्कार कीजिये क्योंकि आप उस देश से हैं जहाँ पर मानवीय मूल्यों को भौतिक विकास के इन आंकड़ों से ऊपर रखना आज नहीं हजारों वर्हों से सिखाया जाता रहा है. आप उस देश की परम्परों से जुड़े हैं जहाँ पर मानवीय मूल्यों के लिए राम के छोटे भाई भारत ने राजसिंहासन ढुकरा दिया, जहाँ पन्ना धा ने अपने पुत्र को भी देश के लिए अर्पित कर दिया, जहाँ महर्षि दधीचि ने अपने जीवन को भी स्वेच्छा से त्याग दिया. तो फिर इन विकास की गाथाओं और शेयर बाजार की उछाल का क्या मायने. 

किधर जा रहा है हमारा पैसा ? 
पिछले वर्ष ४००० करोड़ रूपये  गरीब लोगों के लिए आवासीय कालोनी बनाने के लिए रखा गया. क्या हुआ उनका? अगर लोक-कल्याणकारी सरकार और लोक-कल्याणकारी संगठन एक साथ काम करें तो क्या यह असंभव है की हम हमारे देश के करोड़ों लोगों को बिना छत के देखें. पिछले वर्ष ७०६० करोड़ रूपये १०० स्मार्ट शहर बनाने के लिए तय किये गए, क्या हुआ उन स्मार्ट शहरों का? पिछले वर्ष यह घोषणा की गयी थी की १०००० करोड़ रुपयों से एक स्टार्ट-अप फण्ड बनाया जाएगा जिससे नए उद्यमियों को मदद दी जायेगी ताकि वे अपना स्वरोजगार शुरू कर सकें. क्या हुआ उसका?  पिछले बजट में एक नए टीवी चैनल कृषि चैनल की घोषणा की गयी थी जिसको गाव गाव दिखा कर किसान भाईओं की मदद की जानी थी. क्या हुआ उसका. पिछले बजट में सरकार ने कहा था की ऍफ़ सी आई का सुधार करेंगे और फसल के रख रखाव के लिए बड़े पैमाने पर गोदाम (वेयरहाउस) बनाये जाएंगे ताकि किसानों को मदद मिले. क्या हुआ? सरकार ने कहा था की एक्सपेंडिचर मैनेजमेंट कमीशन (सरकारी खर्च की जांच करने वाला आयोग) स्थापित किया जायेगे, क्या हुआ? केंद्रीय सकरार एक  इ-गवर्नेंस का पोर्टल इ-बिज शुरू करने वाली थी जिससे सभी व्यक्तियों के सरकारी महकमों के चक्कर ख़त्म हो जाएंगे (ऐसा कहा गया था) और (शायद ऐसा होता तो भ्रस्टाचार भी कम होता). क्या हुआ? बेटी बचाओ आंदोलन, शिक्षक प्रशिक्षण के लिए प्रावधान, गाव गाव के बच्चों को क्लिक (एक ऑनलाइन शिक्षा का चैनल) के जरिये श्रेष्ठ शिक्षा की बात भी सुनी थी. सरकार ने डॉक्टरों की कमी को दूर करने के लिए 16 नए मेडिकल कॉलेज खोलने का आश्वासन दिया था (जिसमे से ४ तो आल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस ही होने थे). टैक्स की दर कम करने की बात काफी समय से सुन रहा हूँ. पिछले बजट में वित्त मंत्री ने कहा था की टैक्स की सभी व्यवस्थाओं का खत्म कर के एक सरल सा गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स शुरू किया जाएगा और एक उम्मीद बानी थी की टैक्स का सरलीकरण हो जाएगा. स्किल  डेवलपमेंट के लिए बड़ी बड़ी योजनाएं सुनी थी. क्या हुआ. मैं ऐसे लिखता ही चला जाऊँगा तो अच्छा नहीं होगा. प्रश्न है की आप भी अपनी आवाज उठाईए. 

