Thursday, April 23, 2015

स्वास्थ्य से पहले संस्कृति

स्वस्थ रहने के लिए सांस्कृतिक प्रदुषण से बचें 

(विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष) 
स्वास्थ्य से पहले संस्कृति 

७ अप्रैल को विस्व स्वास्थ्य दिवस है. आप भी कमर कस कर अपना और अपने प्रिय जनों का स्वास्थ्य बचाने के लिए प्रयास करें. आज सबसे ज्यादा खतरा संस्कृतक प्रदुषण से है. स्वास्थ्य सम्बन्धी सभी समस्याएं भी सांस्कृतिक प्रदुषण के कारण हो रही है. 

अगर आप वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन के डेटा देखेंगे तो आप पाएंगे की दुनिया में हर साल ५६० लोगों की मृत्यु होती है जिनमे से निम्न कारणों / बीमारियों के कारण सबसे ज्यादा मौतें होती हैं.: - 
१. ह्रदय आधात और दिल के दौरे से मौत : १५० लाख
२. सांस और फेफड़े सम्बन्धी बीमारियों से मृत्यु : ७५ लाख 
३. एड्स के कारण मृत्य : १५ लाख
४. पेट की बीमारियों के कारण मृत्य : १५ लाख 
५. शुगर की बीमारी के कारण मृत्यु : १३ लाख 
६ . सड़क दुर्घटना से मृत्यु : १३ लाख 

आप देख सकते हैं की विकसित देश भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल को कर हृदय आधात और ऐसी बीमारियों की गिरफ्त में जाते जा रहे हैं और वहां इन बीमारियों के कारण सबसे ज्यादा मौतें होती है. उन्मुक्तता की संस्कृति और सांस्कृतिक   प्रदुषण के कारण एड्स की बिमारी फ़ैल रही है और उससे ज्यादातर अल्प विकसित देश प्रभावित हो रहे हैं. भारत अपनी संस्कृति और अपनी विरासत के कारण इन सभी बीमारियों से बचा हुआ है. आध्यात्म आधारित संस्कृति के कारण ही यहाँ के लोग स्वस्थ है और इन बीमारियों से बचे हुए हैं. 
उपभोग आधारित उच्छृखलता की संस्कृति 
आज हर तरफ एक प्रयास हो रहा है की किसी भी तरह से भारतीय संस्कृति की दिवार को तोड़ी जाय. शिक्षण संस्थाओं को मीठा जहर परोसा जा रहा है और आप और हम को पता भी नहीः चलेगा की कब पुस्तकों में ये लिख दिया जाएगा की "मांस खाना स्वस्थ के लिए अच्छा होता है" और "घी खाना स्वास्थ्य के लिए ख़राब होता है". इस संस्कृतक प्रदुषण के पीछे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का आर्थिक ढांचा है. उनको तभी मुनाफा मिलेगा जब भारत के १२५ करोड़ लोग उनके उत्पादों को खरीदेंगे. वो तभी संभव होगा जब यहाँ के लोग यहाँ की स्वस्थ जीवन शैली छोड़ कर पश्चिमी संस्कृति और उन्मुक्तता अपनाएंगे. तभी बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के वे उत्पाद बिकेंगे जो अभी पश्चिमी देशों और बैंकॉक जैसे देशों में ही ज्यादा बिकते हैं. 


