Sunday, March 13, 2016

इस जंग में हम सब एक हैं

इस जंग में हम सब एक हैं
(वर्ल्ड सॉलिडेरिटी डे स्पेशल) 

 
वर्ष २००६ से २० दिसंबर को विश्व सॉलिडेरिटी डे के रूप में मनाया जा रहा है. इस दिन पूरी दुनिया आपसी फर्क भुला कर एक हो जाती है. मकसद है की दुनिया के सामने जो चुनौतियां हैं उनके लिए हम सब एक हैं. 

पूरी दुनिया के सामने कुछ प्रमुख चुनौतियां हैं और उन चुनौतियों से निपटने के लिए ही मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स बनाये गए हैं जो की हर देश और हर देशवासी को मिलकर हासिल करने का प्रयास करना है.आईये इन मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स की चर्चा करें: - 

कुल ८ प्रमुख लक्ष्य है: - 

१. भयंकर गरीबी को समूल मिटाना 
२. सम्पूर्ण बाल शिक्षा 
३. लिंग आधारित भेदभाव का उन्मूलन 
४. बालमृत्यु को रोकना और बाल कुपोषण आदि समस्याओं को समाप्त करना 
५. मातृ स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए प्रयास करना और स्वस्थ और सुरक्षित प्रसूति की व्यवस्था करना 
६. मलेरिआ, एड्स जैसी भीषण बीमारियों की रोकथाम करना 
७. पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करना 
८. विकास के लिए वैश्विक गठजोड़ बनाना 

इन उपर्युक्त लक्ष्यों को २०१५ तक हासिल करना जरुरी था और इसीलिए इन लक्ष्यों को बड़ी अहमियत दी गयी थी. इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए हम सब का सम्मिलित प्रयास जरुरी है और इसी कारण हर देश और हर देश के नागरिक को मिल कर इन मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स को हासिल करना जरुरी था. लेकिन अफ़सोस है की इन लक्ष्यों को जतना जरुरी था उतना महत्त्व नहीं दिया गया है. 

काश अब भी हम सब इन लक्ष्यों को अपनी पहली प्राथमिकता बना लेवें तो पूरी दुनिया को कितना फायदा होगा. इसके लिए हम सब को मिल कर आवाज उठानी पड़ेगी. हर देश, राज्य, व् स्थानीय सरकार को इन मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स के लिए काम करना चाहिए तभी ये समस्याएं मिट पाएंगी. 

आज भी ये देख के बड़ी हैरानी होती है की देश के नीति निर्माता फिजूल की बहस में संसद का सारा समय नष्ट कर देते हैं लेकिन गरीबी, प्राथमिक शिक्षा, जननी सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य सुरक्षा, व् विकास जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा नहीं कर पाते हैं. ये वो मुद्दे हैं जिन पर उनको अधिक से अधिक चर्चा कर के बेहतरीन फैसले करने चाहिए. सरकार को चाहिए की ऐसा माहोल बनाये की इन क्षेत्रों में निजी क्षेत्र का आना सुगम और आकर्षक बने ताकि ये समयसाये दूर हो सके. सरकार के लिए इन समस्याओं को अपने बल पर मिटाना असंभव है और सरकारें निजी क्षेत्र को आने नहीं देना चाहती (सरकारी रेगुलेटरी सिस्टम निजी क्षेत्र के लिए इतने रोड़े अटकाते है की निजी क्षेत्र परेशान हो कर इन क्षेत्रों में आने के बारे में ही भूल जाते हैं). सरकार को स्वयं एक ऐसा माहौल बनाना चाहिए ताकि निजी क्षेत्र इन क्षेत्रों में आने के लिए प्रेरित हो. 

आप सब जानते हैं की अगर बीएसएनएल के भरोसे ही मोबाइल, इंटरनेट, और सुचना क्रान्ति का विस्तार किया जाता तो अभी भी मोबाइल कनेक्शन ब्लैक में बिकता. ये तो निजी क्षेत्र की भागीदारी थी जसने गाव गाव और गली गली मोबाइल और इंटरनेट की पहुँच बढ़ा दी. 

आज भी दुनिया में सबसे ज्यादा आँखों के आपरेशन निजी क्षेत्र की अरविन्द आई हॉस्पिटल करती हैं न की कोई सरकारी अस्पताल. मतलब ये है की अगर निजी क्षेत्र सरकार के साथ कदम से कदम बढ़ा कर इन क्षेत्रों में काम करना चाहता है तो उसको रोकने की जरुरत क्या है? सरकार चाहते तो स्टैंडर्ड्स तय कर सकती है लेकिन रेगुलेटर या अफसर नियुक्त कर के तो सिर्फ भ्रस्टाचार को ही बढ़ावा मिलेगा और कुछ नहीं होगा. हम सब जानते हैं की जहाँ जहाँ पर सरकारी तंत्र रेगुलेटर की भूमिका निभाता है वहां वहां पर कितना भ्रस्टाचार फैला है. ये तो इतिहास में भी देखा जा सकता है की अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद और अन्य ऐसी ही कई रेगुलेटरी संस्थाओं के कितना अधिकारी रिश्वत लेते हुए पकड़े गए और उनके रिश्वत के भण्डार भी कितना विशाल थे. 
खैर हम मुद्दे पर आएं - अगर हम सब को ये लक्ष्य अपने लक्ष्य लगते हैं (जो लगने चाहिए) तो हम सब को अपने अपने स्तर पर पहल अवश्य करनी चाहिए. असली वैश्वीकरण तभी होगा जब हम सब पूरी दुनिया के साथ मिल कर उन समस्याओं का समाधान करेंगे जो आज पूरी दुनिया की समस्याएं हैं. 
प्रश्न हैं की क्या हमें कोई बता रहा है की हम सब मिल कर काम कर सकते हैं? क्या इसके लिए कोई मंच है? पूरी दुनिया में समस्याएं सामान हैं. हर व्यक्ति के पास समाधान हैं. समाधान भी सामान है. नवाचार उनको लागू करने में ही होना चाहिए. मिल कर प्रयास करेंगे तो समाधान भी चुटकियों का काम है. दुनिया भर के वैश्विक मंच है लेकिन इन समस्याओं के लिए कोई वैश्विक तो क्या प्रादेशिक मंच भी नहीं है. अगर आप को मोदी, या केजरीवाल या राहुल गांधी के खिलाफ आंदोलन चलना है तो पूरी भीड़ मिल जायेगी लेकिन अफ़सोस यही है की अगर आप गरीबी, भुखमरी, भ्रस्टाचार, कुपोषण, और जननी सुरक्षा के मुद्दों पर कुछ काम करना चाहते हैं तो आप एकदम अकेले हैं कोई आपके साथ नहीं है. 
आज किसी भी सरकारी विभाग में या किसी भी सरकारी उद्घोषक की बात सुनिए - वो आपको चेतावनी देगा - "अजनबी से सावधान रहें" "अजनबी बम रख सकता है" "किसी अजनबी पर किसी प्रकार का विश्वास न करें".  हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से घबराने लगा है. इंसानों के बीच रक कर भी जंगल में महसूस कर रहा है. दो हाथ मिल कर हर समस्या को मिटा सकते हैं लेकिन वो दो हाथ मिले कैसे? हर शिक्षित व्यक्ति के दिमाग में दूसरे व्यक्तियों के प्रति डर संशय, और शक कूट कूट कर भर दिया जाता है. इससे तो हमारे अशिक्षित गाव भले. आज भी आप गाव में जाइए - आपके साथ मिल कर लोग हर समस्या का समाधान कर देंगे. 