कौन ले जाएगा मेरी चिठियां वित्त मंत्री के नाम 
कुछ दिन पहले सभी आईटी कंपनिया वित्त मंत्री से मिली और बजट में डेटा सेंटर शुरू करने के लिए फायदे देने के लिए अनुरोध किया. आज जिस बहुराष्ट्रीय कम्पनी को देखो वो वित्त मंत्री को ज्ञापन दे रही है. जितनी भी बड़ी कम्पनियाँ है वे अपने हितों के लिए अपने ज्ञापन दे रहे हैं. आम आदमी के हितों के लिए कौनज्ञापन दे रहा है? देश में आज भी ऐसे गाव हैं जहा स्कुल नहीं लगते, स्कुल हैं तो ऐसे जिसमे  भवन जैसा कुछ भी नहीं. व्यावसायिक शिक्षा लेने वाले व्यक्तियों को आगे प्रतियोगी परीक्षा में बैठने से वंचित किया गया है (एक तरफ सरकार कहती है की व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा दिया जाएगा). अगर किसी भी विकसित देश का इतिहास देखेंगे तो पाएंगे की वहां पर व्यावसायिक शिक्षा को तबज्जु दी गयी है और तभी स्वरोजगार को बढ़ावा मिला है. हमारे देश की सरकार क्या करेगी, और कब करेगी? 

किसी विकसित देश के राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए लगने वाले हजारों कैमरों की बात करने से ज्यादा जरुरी है की हम बात करें की आने वाले बजट में आम भारतीय की भलाई के लिए वित्त मंत्री से खरी खरी बात करने वाला कौन है?  पडोसी देश पाकिस्तान और जापान की तुलना कीजिये. पाकिस्तान ने एक तिहाई बजट हथियारों पर खर्च कर दिया, और जापान ने एक तिहाई बजट बच्चों, उनकी पढ़ाई, उनकी व्यावसायिक और औद्योगिक शिक्षा पर खर्चा किया और पिछले ५० वर्षों का परिणाम आप के सामने हैं. आप बजट को कैसे खर्च करते हैं वह तय करता है की आप देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं. हमारे देश में बजट में बाल स्वास्थ्य पर .५%, बाल शिक्षा पर ३%, बाल सुरक्षा पर .०३%, बाल विकास पर .८% प्रावधान होता है. आप इस की तुलना अन्य मदों से करिये. आप अपने भविस्य के लिए क्या कर रहे हैं आप स्वयं समझ जाएंगे. आज भी अनेक बालक कुपोषण, स्वास्थ्य सेवा के अभाव और ऐसे ही अन्य कारणों से .... (आप समझ सकते हैं की मैं क्या लिखना चाहता हूँ).   पिछले बजट में घोषणा के बावजूद भी आज भी अनेक ऐसे विद्यालय हैं जहाँ पर छात्राओं के लिए शौचालय नहीं है. आप किस विकास की बात कर रहे हैं? 

दुनिया में ऐसे कई देश हैं जहाँ सरकारों ने आवश्यकता पड़ने पर देश के हिट में सकल राष्ट्रीय आज से भी ज्यादा ऋण लिया है. हम भी सरकार का स्वागत करेंगे अगर जरुरत पड़ती है तो सरकार जितना चाहे ऋण ले और हर व्यक्ति सरकारी प्रयास में मदद करेगा परन्तु प्रश्न है की सरकार कब मानेगी की छात्राओं के लिए शौचालय पंचवर्षीय योजना नहीं बल्कि एक महीने की योजना से बनना चाहिए, गरीबों के लिए आवासीय योजनाएं कागजी नहीं बल्कि हकीकत में होनी चाहिए, और बाल स्वास्थ्य के लिए अस्पतालों और तकनीक का प्रसारण युद्ध स्तर पर होना चाहिए. सरकारी प्राथमिकताओं की दिशा बदलने के लिए आप को ही आवाज उठानी पड़ेगी क्योंकि अब विपक्ष तो मोन ले कर बैठा है. . 

lets challenge the status quo and create renaissance

बगावत करिये;  "रिनेसाँ" लाइए  

श्री महादेव गोविन्द रानाडे  के १७३ वें  जन्म दिवस पर विशेष 

एक दिया ही बहुत है 
अँधेरा मिटाने के लिए
एक कश्ती ही बहुत है 
सागर पार करने के लिए
एक सहारा ही बहुत है
तूफ़ान से निपटने के लिए 
जरा आवाज तो लगावो दोस्तों
बहुत से बुजदिल है किसी की राह देखते 
थोड़ा साहस तो जुटावो दोस्तों 
बहुत से कदम आपके पीछे होंगे 
फिर न कहना  
"जब वतन जल रहा था. 
मैं तो सिर्फ देख रहा था
चारों तरफ बर्बादी हो रही थी
मैं अपनी धुन में मस्त था 
जो लोग मदद के लिए हाथ मांग रहे थे
मैं उनको विद्रोही मान बैढा था"
इन्तजार कब तक करेंगे 
कहीं सब राख न बन जाए 