हर व्यक्ति, हर वस्तु, हर पल को उपभोग की नजर से देखने वाली एक ऐसी संस्कृति अपने पैर पसार रही है जिसके बारे में हम सोच ही नहीं रहे हैं. देखते ही देखते हमारे पैरों के निचे से जमीन खिसक जायेगी और हम अवाक रह जाएंगे. हमारी सारी व्यवस्थाएं -  स्वास्थ्य, शिक्षा, खान - पान और जीवन शैली उस संस्कृति की मार से पूरी तरह से बदल जायेगी. 
फिल्मों और शिक्षा तंत्र की मदद से हर तरफ ये प्रयास हो रहे हैं की हमारे खान, पान, जीवनशैली, संस्कृति, और हमारे मूल्यों को बदला जाए. आप भी इस बात को महसूस कर सकते हैं. जब आप अपने बच्चों को टाई पहना रहे हैं और धोती कुरता या साडी पहनने से मना  कर रहे हैं तो आप भी उस गिरफ्त में शामिल हैं जो आप को आपके ही साथियों के द्वारा एक नयी गुलामी की तरफ धकेलने का प्रयास कर रहे हैं. आप इस बात को शायद न माने लेकिन भारत का प्राचीन ज्ञान पूरी तरह से विज्ञानं पर आधारित था और यहां की सांस्कृतिक विरासत किसी व्यक्ति को स्वस्थ और आनंद के साथ जीवन के चरम उद्देश्य की तरफ ले जाने के लिए प्रयाप्त थी. आज हमारी नयी पीढ़ी  हमारे पुराने रीतिरिवाज को तिरस्कार की निगाह से देख रही है. गुजरात और राजस्थान के कुछ भागों में अभी भी सुबह सुबह लोग मंदिर जाते नजर आ जाते हैं लेकिन शिक्षित  लोग तो भारतीय संस्कृति से परहेज करने में ही अपनी विद्वता मान रहे हैं. आज पूरा विश्व सांस्कृतिक प्रदुषण की बिमारी को झेल रहा है. इस प्रदुषण को फैलाने वालों के साथ सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियां और पूरा वित्त तंत्र है क्योंकि सबके आर्थिक हित जुड़े हैं. आप को पता ही नहीं चलेगा कब आप के ही बच्चों को आप अपने स्वयं के प्रति तिरस्कार पैदा करने वाले लोगों के पास शिक्षा के लिए भेज देंगे और जब आप को इस बात का पता चलेंगे तब तक  बहुत देर हो चुकी होगी . 

अद्वितीय भारतीय सांस्कृतिक विरासत पर एक श्लोक काफी है  : - 
युग  सहस्त्र  योजन  पर  भानु  (भानु का अर्थ होता है सूरज) 
1 युग  = 12000 साल  
 1 सहस्त्र  = 1000 
 1 योजन  = 8 मील  
 युग  x सहस्त्र  x योजन  =  12000 x 1000 x 8 मील  = 96000000 मील  
 1 mile = 1.6kms 
96000000 miles = 96000000 x 1.6kms = 1536000000 kms 
जो की सूरज की पृथ्वी से दुरी है.  इससे ज्यादा वैज्ञानिक गणना कैसे हो सकती है? 

बिजली पानी है नहीं - पर हम चले मंगल ग्रह

अंतरिक्ष यात्रा : विकसित देशों के तथा-कथित शोध अभियान और गरीब देशों की भेड़ चाल



(अंतरिक्ष यात्रा दिवस पर विशेष)

 

कहते हैं उतने पाँव पसारने चाहिए जितनी लम्बी चादर हो. आज विकसित देशों में बहुत से मामलों पर शोध हो रही है - परन्तु क्या हमको भी उस प्रकार के कार्य करने चाहिए? उनकी प्राथमिकताएं हमसे अलग हैं. हम को तो सड़क और स्कुल बनाने के लिए भी कर्ज लेना पड़ता है. ऐसा ही एक क्षेत्र है अंतरिक्ष पर्यटन का.

१२ अप्रैल १९६१ को किसी भी  मानव ने (रूस के श्री यूरी गगारिन) ने पहली बार अंतरिक्ष में प्रवेश किया. इस उप्लभ्धि को याद रखने के लिए १२ अप्रैल को मानव की अंतरिक्ष यात्रा दिवस के रूप में मनाया जाता है. यह दिन वाकई बहुत महत्वपूर्ण है. अंतरिक्ष की यात्रा विज्ञानं की सबसे बड़ी उप्लाभ्दियों में से एक है. यह मानव की शानदार तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन है. भारत के राकेश शर्मा ने भी अप्रैल १९८४ में अंतरिक्ष की यात्रा की और लगभग ८ दिन अंतरिक्ष में गुजारे. जब उनसे प्रधानमंत्री ने पूछा की अंतरिक्ष से भारत कैसा दीखता है तो उनका जबाब था : "सारे जहाँ से अच्छा"

 