जरुरत है की आज के दिन को हमारे नीति निर्माता महत्त्व देवे और हम लोगों को मिल कर इन समस्याओं के समाधान का मौका ढूंढने देवे. बिना मतलब उन बेफिजूल की बातों पर हमारा ध्यान न भटकाएँ जिनसे सिर्फ एक राजनीतिक   दल को ही फायदा मिल सकता है न की देश को . कदम उढ़ाईये - पूरी दुनिया आपका साथ देगी. मुद्दे ऐसे लीजिये जो आज हर इंसान को परेशान कर रहे हैं. कदम कदम बढाए जा - उसी के गीत गाये जा, ये जिंदगी है कौम की तो कौम पे लुटाए जा.

विकास के रास्ते या विनाश की तैयारी ?

विकास के रास्ते या विनाश की तैयारी ?


विकास हर सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए और लिहाजा भारत सरकार भी विकास के एक मॉडल पर कार्य कर रही है. विकास का ये मॉडल चीन, सिंगापुर, और अन्य विदेशी मॉडल पर आधारित  है. यही   वो   बात   है जिसके कारण मेरे जैसे कुछ लोग इस विकास के मॉडल का विरोध कर रहे  हैं . हालांकि मैं यह जानता हूँ की आप और मुझ जैसे कुछ लोगों  की सोच को आज सुनने वाला कोई नहीं हैं लेकिन fir भी अगर हम सब  चुप  रहेंगे  तो यह भी उचित नहीं है. 
चीन  के विकास  का आधार बड़े उद्योग हैं और इस के लिए उसने  बड़े उद्योगों को बड़े पैमाने पर सुविधाएं प्रदान की है. चीन के इस मॉडल के परिणाम से प्रभावित हो कर भारत सरकार भी विकास के उसी मॉडल को लागू करने के लिए प्रयास कर रही है. चीन और भारत में फर्क है. भारत में गाव गाव में फैली हुई एक अद्भुत समृद्ध परम्परा है जिसको आर्थिक सम्बल की जरुरत है लेकिन जो अपने आप में सक्षम है. भारत की इस विविधता भरी सांस्कृतिक विरासत के कारण ही भारत पूरी दुनिया में अलौकिक और अप्रतिम है. इस वर्तमान व्यवस्था को अगर समुचित तकनीकी और व्यवस्थागत मदद प्रदान कर दी जाए तो ये हमारे विकास के लिए अद्भुत ढांचा है जो सिर्फ आर्थिक ही नहीं समाजशास्त्रीय और मनोविज्ञानिक आधार पर भी अद्भुत होगा. विकास के एक ऐसे मॉडल जो की भारत के विविधता से पूर्ण व्यवस्था को इसकी ताकत बना सके तो वो अपने आप में सक्षम होगा और पूरी दुनिया में हमें अलग स्थान देगा. 
प्रश्न है की हमारे देश की आधी जनसँख्या जो गावों में रह रही है उसको शहरों में मजदूर बना कर कैसा विकास होगा? प्रश्न है की हमारे देश की आधे से ज्यादा जनसँख्या जो कृषि, पशुपालन और इस प्रकार के कार्यों में लगी है उसको उद्योग धंधों और सेवा क्षेत्र में डालने के सरकार के सपने में kitna वजूद है? सरकार चिंतित है की ग्रामीण  जनता के पास स्किल्स की कमी है (ऐसा सरकार मानती है मैं नहीं) और इसीलिए उस जनता को स्किल ट्रेनिंग सरकार के सामने बड़ी चुनौती है. 
मैं अगर सरकार के विकास के मॉडल और मेरी सोच को एक तुलना के रूप में प्रस्तुत करूँ तो इस प्रकार होगा : - 

सरकार : - 
बड़े उद्योग, बड़े शहर, बड़ी सड़कें,लेकिन गाव और ग्रामीण विकास के लिए कोई योजना नहीं. बहुत बड़ी कंपनियों के सहारे विकास की उम्मीद. विदेशों की जरुरत का सामन बनाने के केंद्र के रूप में विकास. ऐसी तकनीक का विकास जो बड़े उद्योगों के लिए कारगर हो. 

मेरा मत : छोटे उद्योगों और उद्योगों के क्लस्टर के विकास पर बल दिया जाना चाहिए जिससे की छोटे छोटे उद्योग fail सकें और ऐसी तकनीक का विकास हो जो छोटे छोटे उद्योग आसानी से लागू कर सकें. ये उद्योग ज्यादा सृजनशील, परिवर्तनशील और ज्यादा तेजी से परिवर्तन को लागू कर पाएंगे और भविष्य के लिए ज्यादा उपयुक्त होंगे. इनमे भारतीय लोगों की उद्यमिता भी सफल हो पाएंगी और कोई स्किल गैप या स्किल ट्रेनिंग की जरुरत नहीं पड़ेगी. उद्योगों के क्लस्टर के साथ ही परंपरागत उद्योगों, पशुपालन और कृषि को सम्बल ताकि लोग आसानी से अपने परम्परागत उद्योगों में विकास कर सकें  और गावों में रहते हुए ही जीवन का आनंद भी ले सकें और आर्थिक प्रगति भी पा सकें. 