रिनेसाँ योरोप के इतिहास के वे वर्ष हैं जब वहां पर संस्कृति का  पुनरुद्धार हुआ. ये शब्द उस  समय की बात बताता है जब बड़े पैमाने पर संस्कृति में सुधार हुए.   भारत के महान सामाजिक क्रांतिकारियों में से एक महाविंद गोविन्द रानाडे का जन्म दिन भी १८ जनवरी है. अतः आज हमें उनको याद करना चाहिए. उन्होंने प्रार्थना समाज की स्थापना की और समाज में फैली कुरूतियों के खिलाफ आवाज उठायी. उस वक्त की जितनी भी सामजिक बुराइयां थी उनको मिटाने के लिए श्री रानाडे ने जी जान लगा कर आवाज उड़ाई. आज उन को याद कर के हमें फिर से बगावत करनी चाहिए - सामाजिक कुरूतियों के खिलाफ. आज फिर से हम सब को मिल कर  वैचारिक चिंतन और मंथन की संस्कृति बनाने के लिए भारत में एक रिनेसाँ लाना है. 


बढ़ता सामाजिक दिखावा और घटता आपसी सौहार्द 
एक शताब्दी पहले श्री रानाडे लोगों से कह रहे थे की शादी और इस प्रकार के आयोजन पर अनावश्यक खर्च न करो. वे सामाजिक कुरूतियों की निंदा कर रहे थे. आज भी वे ही हालत हैं. समाज उनको इज्जत देता है जो बेहिसाब दौलत समारोह और दिखावे पर खर्च करते हैं. कई कई अखबार भी उनपर लेख प्रकाशित कर उनको गौरवान्वित करते हैं. दिखावा एक ऐसी बिमारी है जिससे हमरी संस्कृति ख़त्म हो सकती है. आईये फिर से विद्रोह के झंडे उढाये. दिखावे की संस्कृति की जगह आपसी सौहार्द की संस्कृति की स्थापना करें. 


बढ़ रही है सामाजिक कुरुतियां
हमारा समाज फिर से भेड़ चाल चल रहा है. विदेशी नक़ल और देखादेखी का दौर चल रहा है. हम हर विदेशी सामाजिक बुराई को तुरंत अपना लेते हैं. अपनी खुद की सामाजिक बुराइयों को हटाना तो दूर, नयी नयी सामाजिक बुराइयों को और गले लगा रहे हैं. पुरानी सामाजिक बुराईयाँ अभी ख़त्म नहीं हुई है और नई सामाजिक बुराईंया हम फैला रहे हैं (जैसे की लिव इन रिलेशनशिप - जिसको आज कल कई मीडिया प्रचारित कर रहे हैं. ). इन नयी सामाजिक बुराइयों को रोकने के लिए ताकत की जरुरत नहीं है बल्कि चेतना और समझ  पैदा करने की जरुरत है. 

बढ़ती असहिष्णुता 
आज फिर से समाज में वैचारिक खुलापन, वैचारिक विमर्श और विविधता की संस्कृति की जरुरत आ गयी है. आज फिर से हमें समाज में बढ़ रहे कट्टरवाद को रोकना है. आज फिर से बढ़ती असहिष्णुता को रोकना है. हाल ही में तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन को अपने एक उपन्यास का विरोध झेलना पड़ा. उनको अपना उपन्यास वापस लेना पड़ा. उन्होंने दुखी हो कर हमेशा के लिए लेखन छोड़ने की घोषणा कर दी. यह घटना हम शिक्षा से जुड़े लोगों के लिए एक सबक है. हमें यह महसूस करना चाहिए की कही यह एक खतरे की घंटी तो नहीं है. कहीं समाज में वैचारिक खुलापन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रबुद्धता कम तो नहीं हो रही है.