अंतरिक्ष की फतह मानव के लिए शोध के नए क्षेत्र खोल रही है. फिजिक्स, बायो-मेडिकल और बायो-केमिस्ट्री के कई प्रयोग जो धरती पर संभव नहीं है वे प्रयोग अंतरिक्ष में किये जा सकते हैं.  आने वाले समय में अंतरिक्ष में हॉस्पिटल्स (क्योंकि अंतरिक्ष में बैक्टीरिआ और वाइरस नहीं होते हैं)  और होटल्स भी हो पाएगी और अंतरिक्ष एक पर्यटन  का विषय बन  जाएगा (इस क्षेत्र को स्पेस टूरिज्म कहा जा रहा है). विकसित देशों में  तो स्पेस टूरिज्म एक नया क्षेत्र बन गया है. वर्ष २००१ में  २० मिलियन डॉलर चूका कर अंतरिक्ष में घूमने वाले डेनिस टिटो पहले स्पेस पर्यटक (टूरिस्ट) थे. उनके बाद तो अब एक झड़ी सी लग गयी है. अब तक ७ पर्यटकों ने स्पेस पर्यटन किया है लेकिन अब पर्यटन की लागत बहुत बढ़ गयी है. लेकिन आने वाले समय में सोलर ऊर्जा के क्षेत्र में क्रांति आने से स्पेस यात्रा भी सस्ती हो जायेगी और इस क्षेत्र में फिर से लोगों का रुझान बढ़ जाएगा. आज एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विद्यार्थियों का पसंदीदा क्षेत्र है और हर विद्यार्थी इस क्षेत्र में शोध करना चाहता है. उम्मीद की जानी चाहिए की इस क्षेत्र में बढ़ती लोकप्रियता के कारण इस क्षेत्र में कुछ नए शोध अंतरिक्ष यात्रा की लागत को बहुत कम कर देंगे और लगता है की आने वाले समय में इस क्षेत्र में पर्यटन का एक नया क्षेत्र खुल जाएगा. स्पेस एडवेंचर्स, बोइंग, वर्जिन एयरलाइन्स आदि कई कम्पनियाँ इस क्षेत्र में शोध कर रही हैं. खैर - अगर निजी क्षेत्र इस तरफ पैसा लगाये तो वो अलग बात है और सरकारें इस तरफ पैसा लगाए तो वो अलग बात है. निजी क्षेत्र अपना पैसा वसूल भी लेते हैं जब वो एक एक यात्री से लाखों रूपये इस विलासिता के क्षेत्र में मांगते हैं. वो दिन दूर नहीं जब धनवान लोग शादियां रचाने अंतरिक्ष जाएंगे. खैर उस विलासिता के क्षेत्र के बारे में नहीं हम तो अपने देश की प्राथमिकताओं की बात करेंगे.   

 

शांत अंतरिक्ष से खतरनाक  अंतरिक्ष

जहाँ जहाँ मानव के पाँव पड़ते हैं वहा वहा पर प्रदुषण फैलता है. जब मानव ने जब समुद्र पर पाँव रखा तो वहां भी गंदगी फैला दी,  हिमालय पर पाँव रखा तो वहां भी प्रदूषण फैला दिया  और अब अंतरिक्ष भी नहीं बचा. अंतरिक्ष में लाखों अवशिष्ट टुकड़े तैर रहे हैं और यह संख्या बढ़ती जा रही है. १९५८ में अमेरिका ने वैनगार्ड फर्स्ट नामक उपग्रह छोड़ा था जो कब का बंद भी हो गया परन्तु वह २४० साल अंतरिक्ष में तैरता रहेगा. उसके बाद रूस, चीन, और अमेरिका ने दुनिया भर के हथियार और सामान अंतरिक्ष में छोड़ दिए. ये सब सामान वापस तो लाया जा नहीं सकता और अंतरिक्ष में हम "स्वच्छ भारत" अभियान नहीं चला सकते. ये अवशिष्ट पदार्थ आने वाले समय में हम सबके लिए बड़ी मुसीबत बनेगे. जब भी कोई रॉकेट अंतरिक्ष में जाएगा - उसको इन अवशिष्ट टुकड़ों से बड़ा खतरा है. १९६९ में जापान के एक नाविक पर आसमान से रुसी रॉकेट का एक अवशिष्ट टुकड़ा आकर गिर गया था. इस प्रकार के हादसे भविष्य में ज्यादा होंगे.