सरकार सिर्फ जीडीपी की प्रगति पर ही अपनी नजर लगाये हुए है. सरकार किसी भी तरह से चीन की १०% की जीडीपी की बढ़ोतरी को छूना चाहती है. जीडीपी पर ज्यादा ध्यान देने से लोगों के विकास और अमन और आनंद की तरफ ध्यान नहीं de पाएंगे. अर्थशाश्त्र आर्थिक प्रगति को ही ज्यादा तबज्जु देता है लेकिन असल में लोग ख़ुशी और आनंद की तलाश कर रहे हैं जो तभी संभव है जब विकास का एक ऐसा मॉडल लागू किया जाए जो लोगों को उनके सपनो को हासिल करने में मदद कर सकें और उनको अपने जहाँ में स्वर्ग बनाने में मदद कर सके. 

सरकारी मॉडल पर नजर डालें तो पाएंगे की जिस प्रकार की शिक्षा और स्किल ट्रेनिंग सरकार फैलाना चाहती है वो हमें सिर्फ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए और बहुत बड़ी कम्पनियों के लिए ही तैयार कर सकती है. जरुरत है की लोगों को उनके वर्तमान परिवेश (अगर वो गाव में रहते हो तो गाव में) में ही अधिक योगदान देने के लिए सक्षम बनाने की जरुरत है अतः सरकारी नीतियों से ये संभव नहीं लगता है. सरकार ने जब नीति आयोग बनाया था तो एक उम्मीद हुई थी की शायद भारत की पृष्ठभूमि में भारतीय विकास का मॉडल लागू किया जाएगा लेकिन नीति निर्माता विकास के विदेशी मॉडल्स से इतने प्रभावित है की शुद्ध भारतीय विकास मॉडल की उम्मीद करना भी मुश्किल है. 

विकास के इस मॉडल को लागू करने से हमारे गाव और छोटे शहर और उनकी विविधता की संस्कृति संकट में पद जायेगी. छोटे और कुटीर उद्योग मुशिकल का सामना करेंगे. अद्भुत भारतीय परम्पराओं और रीति रिवाजो की जगह एक जैसा माहौल देखने को मिलेगा जो बड़ी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए तो मददगार होगा पर उसमे न तो उद्यमिता और न सृजनशीलता के लिए कोई जगह होगी. प्रश्न है की क्या ये ही हमारा विकास का मॉडल होना चाहिए. 

किसी भी गाव में जाइए - गरीब से गरीब व्यक्ति के पास भी गाय है, छोटा - मोटा खेत है और परिवार का जुड़ाव है जिसमे वो जीवन का आनंद प् सकता है. अगर सरकार उसके लिए गो-पालन आसान बनती या पशुपालन के लिए कोई मदद प्रदान करती या छोटे स्तर पर कृषि के लिए कोई मदद प्रदान करती तो शायद उस व्यक्ति को आनंद आता. लेकिन सरकार की प्राथमिकता अलग है और इस कारण उस व्यक्ति को अपने खेत - खलिहान और पशुधन को छोड़ कर उद्योगों में मजदूर बन कर शहर कीतरफ पलायन करना पड़ेगा और शहर में अपना आशियाना बनाने के लिए पूरी जिंदगी संगर्ष करना पड़ेगा. 

प्रश्न है की अगर आप और मुझ जैसे लोग अलग सोच रखते हैं तो हम क्या कर सकते हैं? विकास के इस मॉडल को बदलने का अब कोई उपाय नहीं दिख रहा है. जब तक नीति निर्माता नहीं चाहेंगे विकास का शुद्ध भारतीय मॉडल लागू नहीं हो पायेगा. 

दाल अपनाईये - स्वास्थ्य सुधारिये

दाल अपनाईये - स्वास्थ्य सुधारिये
(यु एन दालों के लिए  अंतरास्ट्रीय वर्ष के विशेष सन्दर्भ में)
 वर्ष २०१६ नयी चुनौतियां ले कर  रहा हैहम भारतियों के लिए अपनी संस्कृतिअपनी सभ्यता को अंतरास्ट्रीय मंच पर स्थापित करने के लिए ये एक सुनहरा वर्षहोगाहम भारतियों के लिए अपनी अद्भुत परम्पराओं को बनाये रखने और अपनी जनता की मौलिक जरूरतों पर ध्यान देने की चुनौती भी है तो एक सुअवसर भी है.भारत आज भी सांस्कृतिक क्षेत्रों में पूरी दुनिया का मार्गदर्शन कर सकता हैपर यह भी जरुरी है की हम इस बात को नजरअंदाज  करें की आज हमारे देश में हर तीसराव्यक्ति गरीबी की रेखा से नीचे रह रहा है और फिलहाल हमारी प्राथमिकता उस व्यक्ति को राहत देने और उसको इज्जत की दालरोटी खाने में मदद करने की हैइसमेंसबसे बड़ी चुनौती है बढ़ती हुई महंगाई पर लगाम लगाने कीइधर दालों के दाम आसमान को छू रहे हैं उधर लगता है की आम आदमी को दाल - रोटी का साथ छोड़नापड़ेगाअमीरों के पसंदीदा उत्पाद (जैसे कारसोना आदिसस्ते हो रहे हाँ लेकिन गरीबों का पंसदीदा उत्पाद दाल महंगा हो रहा हैअगर इसी तरह से दाल के दाम बढ़ते रहेतो दाल को लोग केसर की तरह इस्तेमाल करेंगे और "दाल - रोटीएक अमीरों का भोजन बन जाएगा.
वर्ष २०१६ अंतरास्ट्रीय वर्ष है दाल कापूरी दुनिया में दाल का सबसे ज्यादा उपभोग आज भी भारत में ही होता हैक्या कारण है दाल के दाम में लगातार बढ़ोतरी के ?अफ़सोस है की दाल का उत्पादन कम हो रहा है क्योंकि दाल की जगह पर किसान अन्य व्यावसायिक फसलों को उगाने लगे हैंदाल का उपभोग भी कम होने लगा है.१९५१ में प्रति व्यक्ति ६० ग्राम के लगभग प्रतिदिन का उपभोग होता थाजो अब घाट कर आधा रह गया हैदाल के उपभोग के कम होने के दो कारण है - बढ़ते दामऔर बदलता उपभोगपिछले वर्ष दाल के उत्पादन में १२की कमी आईइससे आयात को बढ़ाना पड़ा.
भारत में अलग अलग जगह पर अलग अलग तरह की दाल की खेती होती है और अलग अलग प्रकार की दाल के उपभोग का प्रचलन हैपूर्वी भारत में मसूर की दाल,दक्षिण में उड़द दालमध्य भारत में चना और मूंग दालउत्तरी भारत में अरहर  तो पश्चिमी भारत में मोठ ज्यादा प्रचलित हैनयी पीढ़ी में दाल के प्रति रुझान कम होरहा हैहमें दाल को फिर से लोकप्रिय बनाना हैएक समय में दाल लोगों के भोजन का एक चौथाई हिस्सा होता थाअब दाल की जगह पर अन्य खाद्य पदार्थ उपयोगहोने लगे हैंलेकिन दाल की पौष्टिकता और स्वास्थ्यवर्धक गुणों का कोई भी मुकाबला नहीं है.