केक और बुके की संस्कृति 
देश में पश्चिम की देखा देखि केक और बुके की संस्कृति शुरू हो गयी है. चाहे कोई भी मौका हो, केक तो कटेगी ही कटेगी और बुके तो दिए ही जाएंगे. आपसी तोहफे भी कुछ विदेशी देखा देखि से आ गए हैं. जब भी किसी को तोहफा देना है तो कुछ महँगी विदेशी चॉकलेट या विदेशी परफ्यूम देने का रिवाज शुरू हो गया है. एक समय था की लोग तोहफे में बेहतरीन पुस्तकें दिया करते थे. वे सब अब हमारे इतिहास बन गए हैं. अगर हमें अपनी संस्कृति को बचाना है तो इस तरफ भी फिर से सोचना पड़ेगा. 

खुला नशा 
आज कल समारोहों / आयोजनों में नशा-डांस-फूहड़पन का खुला प्रदर्शन हो रहा है. इसके खिलाफ लिखने या बोलने वाला कोई नहीं है. इस संस्कृति से हमारी युवा पीढ़ी बर्बाद हो जायेगी. 

विदेशी भाषा, विदेशी वेश-भूषा का बढ़ता जाल
एक शताब्दी पहले श्री रानाडे पुरे जीवन भारतीय भाषाओँ में साहित्य को बढ़ावा देने का प्रयास करते रहे. आज के समय में सभी लोग विदेशी भाषाओँ पर बल दे रहे हैं. स्थानीय भाषाओं को मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है. अधिकाँश कंपनियां अपने कर्मचारियों से विदेशी परिधान में आने के लिए कहती हैं. हमारी भाषा और संस्कृति का भविष्य खतरे में हैं. 

घटते महिला और बाल अधिकार 
महिलाओं की शिक्षा से उनकी स्थिति सुधरी है लेकिन आज उनकी हालात और ज्यादा बुरी हो रही है. एक तरफ वे अपने घर का काम करती हैं, दूसरी तरफ उनके पति नशे की चपेट में रहते हैं. जैसे जैसे महिलाएं नौकरी की तरफ जा रहीं है, वैसे वैसे उनकी जिंदगी नयी चुनौतियों से रूबरू हो रही हैं. महिला सुरक्षा आज का नया मुद्दा बन गया है. बाल श्रम घटने का नाम नहीं ले रहा और बच्चों को शिक्षा का अधिकार सिर्फ कागजों तक सिमित है. 

विदेशी खान पान 
शुद्ध भारतीय खान पान की जगह पर आज विदेशी खान पान हावी हो रहा है. चुनौती है की हम पिज़्ज़ा की संस्कृति से कैसे बचे और अद्भुत भारतीय व्यंजनों को कैसे बचाएं. 
जुआ और अकर्मण्यता की संस्कृति 
आज का युवा बिना परिश्रम के पैसा कमाने के लुभावनों में फंसता जा रहा है. . वह जुए की गिरफ्त में फंसता जा रहा है. कही पर शेयर मार्किट के सट्टे , कहीं पर कोमोडिटी के सट्टे चल रहे हैं तो कहीं लोग क्रिकेट पर सट्टे कर रहे हैं. यह सट्टे की संस्कृत युवाओं को परिश्रम से विमुख कर रही हैं. अकर्मण्यता से कर्म की तरफ कैसे मोड़ें? आईये युवाओं का मार्गदर्शन करें. 

तकनीक का गुलाम आज का इंसान
यह एक अच्छी बात है की हर व्यक्ति के पास आज मोबाइल है. लेकिन वह तकनीक का गुलाम बन गया है. इस गुलामी का परिणाम बहुत बुरा होगा. तकनीक हमारी गुलाम है लेकिन आज का युवा तो उसका गुलाम हो रहा है. इसका परिणाम यह है की युवा वर्ग की सोचने और विमर्श करने की क्षमता कम होती जा रही है. 
बढ़ते शॉर्टकट्स, बढ़ती वन वीक सीरीज 
समाज में लेखन, शिक्षण, चिंतन और ज्ञानार्जन को फिरसे पुनः-स्थापित करने के जरुरत है. श्री रानाडे ने उस जमाने में भी अपनी पत्नी रमाबाई को शिक्षा हासिल करने के लिए प्रेरित किया और सामाजिक विकास की दिशा में आगे बढ़ाया. आज फिर से एक प्रयास की जरुरत है की आप अपने परिवार को तो कमसे कम चेतना और शिक्षा की दिशा में आगे बढाइये. शिक्षा से मेरा मतलब हुनर और परिश्रम पर आधारित शिक्षा और चेतना का प्रयास है न की येन-केन प्रकरेण  डिग्री लेने के हथकंडे . 