गाव-गाव बिजली पानी देने के लिए पैसे नहीं - पर हम चले मंगल ग्रह
अंतरिक्ष से सम्बंधित शोध पर सिर्फ नासा ही सालाना  १००० अरब से ज्यादा रूपये खर्च कर देता है अतः अंतरिक्ष की शोध पर जितना रुपया खर्च हो रहा है उस राशि से अगर गरीबी, बिमारी और बेरोजगारी के खिलाफ लड़ाई लड़ी जाए तो दुनिया की साड़ी समस्याएं मिट जाए. भारत भी सालाना ७० अरब से ज्यादा रूपये अंतरिक्ष शोध पर खर्च करता है. हमारा सीना उस समय गर्व से फूल गया था जब सितंबर २०१४ में  मंगलयान ने मंगल की परिक्रमा शुरू कर दी थी. भारत का मंगल यान प्रोजेक्ट सिर्फ ४५० करोड़ रूपये में सफल हो गया जबकि विकसित देशों में इसका कई गुना खर्च हो जाता है. लेकिन फिर भी प्रश्न है की क्या भारत जैसे देशों को इस प्रकार के प्रोजेक्ट को प्राथमिकता देनी चाहिए? क्या भारत सरकार को इस प्रकार के बजट के लिए संसाधन आबंटिक करने के लिए हम बधाई देवें? कम से कम भारत जैसे  देश को तो इस दौड़ में शामिल न होकर देश की प्राथमिकताओं पर पैसा खर्च करना चाहिए ताकि ताकि उनको मदद मिले जिनको वाकई सरकारी मदद की जरुरत है जैसे की  वो बालक जो आज शिक्षा से वंचित है या वो बालिका जो कुपोषण में जी रही है या वो मरीज जो बिना इलाज-दवा के बेमौत मर रहा है. आज भी हमें यह समझना पड़ेगा की हमारे देश की पहली प्राथमिकता बेरोजगारों को रोजगार, भूखों को रोटी, बीमार को इलाज, और गावों को बिजली पानी और सड़कें देना है न की अंतरिक्ष की यात्रा.

जंगल बचाओं, पेड़ बचाओं, पशु-पक्षी बचाओ

जंगल और जानवरों का कॉर्बेट(वो शिकारी जिसको सरकार सलाम करती है)

(१९ अप्रैल को श्री जिम कॉर्बेट की पुण्य तिथि पर विशेष)

कुमाऊं का लाडलाएक समय था जब इंसान बाघ और अन्य जंगली जानवरों से डरा करता था. एक समय था जब उन लोगों की बड़ी मांग थी जो की आदमखोर शेर और बाघ को मार सके. एक समय था जब शिकार का उद्देश्य मानव जीवन को बचाना था (न की आज की तरह एक घटिया शौक). ऐसा ही एक शिकारी था जिसको आज भी सब लोग सम्मान से याद करते हैं. वो शिकारी था जिम कॉर्बेट जिम कॉर्बेट का जन्म भारत में  नैनीताल में हुआ. उसने अपना बचपन कुमाऊं में बिताया और कुमाऊं के लोगों से जंगल और जानवरों का प्रेम प्राप्त किया. कुमाऊं के लोगों की तरह श्री कॉर्बेट भी जंगली जानवरों को उनकी आवाज से पहचान  लेते  थे.  वो सच्चे अर्थों में जंगल और जंगली जानवरों का प्रशंसक था. उसने अपने जीवन काल में जंगलों और जंगली जानवरों पर अनेक पुस्तकें लिखी और जानवरों के लिए विशेष प्रयास किये.

नरभक्षी जानवरों से जानवर-भक्षी इंसानों की तरफ : -एक समय था जब इंसान नर-भक्षी जानवरों के भय से त्रस्त रहता था. पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोग रात में घरों से भहर नहीं निकलते थे. हर तरफ नर-भक्षी बाघ और अन्य जंगली जानवरों का खौफ था. हालाँकि श्री कॉर्बेट ने अपने अनुभव से यह साबित किया था की वो ही बाघ नरभक्षी बन जाते हैं जो किसी बिमारी या चोट से ग्रस्त होते हैं. बिमारी की हालत में उनको शिकार मिलना मुश्किल  हो  जाता है और वे नरभक्षी बन जाते हैं. श्री कॉर्बेट ने १२०० इंसानों को मारने वाले नरभक्षी बाघों को मौत के घाट उतार दिया था. लेकिन कॉर्बेट के ही प्रयास से भारत में नेशनल पार्क की स्थापना हुई (जिसका नाम आज जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क है). श्री कॉर्बेट ने  ३० से ज्यादा आदमखोर  बाघ और तेंदुओं का शिकार किया लेकिन  आखिर में  जंगलों और जानवरों को बचाने के लिए प्रयास किये. आज फिर से कॉर्बेट की जरुरत आ पड़ी है. आज जंगल और जानवर दोनों का जीवन खतरे में है. सरकार के प्रयासों से बाघों की जनसँख्या बढ़ रही है (सरकारी आंकड़ों के अनुसार बाघों की संख्या पिछले ५ सालों में १७०० से बढ़ कर २३०० हो गयी है) लेकिन वो बाघ क्या खाएंगे? (बाकी जानवर तो खत्म हो रहे हैं) जंगलों का ख़त्म होना और जंगली जानवरों का लगातार घटना एक चिंता का विषय है.  एक समय था जब जंगल, पेड़ और जंगली जानवर हुआ करते थे. अब वे लगातार घट रहे हैं. मैंने अपने पिताजी से कस्तूरी मृग की कहानिया सुनी थी  - अब तो कस्तूरी मृग ही नहीं बचे हैं. एक समय ऐसे घनघोर जंगल हुआ करते थे जिनमे दिन में भी अँधेरा रहता था - अब ऐसे जंगल दुर्लभ हो गए हैं. जंगलों की सुरक्षा के नाम पर फारेस्ट ऑफिसर्स आदि की नियुक्ति की जाती है जो खुद ही अक्सर शिकारियों से मिले हुए होते हैं और जंगल और जानवरों को बचाने की जगह पर उनके विनाश के कारक बन जाते हैं.