कानपुर में भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान है जो दाल की नयी नयी किस्म की फसल तैयार करने के काम में जुटा हैआज जरुरत है की इस तरह की कई संस्थानकी शुरुआत हो ताकि अधिक से अधिक कृषि वैज्ञानिक दाल के उत्पादन बढ़ने के तरीकों को ईजाद कर सकेंअरहर के दाम २००/- प्रति किलो हो रहे हैं तो कानपुर की इससंस्थान ने आइपीए २०३ नामक एक नयी किस्म (अरहर की दालईजाद की है जसमे प्रति हेक्टेयर उत्पादन लगभग २० क्विंटल (दूसरी किस्मों से दुगुना उत्पादनजाता हैहिसार की चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय ने भी मूंग दालचना दालऔर उड़द दाल की नयी क्सिमों को ईजाद किया हैअब इन किस्मों को किसानों मेंलोकप्रिय बनाने की जरुरत है और किसानों को दाल को अधिक क्षेत्र में उगाने के लिए प्रेरित करने के लिए आसान ऋण और आसान सहायता उपलभ्ध करवाने के जरुरतहैदालों का उत्पादन गिर कर १७ मिलियन मेट्रिक टन हो गया है जब की जनसंख्या लगातार बढ़ती जा रही है.
दाल  सिर्फ स्वाद और स्वास्थ्य के लिए श्रेष्ठ है बल्कि इसमें इतने तरह के व्यंजन बनाने की संभावनाएं है  की ये हमारे खाद्य उद्योग के लिए भी एक मजबूत आधारहैदाल की कई किस्में तो सिर्फ एक प्रदेश में ही मिलती है और दूसरे प्रदेश तक पहुँच ही नहीं पाती हैजैसे वाल गुजरात में लोकप्रिय है लेकिन अन्य जगह पर मुश्किलसे मिलती हैआज फिर से दाल और इसके महत्त्व को जानने के लिए पूरा विश्व एक साथ है और भारत को इस समय नेतृत्व की भूमिका निभानी है और भारतीय कृषिवैज्ञानिकों के लिए ये चुनौती भी है तो अवसर भी है.
ये  समझो  और  समझाओ  थोड़ी  में  मौज  मनाओ
 दाल -रोटी  खाओ  प्रभु  के  गुण  गाओ
ज्वार भाटा (१९७३फिल्म का ये गाना फिर से प्रासंगिक हो गया है

जरुरत है बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन की

जरुरत है बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन की 

(भारत में नेशनल गर्ल चाइल्ड डे 24 January पर विशेष ) 

बालिकाओं की स्थिति सुधारने के लिए उनको शिक्षित और स्वावलम्बी बनाना पड़ेगा. उनको इतना मजबूत बनाना पड़ेगा की कोई उनकी तरफ गलत इरादे से देख भी न सके. लेकिन उसके लिए हमें हमारे शिक्षा के ढाँचे में सुधार करना पड़ेगा. बालिकाओं की स्थिति सुधरेगी तभी सही अर्थ में विकास संभव हो पायेगा. राजस्थान में आज भी ऐसे गाव हैं जहाँ पर कई किलोमीटर तक बालिका विद्यालय (और बालिका महाविद्यालय की तो क्या बात करें)  नहीं मिलते हैं. सड़कें टूटी हुई हैं जिससे यातायात में देर बहुत लगती है. टूटी फूटी सड़कों के बीच महज २० किलोमीटर जाने में २ घंटे लग जाते हैं. ऐसे मैं कैसे बालिकाएं शिक्षा प्राप्त करें? बालिकाओं को मजबूर हो कर  स्कुल / कॉलेज से पढ़ाई छोड़नी पड़ती हैं. हर गाव और हर ढाणी में प्राथमिक विद्यालय हो और हर गाव में बालिका विद्यालय हो. इस हेतु कोई ढोस प्रयास जरुरी है. अभी तो स्कूलों में बालिकाओं के लिए अलग से टॉयलेट भी नहीं मिलता है. जब इन प्राथमिक उद्देश्यों के लिए बजट नहीं होता है तो समझ लेना चाहिए की सरकार की प्राथमिकताओं में परिवर्तन की जरुरत है. 
राजस्थान में विकास की डींग  हांकती सरकारों से मेरा विनम्र निवेदन है की वे धरातल पर आएं और जमीन पर विकास के काम की स्थिति को देखें. वे जब तक विकास के काम को प्राथमिकता नहीं देंगे विकास नहीं होगा. जनता ने उनको ५ साल का मौका दिया है और ५ साल में अगर वे चाहते हैं तो राजस्थान स्वर्ग बन सकता है लेकिन क्या उसके लिए वे आम आदमी की बात को सुनने के लिए तैयार हैं? क्या उनके पास कुछ करने की इच्छा शक्ति है? 