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lets create heaven


आईये स्वर्ग बनाएं

इस दुनिया में अगर जन्नत है कही तो बस है यहीं है यहीं ...
लोक कल्याण कारी सरकार के लिए अमर्त्य सेन कितना भी कहें सरकारों की अपनी सीमाये होती है.  सरकार चाहे तो भी बहुत कुछ नहीं कर सकती क्योंकि नीति और कानून बनाने वाले लोग अक्सरजमीनी हकीकत से बहुत दूर होते हैं. सरकार का मतलब बहुत कुछ सीमा तक नियम कानून औरव्यवस्थाओं से है और उनकी अनुपालना से है. लेकिन हम सब जानते हैं की आज नहीं हमेशा से हीइन सभी प्रक्रियाओं पर नकल करने की प्रवृति हावी रही है. वाही कानून बनाये गए हैं जो विदेशों(ख़ास कर कुछ विकसित देशों में) में चल रहे हैं. ज्यादातर मामलों में हमारे कानून भी उनके कानूनोंकी नक़ल मात्र होते हैं.

जब आप स्वर्ग बनाने की बात करते हैं तो फिर आप को उनलोगों को देखना पड़ेगा जो असलीस्वरज्य का मतलब जानते हैं और उसको अपनाते आये हैं. इसके लिए आपको विदेश जाने कीजरुरत नहीं है न ही विदेशी संविधान की नक़ल करने की जरूरत है. इस अद्भुत देश में हजारों वर्षों सेग्राम स्वराज्य और गणतंत्र की अद्भुत परम्परा रही है जो आज भी किसी  न किसी गाव - कसबे मेंमिल जायेगी. जब हम उस गाव और कसबे (जो स्वराज्य असली अर्थ में अपनाता है) का आदर्शअपना कर हर गाव और हर मोहल्ले के स्तर पर स्वराज्य की शुरुआत करेंगे तो फिर एक ऐसीशुरुआत होगी जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते - यानी एक असली स्वर्ग की शुरुआत.
प्रशाशन और सरकारी तंत्र से परे भी बहुत कुछ होता है और जहाँ जहाँ भी ऐसे प्रयास होते हैं वेवंदनीय है और अनुकरणीय हैं.
स्वर्ग बनाने के लिए आज आपको अपने हाथों में अपनी कमान लेनी पड़ेगी. यहाँ पर स्वर्ग बनाने केलिए आप जो भी करना चाहते है - उसके लिए शुरुआत भी आप को करनी है और लोगों को साथ भीआप को लेना है. स्वर्ग बनाने का रस्ता आसान भी नहीं है. कोई भी बड़ा मकसद कभी भी आसाननहीं होता है.

ग्राम स्वराज्य के अनूठे आंदोलन
राजसमन्द जिले के पिपलांत्री गाव के लोगो ने मिले कर अपना स्वयं का ऐसा विधान बनाया है कीहर गाव को इससे सबक लेना चाहिए. जब भी किसी घर में किसी बालिका का जन्म होता है तो गाववाले मिल कर २१००० रूपये इकठे कर उस बालिके के पिता के १०००० जोड़ कर कुल ३१००० की एकएफडीआर (बैंक जमा ) करवा देते हैं और उस बालिका के पिता को यह भी लिख कर देना पड़ता है कीवह उस बालिका को पूरी पढाई करवाएगा और उसकी अवयस्क उम्र में शादी नहीं करेगा. जब भीकिसी बालिका का जन्म होता है तब गाव वाले लोग मिल कर १११ पेड़ लगाते है और उन पेड़ों कोसींचते है. उस गाव में मृत्यु भोज की जगह पर एक बेहतरीन प्रणाली है - जब भी किसी की मृत्युहोती है - गाव वाले मिल कर ११ पेड़ लगाते है. इन सब परम्पराओं के कारण आज इस गाव काअपना नाम है. इस गाव को कई इनाम और सम्मान मिले हुए है. गाव के लोगों ने मिल कर एक सेबढ़ कर एक श्रेष्ठ परम्पराएँ स्थापित की है. इस प्रकार यह साबित होता है की अगर लोग चाहें तोफिर स्वर्ग बनाया जा सकता है. इस हेतु पहल गावों को ही करनी होगी. हमारे देश में गावों में एक सेबढ़ कर एक बेहतरीन परम्पराएँ है और अगर हम सब मिल कर प्रयास करें तो ऐसा संभव है की हमहर गाव में एक स्वर्ग बना सकते हैं.