जंगलों की कीमत अनमोल से बहुमूल्य बन गयीजंगल और जंगली जानवर अनमोल हैं. लेकिन आज के ज़माने में कार्बन क्रेडिट का बड़ा फायदा है. जिस देश के पास बड़े बड़े जंगल हैं वो देश उन जंगलों को बचा कर कार्बन क्रेडिट हासिल कर सकता है और इस प्रकार जंगलों से उसको कार्बन क्रेडिट के रूप में लगातार आय प्राप्त होती रहेगी. वो देश जिनके पास बड़े बड़े जंगल हैं उनको लगातार आय प्राप्त होती रहेगी और वे देश इस प्रकार बहुत ही सफल हो जाएंगे.
इंसान का हैवानी स्वरुप जानवरों की घटी जनसँख्या के पीछे सबसे बड़ा कारण उनका शिकार है. जिम कॉर्बेट भी शिकारी थे पर उनका लक्ष्य अलग था. आज कल हर होटल जंगली जानवरों का मांस परोस रहा है. लोगों में भी इसका एक फैशन बन गया  है  इंसान का हैवान के रूप में रूपांतरण आज जानवरों के लिए सबसे ज्यादा चिंताजनक है. आज इंसान लगभग हर जानवर खाने के लिए तत्पर बैठा है. एक समय था जब वनस्पति की कमी के कारण इंसान को मांस खाना पड़ता था, परन्तु आज तो मांसाहार भी एक फैशन बन रहा है.

फैशन इंडस्ट्री का सितमफैशन इंडस्ट्री जानवरों के कंकाल, खाल, दांत, और शारीर के हिस्से फैशन के रूप में प्रस्तुत कर रहा है. कोई खरगोश की खेल से पर्स बना रहा है तो कोई गेंडे व् हाथी के दांत से गहने बना रहा है तो कोई जानवरों का प्रयोग फैशन उत्पादों की लैबोरेटरी में कर रहा है.

वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फण्ड (WWF)यह अफ़सोस की बात है की अहिंसा परक देश भारत को आज अहिंसा की शिक्षा के लिए वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फण्ड (WWF)  की तरफ देखना पड़ रहा है. वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फण्ड की तरह के अनेक स्वयं सेवी संगठन आज आगे आ रहे हैं जो लोगों को पेड़ और जंगली जानवरों को बचाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. उनके प्रयास वन्दनीय हैं. भारत के लोगों को भी इस तरफ प्रयास करना चाहिए. बिश्नोई समाज का इस तरफ विशेष योगदान है.
हग एक पेड़ हग ऐ ट्री एक प्रोग्राम है जिसके द्वारा वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फण्ड पेड़ों को बचने के लिए प्रयास कर रहा है. हम सब को इस प्रयास के साथ जुड़ना चाहिए. ये लोग भी वो काम कर रहे हैं जो हम भारतीय वर्षों से करते आ रहे हैं.
हम सबको अब यह कहना ही पड़ेगा : जंगल बचाओं, पेड़ बचाओं, पशु-पक्षी बचाओ  