पुरे भारत में महिला शिक्षा और बालिका शिक्षा के मामले में राजस्थान सबसे पीछे हैं. पुरे भारत में महिला शिक्षा की दर सबसे कम राजस्थान राज्य में है. क्या ये गर्व करने की बात है  या नजरअंदाज करने की बात है? २००१ से २००१ में सिर्फ एक ही राज्य ऐसा था जिसमे अनपढ़ महिलाओं की संख्या में बढ़ोतरी हुई - राजस्थान में अनपढ़ महिलाओं की संख्या १.२३ करोड़ से बढ़ कर १.३२ करोड़ हो गयी और महिला शिक्षा का ये हाल आज भी वाही है. क्या एक ऐसे राज्य में जहाँ की मुख्य मंत्री भी महिला हो - इस प्रकार की स्थिति को आप बर्दाश्त करेंगे? आप तुरंत पूछेंगे क्या हो रहा है अब? जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे के विकास और ग्रामीण विद्यालयों और महाविद्यालयों के विकास के लिए कोई प्रयास नहीं होंगे - बालिका शिक्षा में प्रगति नहीं हो पाएगी. आज उच्च तकनीक के बावजूद भी हम ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और सॅटॅलाइट की मदद से उच्च शिक्षा नहीं फैला सकते हैं तो ये सरकार की असफलता है. 

मैं केरल से तुलना नहीं करूंगा क्योंकि आप कहेंगे तुलना बराबर वालों से होनी चाहिए. पडोसी राज्यों को लेंगे तो भी हम बहुत ही पीछे हैं. गुजरात में कब से मुफ्त कन्या शिक्षा है? गुजरात में कब से शिक्षण संस्थाओं को सरकार का सम्बल मिल रहा है? चलिए बिहार से तुलना करते  हैं . बिहार में अब सिर्फ १०% स्कूलों में पीने के स्वच्छ पानी की व्यवस्था नहीं है और वो समस्या भी अब दूर हो जायेगी. बिहार में बड़े पैमाने पर स्कूलों में सुधार का कार्यक्रम चल रहा है. विकास के इस कार्य के लिए बिहार सरकार खुल कर निजी क्षेत्र को भी आमंत्रित कर रही है ताकि सब मिल कर के विकास कर सकें. बिहार जिसमे एक समय में कन्या  शिक्षा  की सबसे सोचनीय स्थिति थी वो अब जल्द ही राजस्थान से आगे निकल जाएगा क्योंकि महिलाओं में इफेक्टिव लिटरेसी रेट अभी राजस्थान में  ४९% के लगभग है और सरकार की तरफ से जब तक कोई ढोस प्रयास नहीं होगे तो विकास की उम्मीद कम ही है. सरकारी महकमों की कार्य करने की शैली में कोई सुधार दिख नहीं रहा है लेकिन बिहार में नितीश सरकार से प्रशाशनिक सुधार की उम्मीद की जा रही है. 

बालिका शिक्षा के लिए जरुरी है की राजस्थान में सरकार अपनी नीतियां बदले. सिर्फ मुख्यमंत्री के स्वागत के लिए शहर को सुसज्जित करने की नीति को त्याग कर के वास्तविक विकास और ग्रामीण विकास के लिए कोई कदम उढाये. जहाँ जहाँ मुख्यमंत्री जाएंगी वहा वहा पर सड़क बनेगी - ये तो कोई नीति नहीं होती. ग्रामीण क्षेत्रों में पिछले ८-१० सालों से सड़कों के लिए कोई प्रावधान हैं नहीं हो पाया है. क्या चाहती है सरकार? बालिका शिक्षा के लिए सबसे पहले तो इंफ्रास्ट्रक्चर की बात करते हैं. कितने गाँव में बालिका विद्यालय है? कितने गावों में बालिका शिक्षा के लिए विशेष प्रावधान हैं. बालिका महाविद्यालय खोलने के लिए क्या प्रोत्साहन है? 

एक फैक्ट्री खोलने के लिए सिंगल विंडो क्लीयरेंस मिलता है (अगर आप नॉन-रेजिडेंट हैं तो ) - पर क्या बालिका शिक्षा के लिए या बालिका महाविद्यालय के लिए सिंगल विंडो क्लियरेंस है. क्या सरकारी महकमे बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए अपने मानदंड और अपने नियम सुधार सकते हैं? क्या शिक्षा मंत्री व् शिक्षा से जुड़े अन्य अधिकारी बालिका शिक्षा के लिए जूनून रखते हैं. 

कुछ अफ़्रीकी देशों के शिक्षा मंत्रियों से मिलने का मौका मिला था उनका शिक्षा को फैलाने का जूनून देख कर मैं हैरान रह गया. काश उतना जूनून हमारे यहाँ के लोगों में हो - तो फिर राजस्थान को स्वर्ग बनाने में क्या देर लगे? अफ़्रीकी देश के एक शिक्षा मंत्री ने मुझ से कहा की वो अपने विद्यार्थियों को आगे की पढ़ाई करने के लिए किसी भी देश में भेजने को तैयार हैं. उसका सारा खर्च करने को तैयार हैं. वो लोग शिक्षा के क्षेत्र में अपने लोगों को आगे आने के लिए कह रहे हैं. हमारे नेता अगर उनसे कुछ सीख ले तो बहुत विकास हो सकता है. यहाँ तो मुझ जैसा शिक्षाविद कभी अपनी स्कुल या कॉलेज खोलने की सोच भी नहीं सकता है क्योंकि नेताओं की तरफ से कोई सहयोग की गुंजाइश नहीं है और वर्तमान ढाँचे में शिक्षा के क्षेत्र में लाइसेंस  राज के चलते सरकार से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना बहुत ही मुश्किल कार्य है. मुझे पता नहीं शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े राज्य राजस्थान में ऐसी नीतियों का क्या कारण है? 

मुस्कुराइए - दिल से

मुस्कुराइए - दिल से 

मैंने ऐसा कई लोगों को देखा है जो हर हाल में खुश रहते हैं. कोई भी परिस्थिति उनको विचलित नहीं कर सकती. कोई भी स्थिति उनको क्रोधित नहीं कर सकती. कोई भी परिस्थिति या कोई भी इंसान उनको उद्वेलित नहीं कर सकती. ये लोग न सिर्फ खुश रहते हैं बल्कि दूसरों को भी खुश रहना सीखा देते हैं. ऐसे लोगों के साथ रहने से आप भी खुश रहना सीख जाएंगे. ये लोग वाकई हमारी दुनिया को स्वर्ग में बदल सकते हैं. इनके पास वो हुनर है जो अद्भुत है. पर ऐसे लोग सब क्यों नहीं हो सकते? शायद परिस्थितियां, माहौल, जीने का तरीका आदि. आस्ट्रेलिया के निक यूजीविक नामक व्यक्ति के न तो हाथ हैं न पैर. पहले तो वो बहुत विचलित रहते थे लेकिन फिर उन्होंने खुश रहने और जोश से जीवन जीने की कला सीख ली. आज वो पूरी दुनिया में लोगों को जीवन जीने की कला सीखा रहे हैं. 