जहाँ संस्कृत आम भाषा है
कर्णाटक में मत्तूर और होसहल्ली में लोग आम बोलचाल में संस्कृत भाषा का इस्तेमाल करते हैं.यहाँ के लोग वर्षों पुरानी भारतीय संस्कृति को इस प्रकार संजोये हुए है जो वाकई वंदनीय है. इनगावों की इस अद्भुत परम्परा को नमन.

गाव जहाँ के कानून भारतीय कानूनों से भी ज्यादा अच्छे और मजबूत हैं.
हिमाचल प्रदेश के मलाणा  गाव के लोगों ने वर्षों से अपने बनाये हुए कानूनों का पालन किया है औरवे ऐसे कानून बनाते हैं तो हर नागरिक को समझ आते हैं और हर नागरिक दिल से उन कानूनों कापालन करता है. जैसे मलाणा में कोई भी व्यक्ति किसी जंगली जानवर को नहीं मार सकता (शिकारतो दूर की बात है). कोई भी व्यक्ति किसी हरे भरे पेड़ को नाख़ून तक नहीं चुभा सकता है - तोडनातो दूर की बात है. सिर्फ सूखे हुए पेड़ और डालियाँ की तोड़े जा सकते हैं. ऐसे अनेक उदाहरण है जोयह स्पस्ट करते हैं को जहा पर भी लोग मिल कर अपनी व्यवस्था स्थापित करते हैं - वह ज्यादाबेहतर ढंग से काम करती है.

अद्भुत अनोखे प्रयास
जहाँ जहाँ पर लोगों ने मिल कर नयी संगठनात्मक पहल की है वहां वहां अद्भुत अनोखे परिणामसामने आये हैं. लोग चाहें तो वे कुछ भी कर सकते हैं. सरकारें अपने बनाये हुए कानूनों के जाल मेंइस तरह जकड़ी रहती हैं की चाह की भी कुछ नहीं कर सकती हैं और न किसी और को कुछ करने देसकती हैं. लेकिन लोग अगर चाहे तो चमत्कार कर सकते हैं. इस हेतु एक माहौल बनाने की जरुरतहैं. यहाँ मैं ऐसे कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ : -

ब्लाइंड पीपल एसोसिएशन
अहमदाबाद की इस अद्भुत संस्था में काम करते हुए अंधे लोग आम लोगों से भी ज्यादा सक्षम बनगए हैं और अपने काम को इतनी सफाई से करते हैं की आप हैरान रह जाएंगे. वे फर्नीचर भी बनाते हैंतो सॉफ्टवेयर भी बनाते हैं.

मिराकल कोरियर
मिरेकल कोरियर एक ऐसी कोरियर कम्पनी है जिसमे काम करने वाले लोग बहरे हैं. इस कंपनी मेंसिर्फ बहरे लोग ही काम करते हैं और वे इतने शानदार ढंग से काम करते हैं की किसी को कोईपरेशानी नहीं होती है.

सारांश : -
एक सकारात्मक पहल के साथ अगर हम सभी अपने अपने स्तर पर छोटे छोटे संगठनतमक प्रयासशुरू करेंगे तो इसी भारत वर्ष को हम फिर से स्वर्ग बना सकते हैं. इस हेतु हमें अद्भुत अनुशासन,कर्तव्य निष्ठां, आपसी तालमेल, और सामाजिक उद्देश्यों को प्राथमिकता देनी होगी. हमे  बेहतरीनकार्य करने वाली संस्थाओं से प्रेरणा लेनी होगी और उनके साथ मिल कर प्रयास करने होंगे.