Wednesday, February 11, 2015

रिलेटिव इकोनॉमिक्स - मानवीय मूल्यों का अर्थशाश्त्र




रिलेटिव इकोनॉमिक्स विकास की एक ऐसी आधारशिला है जिसमे हम विकास की योजना बनाते समय निम्न कोप्राथमिकता देते हैं : -

मानवीय मूल्य,
नीतिशास्त्र
संतुलित विकास की अवधारणा
मानवीय मूल्यों पर आधारित विकास के सोपान
अहिंसा और अपरिग्रह पर आधारित आर्थिक और सामाजिक ढांचा
विविधता को संजोने और संरक्षित करने वाली नीतियां

वर्तमान आर्थिक योजनाओं का केंद्र सिर्फ जीडीपी रहता है यानी येन केन प्रकरण उत्पादन बढ़ाना और उसके आंकड़ोंसे विकास को मापना - भले ही इस प्रक्रिया में समाज के लिए हानिकारक वस्तुओं का उत्पादन बढेसमाज परउत्पादों के प्रभाव का विश्लेषण नहीं किया जाता है और इन सब प्रश्नों  को "मार्किट फोर्सेजके हवाले कर दिया जाताहैआज का नीति निर्माता यह नहीं देखता की उसके द्वारा उपभोग को बढ़ावा देने की नीति के कारण किस प्रकारकी वस्तुओं और किस प्रकार के मूल्यों को बढ़ावा मिल रहा हैआज का अर्थशाष्त्री अपने को नीतिशास्त्र से दूर रखनाचाहता हैइन सभी कारणों से आज के आर्थिक योजनाकारों ने ऐसी योजनाएं बना दी हैं जिनके कारण समाज,परिवार और यहाँ तक की मानव मात्र का मूल्यों से नाता टूट रहा हैइस विखंडित होते समाज को देख कर सभी लोगदुखी हैं और आज सब यह मान रहें हैं की मूल्य विहीन आर्थिक नीतियां समाज को नुक्सान पहुंचा रही हैं.हमारीनीतियों के कारण हर रोज अनेक वनस्पतियां लुप्त हो रहीं हैं और जैव-विविधता को खतरा हो गया हैहर दिन किसीने किसी प्रजाति के लुप्त होने  की स्थितियां बनाने के लिए हमारी आर्थिक नीतियां भी जिम्मेदार हैंआज मानवीयलिप्सा के कारण जंगलपेड़वन्य प्राणी और जीव जंतु सबके अस्तित्व को खतरा है.  आज आर्थिक नीतिनिर्माताओं को एक विकल्प की जरुरत है क्योंकि अगर इसी प्रकार की नीतियां जारी रहीं तो मानव मात्र के अस्तित्वको भी खतरा हो जाएगाआर्थिक नीति निर्माताओं के पास कोई विकल्प नहीं हैंआज हम सब को एक विकल्प नजर रहा है जो आचार्य महाप्रज्ञ जी ने रिलेटिव इकनोमिक के रूप में दिया थाआचार्य महाप्रज्ञ जी ने रिलेटिवइकोनॉमिक्स के रूप में हमें भविष्य की समस्याओं का एक समाधान दिया हैआने वाले समय में निम्न समस्याओंका सामना करने के लिए हम पूरी तरह से तैयार नहीं हैं और यह बात संयुक्त राष्ट्र भी मानता है : -

क्लाइमेट चेंज - यानी बढ़ते तापमान के कारण होने वाली समस्याएं
 . मानवाधिकारों के उल्लंघन की समस्या व् बढ़ती हिंसा व् असंतोष
 . प्रदुषण व् अन्य मानव  कृत समस्याएं जो हम सब व्यक्तियों के लिए अस्तित्व का खतरा बना सकता है
 . पर्यावरण व्  जैव-विविधता को खतरा

उपर्युक्त सभी समस्याओं की जड़ में जाते हैं तो हम पाते हैं की हमारी भोगवादी आर्थिक नीतियां ही इन समस्याओंके लिए जिम्मेदार हैंआज अनेक अर्थशाष्त्री यह मान रहें हैं की वर्तमान आर्थिक नीतियां हमारी समस्याओं कासमाधान करने की जगह हमें मुश्किलों में दाल रहीं हैंहमारी आर्थिक नीतियां बनाने वाले लोग स्वयं मान रहें हैं कीउनकी आर्थिक नीतियां "सस्टेनेबल डेवलपमेंटनहीं कर सकतीआज तो प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी मानलिया है की योजना आयोग को हटा कर इसकी जगह कोई नयी संस्था बनाने की जरुरत है ताकि एक बेहतर औरविस्तृत योजना बनायीं जा सके जो इस देश के विकास में मदद कर सके.