खुश रहने वाले लोग कुछ मामलों में हमसे अलग होते हैं जैसे :- 
वो जीवन को सिर्फ हार और जीत की लड़ाई नहीं बल्कि एक खूबसूरत तोहफा मानते हैं
वो जीवन का मकसद कोई प्रतिस्पर्धा जितना या कोई अवार्ड जितना नहीं बल्कि किसी अच्छे मकसद के लिए कार्य करना मानते हैं. 
वो हर असफलता या हर विपरीत परिस्थिति में भी कोई न कोई अच्छी बात ढूंढ़ लेते हैं और जीवन को हर हाल में ख़ुशी से जीते हैं. 
वो स्वाभाविक और प्राकृतिक जीवन जीते हैं और हर पल का खुल कर लुत्फ़ उठाते हैं. 
 
समूह में रहने वाले सभी प्राणी आपसी तालमेल, और एक दूसरे के लिए मोहबत के गुण अपने परिवेश और अपनी परवरिश में सीख जाता है - चाहे वो हाथी हो या छोटी सी मधुमक्खी. कबीले में रहने वाले इंसान ने भी इस कला को अपनाया और आगे से आगे हर पीढ़ी की सिखाया. लेकिन आज के हमारे विकसित इंसान ने उस विरासत को नहीं पचाया है और शायद अब वो कला लुप्त हो रही है. लिया डिस्किन नामक एक समाज-वैज्ञानिक ने आदिवासी जनजाति (अफ्रीका में कबीलों में रहने वाले लोग) के बच्चों के साथ बिताया खूबसूरत समय बताते हुए एक यादगार किस्सा सुनाया: (यह किस्सा उबन्टु नाम से प्रसिद्द है क्योंकि उन विद्यार्थियों ने यह शब्द काम में लिया था)  - 
उसने विद्यार्थियों को एक पाकेट में कुछ चॉकलेट डाल कर दी और उनमे प्रतिस्पर्धा करवाई की जो भी पहले दौड़ कर के पहुंचेगा वो चॉकलेट खायेगा .  प्रतिस्पर्धी मानसिकता के आज के लोगों के लिए ये आम बात है. लेकिन लिया ये देख कर दांग रह गयी की कोई भी न तो जीता न हार. सब बच्चों ने एक साथ हाथ से हाथ पकड़ के दौड़ लगायी और चॉकलेट को मिल बाँट कर खायी. जब लिया ने बच्चों से पूछा की उन्होंने प्रतिस्पर्धा क्यों नहीं की तो उसको जवाब मिला की "अगर एक भी बच्चा उदास होगा तो बाकी लोग खुश कैसे हो सकते हैं इसलिए सबकी ख़ुशी जरुरी है". वाकई में उन आदिवासियों को जीवन जीने की कला आती है. वाकई में हमें उनसे सीखने की जरुरत है. 

तथाकथित आधुनिक शिक्षा में पले हम लोग इस कहानी के मर्म को नहीं समझ सकते हैं. हमें तो सिर्फ प्रतिस्पर्धा ही सिखाई गयी है और वो ही हम करते रहते हैं. जीवन को जीने की कला तो भूल चुके हैं. कहीं हम आधुनिक शिक्षा के नाम पर अशिक्षित तो नहीं कर रहे हैं? 

मिंकोव व् बांड नामक वैज्ञानिकों ने अपने १४ साल के पूरी दुनिया के अध्ययन के बाद साबित करने का प्रयास किया है की कुछ देशों (जैसे नाइजीरिया, घाना, मेक्सिको आदि) के लोग आम तौर पर ज्यादा खुश रहते हैं. इन लोगों के डीएनए में कुछ ऐसे तत्व मिले जो उनकी खुशु से जुड़े हैं. वहीँ चीन, हांगकांग, सऊदी अरब जैसे संपन्न देशों के लोगों में खुश रहने की कला और उनके डीएनए में खुशु से जुड़े हुए तत्व नहीं मिले. कहीं वो लोग जिनको हम अल्प-विकसित देश कहते हैं - हमसे जयदा विकसित तो नहीं है? कहीं तथाकथित विकास के साथ हम खुश रहने की कला तो नहीं भूल रहे हैं? कहीं इस भौतिक विकास के साथ हम आत्मीयता, खुश रहने की कला, और आपसी मेल जोल को तो नहीं भुला रहे हैं? 

मेरे एक मित्र ने कहा की "बड़े शहरों के तथाकथित समृद्ध लोगों की तुलना में छोटे छोटे गावों के साधारण लोगों को खुल कर हंसना, खिल खिलाना और हंसी मजाक कर मनो-विनोद करना ज्यादा आता है ". कहीं समृद्धि के इस रास्ते पर हम अपनी खिलखिलाहट को तो कुर्बान नहीं कर रहे हैं? कहीं हम अपनी अगली पीढ़ी को प्रतिस्पर्धा और आपसी रंजिश में प्रशिक्षित कर उसकी मौलिक इंसानियत का तो गाला नहीं घोंट रहे हैं ? 

हम सब अगर चाहे तो फिर से हंसना, मुस्कुरुआना और खुश रहना सीख सकते हैं और सीखा सकते हैं. फिर सब कुछ बदल सकता है. ज्ञान विहार यूनिवर्सिटी जयपुर में नाइजीरिया और अन्य देशों से आये कुछ विद्यार्थियों ने स्माइल्स कम्युनिटी नामक एक ग्रुप शुरू किया है जिसमे वो हर व्यक्ति को मुस्कुराने के लिए प्रेरित करते हैं और उसके लिए माहौल बनाते हैं. अगर किसी को कोई परेशानी हो तो ये ग्रुप उसकी वो परेशानी दूर कर उसको मुस्कुराने के लिए विवश कर देगा. काश हम सब इस तरह के ग्रुप बनाना शुरू करदें और हमारा मकसद ही स्माइल कम्युनिटी की तरह खुशियां फैलाना हो जाए. 

विद्यार्थियों को सामजिक उद्यमिता के विचार परोसिये

विद्यार्थियों को  सामजिक उद्यमिता के विचार परोसिये 


हर विद्यार्थी एक अद्भुत प्रतिभा है. अगर उसको मार्गदर्शन देंगे तो वो भविष्य की गारंटी है. अगर उसको प्रोत्साहित करेंगे तो वो विद्यार्थी बेहतरीन कार्य करने के लिए प्रेरित होगा. हर स्कुल और कॉलेज को चाहिए की विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए लगातार प्रयास करें. ये ही तो कार्य है हर स्कुल और कॉलेज का. सिलेबस पूरा करना नहीं बल्कि विद्यार्थी को प्रोत्साहित कर एक बेहतरीन व्यक्तित्व की नीव रखना ही तो मकसद है हर स्कुल और कॉलेज का. 
अधिकाँश शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थी को प्रोत्साहित करने और समाज के लिए कुछ करने के लिए कोई प्रावधान नहीं होता है. हर शिक्षण संस्था को लगता है की सिलेबस पूरा करवाना ही उनका मकसद है और अगर कुछ विद्यार्थी मेरिट में आ गए तो फिर तो उन्होंने अपने मकसद को शानदार ढंग से पूरा कर लिया. फिर तो वो अपना इतना गुणगान करते हैं की आप हर तरफ उनके होर्डिंग्स और विज्ञापन देख सकते हैं. लेकिन क्या सिलेबस के बोझ तले विद्यार्थी समाज के लिए सृजनशील और क्रांतिकारी विकास के बारे में सोच पायेगा? अत्यधिक कॅरियर ओरिएंटेशन स्कुल और कॉलेज के स्वयं के लिए तो अच्छा है पर क्या ये समाज के लिए भी अच्छा है? इतने कॅरियर ओरिएंटेड विद्यार्थी तो अपने परिवार और अपनों के लिए भी समय नहीं निकालेंगे - तो देश और समाज के लिए क्या सोचेंगे? अगर देश और समाज के लिए हम कुछ करना चाहते हैं तो उसकी शुरुआत स्कुल और कॉलेज में विद्यार्थी के मन में सामाजिक उद्यमिता के बीजारोपण से ही होनी चाहिए. जहाँ जहाँ पर विद्यार्थियों को सामाजिक कार्य करने और सामाजिक उदयमिता के लिए प्रेरित किया जाता है वहां वहां पर भविष्य में सामजिक उद्यमियों की बहार आ जाती है. फिर एक ऐसा माहौल बन जाता है की हर व्यक्ति समाज के लिए कुछ अद्भुत और अलग करना चाहता है और इस प्रकार सामाजिक विकास का एक नया दौर शुरू हो जाता है. 
हाल ही में अजमेर के अमर शाश्त्री ने अपने महाविद्यालय में मुझे बुलाया. उन्होंने मुझे विद्यार्थियों से सोशल इनोवेशन पर बातचीत करने के लिए बुलाया था. मैंने उनसे पूछा का वो ये प्रोग्राम क्यों आयोजित करते हैं? उन्होंने कहा की वो इस प्रकार के कार्यक्रम लगातार आयोजित करते हैं क्योंकि ये ही उनका मकसद है. मैं शिक्षा के प्रति उनके समर्पण और निष्ठां को देख कर हैरान रह गया. बड़े बड़े स्कुल और कॉलेज वो काम नहीं कर रहे जो श्री अमर शाश्त्री कर रहे हैं. इस प्रकार से वो शिक्षा के क्षेत्र में अद्भुत योगदान दे रहे हैं. उनके महाविद्यालय में जब मैंने विद्यार्थियों को सोशल इनोवेशन पर व्याख्यान दिया तो मुझे लगा की विद्यार्थी जबरदस्त उत्साह से भरे हुए है. व्याख्यान के बाद कई विद्यार्थी अपने नवाचार के बारे में मुझसे बात करने के लिए आये. कई विद्यार्थियों ने समाज के विकास के लिए अद्भुत योजनाये बनाई. ये सब इस लिए संभव हुआ क्योंकि उनकी शिक्षण संस्था ने उनको एक ऐसा माहौल प्रदान किया जिसमे वे कुछ नवाचार करने का सोच सकते हैं और मिल कर कुछ नया कर सकते हैं. उनकी शिक्षण संस्था ने वो कार्य किया जिसके लिए हर शिक्षण संस्था को प्रयास करना चाहिए. 
हाल ही में बिहार सरकार ने एक नवाचार किया है. अब वहां पर हर बालक अपने पिता को शराब न लेने की शपथ दिलवाएगा. विद्यार्थियों की अद्भुत ताकत को काम में लेने का प्रयास हो रहा है. लेकिन ये प्रयास तो तभी रंग लाएगा जब हर स्कुल और कॉलेज में सामाजिक चेतना का माहौल बनाया जाए ताकि विद्यार्थी इस प्रयास के मर्म को समझ सके. गुजरात में पहले इस प्रकार के कई सफल प्रयास हो चुके हैं और उनकी सफलता का आधार उस शिक्षण संस्था में अपनाया गया सामाजिक चेतना का माहौल था. 