रिलेटिव इकोनॉमिक्स का आधार भगवान महावीर का जीवन दर्शन हैभगवान महावीर ने गृहस्थों को जीवन जीनेके लिए कई मार्गदर्शन प्रदान किये थेजैसे : -
उपभोग में संयम की जरुरत हैसिर्फ उपभोग के लिए उपभोग नहीं होना चाहिए बल्कि मानव के कल्याण केलिए उपभोग होना चाहिए
 . स्याद्वाद के रूप में एक ऐसी व्यवस्था जिसमे लोग अपने विचारों से अलग विचारों का भी सम्मान कर सकेंऔर विचारों में विविधता को स्वीकार सकें
 . प्रकृति में हर प्राणीहर आत्मा को अपना कल्याण करने का हक है और अपनी गति से जीने और रहने का हक है.महावीर ने तो भूमिअग्निऔर जल में भी आत्मा की अभिव्यक्ति को स्वीकारा हैयानी प्रकृति के साथ किसी भीरूप में अन्याय नहीं होना चाहिएयही मन्त्र आज जय-विविधता को बचने के लिए जरुरी है.

रिलेटिव इकोनॉमिक्स को एक जीवन प्रशिक्षण के रूप में लागू किया जाना
कई विश्व-विद्यालय रिलेटिव इकोनॉमिक्स को एक विषय के रूप में शुरू कर रहें हैंआज यह मन जा रहा है कीरिलेटिव इकोनॉमिक्स के प्रशिक्षण से हम नै पीढ़ी को एक बेहतर इंसान बना पाएंगे और उनको मानवीय मूल्यों सेजोड़ पाएंगेआज हमें युवाओं में मूल्यों पर आधारित नेतृत्व का अभाव नजर रहा है जिसका कारन हमारी शिक्षाव्यवस्था है.  रिलेटिव इकोनॉमिक्स मूल्य आधारित व्यवस्थाओं को स्थापित करने की दिशा में एक अभिनवपाठ्यक्रम साबित होगा.

रिलेटिव इकोनॉमिक्स के मुख्य प्रशिक्षण बिंदु
रिलेटिव इकोनॉमिक्स में निम्न बिन्दुओं पर मुख्य रूप से प्रशिक्षण दिया जाएगा : -
मानवीय जीवन मूल्य आधारित संयम को प्रोत्साहित करने वाली आर्थिक और सामजिक नीतियां औरव्यवस्थाएं
सोशल आंतरप्रीन्यूरशिप - यानी सामजिक उद्यमिता  - जिससे युवा वर्ग समाज का विकास करने के लिएअपना व्यापर या उद्यम स्थापित करे और समाज के विकास को प्राथमिक लक्ष रख कर ही नए उत्पाद और नयीसेवाएं विकसित करेंउद्यमिता की प्रक्रिया में नए उत्पाद और नयी सेवाओं के निर्माण की प्रक्रिया भी इस केप्रशिक्षण का हिस्सा होगा यानी जो भी उत्पाद या सेवाएं बनायीं जाएँ उनका आधार प्रकृति और पर्यावरण से तालमेलहोना चाहिए.
पर्यावरण और प्रकृति केंद्रित व्यवष्टयं : -समाज के बहुआयामी विकास के लिए नयी व्यवस्थाएं बनाने हेतु नेतृत्वजो हर क्षेत्र में प्राणी मात्र के सह-अस्तित्व को स्वीकार करे

रिलेटिव इकोनॉमिक्स आधारित एनवायरनमेंट एंड सोशल ऑडिट
आज का अंकेक्षक सिर्फ लाभ हानि या मौद्रिक मूल्याङ्कन पर ही नजर रखता हैरिलेटिव इकोनॉमिक्स पर्यावरणऔर समाज पर पड़ने वाले परिणाम के मूल्याङ्कन पर जोर देता है अतः भविष्य की जरुरत के अनुसार अंकेक्षण कादायरा भी विस्तृत होना चाहिए.

नयी तकनीकनयी जीवन-शैली
फैशन के बारे में कहा जाता है की यह घूम फिर कर वापस आती हैरिलेटिव इकोनॉमिक्स हमारे टेक्नोलॉजिस्ट्स कोफिर से जमीन से जुड़े उत्पाद बनाने के लिए प्रेरित कर फिर से नए उत्पाद और नयी जीवन शैली को प्रोत्साहितकरता है जो की काफी सीमा तक हमारी परम्परों से जुड़ा हैयानी जो उत्पाद और जो जीवन शैली भारत के भू भाग सेलुप्त हो गयी है उसको वापस खोजने की जरुरत हैअब ऐसे उत्पाद बनाने पड़ेंगे जो पर्यावरण के अनुकूल होंगेजैसेहम लोग सैकड़ों वर्ष पहले प्रकृति की गोद में रह कर बिना प्रकृति को नुक्सान पहुंचाए उपभोग करते थेआज फिर सेऐसे शोध कर्ताओं की जरुरत होगी जो प्रकृति - प्रेमी हों और प्रकृति के अनुकूल नयी तकनीक को प्रोत्साहन देवें.
वर्तमान आर्थिक योजनाओं को रिलेटिव इकोनॉमिक्स की जरुरत
आज हम देख रहें हैं की योजना बनाते समय हमारे योजनविद मानवीय मूल्यों को यह मानते हुए नजर-अंदाज करदेते हैं की इनका आंकड़ों में प्रस्तुतिकरण सम्भव नहीं हैइस प्रकार हमारी योजनाएं मानवीय मूल्यों से निरपेक्ष होतीहैंमूल्य विहीन योजनाएं हमें अपने जीवन और चेतना से भी विहीन कर देगीअतः आज फिर से एक मुहीम कीजरुरत है की जो भी नीति निर्माता हो वे मूल्य आधारित नियोजन यानी रिलेटिव इकोनॉमिक्स का प्रशिक्षण लेवें औरइसी के लिए अपने आप को तैयार करें.

अंतरास्ट्रीय सम्मलेन
दिनांक  व्  नवम्बर २०१४ को दिल्ली में रिलेटिव इकोनॉमिक्स का   वां संमेलन आयोजित किया गयाइसअवसर पर आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा की अर्थशास्त्रियों को भी जीवन मूल्यों और जीवन दर्शन को अपनीयोजनावों का आधार बनाना चाहिएइसी अवसर पर पधारे विविध विषय विशेषज्ञों ने भी इस बात को माना की आजएक ऐसे आर्थिक ढांचे की जरुरत है जिसमे हम मानव जीवन  मूल्यों को आधार बना कर अपनी योजनाएं बनायें की योजनाओं को बनाते समय  मानव मूल्यों को नजर अंदाज करेंइसी सम्मलेन में मैंने रिलेटिव इकोनॉमिक्स केलिए प्रस्तावित रिसर्च और डॉक्यूमेंटेशन सेंटर का प्रारूप प्रस्तुत कियाआज सभी शिक्षा विद यह मान रहें हैं कीरिलेटिव इकोनॉमिक्स की जरुरत है और जैसे ही रिलेटिव इकोनॉमिक्स पर आधारित पाठ्य पुस्तकें उपलभ्ध होंगी,वे उन को लागू कर के युवाओं को एक नयी दिशा देने का प्रयास करेंगे.
योजना निर्माण की नयी प्रणाली
आज फिर से योजना आयोग के पुनर्गठन की बात हो रही हैप्रधान-मंत्री महोदय ने योजना आयोग की जगह पर एकनयी संस्था के गठन की बात कही हैअगर हम अंतरास्ट्रीय स्टार पर देखें तो पाते हैं की १९४५ में स्थापित संयुक्तराष्ट्र ने जीवन के विविध आयामों पर विविध नीति निर्मात्री संस्थाओं का गदहन किया है जैसे १९८८ में ipcc , १९६५में UNDP  आदिफिर भी संयुक्त राष्ट्र आज भी मानवीय मूल्यों को प्रोत्साहित करने वाली एक संस्था की कमीमहसूस कर रहा हैइसी प्रक्रिया में २००६ में एक प्रस्ताव पारित कर मानव अधिकार कौंसिल स्थापित करने काफैसला लिया गयाभारत में भी आज समय की मांग यही है की योजगा बनाने वाली संस्था एक जीवन मूल्यों कोआधार बना कर योजना बनाने वाली संस्था बनेहमें उम्मीद है की हमारे देश में इस प्रकार जीवन  मूल्य आधारितनियोजन की प्रक्रिया की शुरुआत हो जायेगीयही रिलेटिव इकोनॉमिक्स का आधार है.