अब्दुल कलाम जैसे महत्व वैज्ञानिक किसी बड़े स्कुल से नहीं बल्कि एक साधारण से दिखने वाले लेकिन असाधारण स्कुल से ही निकलते हैं. ऐसे महान लोग जिस स्कुल में पढ़ कर निकलते हैं उस  स्कुल में भले ही बहुत शानदार भवन आदि न हो लेकिन हर कदम पर विद्यार्थी को व्यक्तिगत स्तर पर समाज के लिए कुछ अच्छा करने के लिए प्रोत्साहित किया गया जिस के कारण सामाज के लिए सोच और समाज के लिए सृजनशीलता की नीव पड़ी. 
ऐसे कई पब्लिक स्कुल हैं जहाँ पर विद्यार्थी को बार बार ये रटाया जाता है की उनकी जिंदगी का मकसद पैसा कामना है और खूब पैसे वाला इंसान बनना है. ऐसे कई पब्लिक स्कूल हैं जहा पर विद्यार्थी के मन मस्तिष्क में सफलता का पैमाना दाल दिया जाता है. विद्यार्थी के कोमल मन को जैसे भी चाहें आप ढाल सकते हैं. आप जैसे चाहे विद्यार्थी को तराश सकते हैं. ये तो आप के ऊपर है की आक उनको समाज के लिए सोचने के लिए प्रेरित करते हैं या फिर सिर्फ अपने लिए सोचने के लिए उकसाते हैं. ये तो शिक्षण संस्था पर है की उसको महामानव बनाया जाता है या उसको  कॉम्पिटिटिव इंसान बनाया जाता है. सामजिक उद्यमिता के संस्कार सिर्फ बचपन में ही परोसे जा सकते हैं.  
हर माँ बाप अपने बच्चे के लिए महँगी से महँगी स्कुल और कॉलेज खोजते हैं. लेकिन ये तो वो नहीं देख सकते की स्कुल और कॉलेज में कैसे संस्कार परोसे जा रहे हैं. वो तो भवन, साज सज्जा, और स्कुल की संरचना देख कर निर्णय ले लेते हैं. लेकिन ये तो फिर स्कुल और कॉलेज के ऊपर निर्भर करता है की वो सिर्फ सिलेबस पूरा करवाने का मंच है या विद्यार्थियों में चेतना फैलाने का मंच. माँ - बाप को स्कुल के कार्य का परिणाम उनके बुढ़ापे में मिलता है. अगर उन्होंने एक अच्छे स्कुल में अपने बच्चे को पढ़ाया है तो उनका बच्चा बुढ़ापे में उनके और पुरे समाज के बारे में सोचता है और उनके लिए बुढ़ापे का सहारा बन जाता है. और अगर कॅरियर ओरिएंटेड सिलेबस पूरा करवाने वाले स्कुल में बच्चों को पढवाया  ये तो बुढ़ापे में बच्चे पास भी नहीं आयेगे. ऐसे में उन माँ बाप का बुढ़ापा बड़ा कष्ट-मय हो जाएगा. उनको ये भी नहीं पता चल पायेगा की "जैसी करनी वैसी भरणी" यानी उन्होंने गलत स्कुल / कॉलेज को चुना था और उस स्कुल और कॉलेज के करिये ओरिएंटेशन ने उनके और समाज के सपनों को चकनाचूर कर दिया. 

कौन जिम्मेदार है इस बेरोजगारी के लिए ?

कौन जिम्मेदार है इस बेरोजगारी के लिए ? 

इस देश में हर वर्ष  लगभग १ से १.५ करोड़ लोग चाहिए बढ़ते हुए व्यापार, उद्योग, और अन्य क्षेत्रों में. इस देश में हर वर्ष कम से कम १० लाख नए उद्यमी चाहिए जो नए व्यापार, उद्योग, आदि शुरू कर सकें. प्रश्न है फिर क्यों है बेरोजगारी? बेरोजगारी तब होती है जब नौकरियां न हो. पर हमारे देश में तो नौकरियां बहुत हैं? अगर आप उद्योग समूहों को पूछेंगे तो वो कहेंगे की उनको उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिल रहे हैं. प्रश्न है की कहाँ गलती है? 

देश में कई ऐसे क्षेत्र हैं जिनमे लोग नहीं मिल रहे हैं जैसे : - 
आर्गेनिक कृषि 
टूरिज्म 
हॉस्पिटल 
होटल
ऑटो सेक्टर
टेलीकॉम 
बैंकिंग व् फाइनेंसियल सर्विसेज 
स्कुल व् कॉलेज के लिए अध्यापक (ख़ास कर गणित, अंग्रेजी, फिजिक्स, जैसे विषयों में बहुत कमी है). 
आदि 

भारत में बेरोजगारी तब होती है जब स्किल ट्रैनिंग की कमी होती है. स्किल ट्रेनिंग की कमीं के निम्न कारण है : - 

हमारी पढ़ाई समय के अनुसार नहीं है
हमारे पास पर्याप्त ट्रेनिंग इंस्टीटूशन्स नहीं है
हमारी पढाई में इंडस्ट्री की जरुरत को ध्यान में नहीं रखा गया है. 

इन सभी कमियों के लिए कोण जिम्मेदार है? 
सरकार का अत्यधिक रेगुलेशन करना ही इन सब का कारण है. उद्योग समूहों को पता है की उनक्को क्या चाहिए. ये उनको पता है की उनकी जरुरत के लिए किस तरह से कर्मचारियों को तैयार किया जाए. पर जब सरकार सब कुछ तय करने लग जाती है तो गड़बड़ हो जाती है. उद्योग समूह भी सरकार की तरफ देखते हैं. बेरोजगार भी सरकार की तरफ देखते हैं. एक ऐसी स्थिति हो जाती है जहाँ पर कोई कुछ नहीं करता है और सब एक दूसरे की तरफ देखते रहते हैं. 

सरकार को सिर्फ मार्गदर्शक की भूमिका निभानी चाहिए और एक ऐसा माहोल बनाना चाहिए जिसमे  अधिक से अधिक संस्थाएं आये और नवाचार करें ताकि नए ज़माने की तैयारी की जा सके. लेकिन सरकार के अधिकारी अपनी टांग अड़ाने से बाज नहीं आते हैं और हर जगह उन्होंने अपने नियम कानून और रेगुलेशन धूप दी हैं जिसके कारण न तो निजी क्षेत्र काम कर पा रहा है न ही सरकारी क्षेत्र. 

आजादी के इतने वर्ष बाद भी आज भी नजी क्षेत्र उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा में बिना सरकारी इजाजत के पहल नहीं कर सकता है. ऐसा क्यों है? जहाँ पर निजी क्षेत्र आगे भी आया है वो नवाचार नहीं कर सकता है क्योंकि सरकारी रोकटोक के कारण नवाचार की सम्भावना नहीं रह जाती है. सरकारी संस्थाएं बहुत सीमित है और ये सोचना भी गलत है की हर व्यक्ति को सरकार ही प्रशिक्षण देवे. सरकारी क्षेत्र की कमियां हम सब जानते हैं. लेकिन सरकारी क्षेत्र निजी क्षेत्र को मौका देगी और निजी क्षेत्र को  एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा में काम करने देगी तभी निजी क्षेत्र फल फूल सकेगा. 

एक मोटे अनुमान के अनुसार हमारे देश में २५  करोड़ लोग कृषि क्षेत्र में हैं १३ करोड़ उद्योग में और १८ करोड़ सेवा क्षेत्र में हैं. हर साल १.५ करोड़ लोग इन क्षेत्रों में और चाहिए.  ये लोग तभी सफल होंगे जब ये लोग अंतरास्ट्रीय ज्ञान का लाभ उठाएंगे और प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ेंगे. उसके लिए उनको स्टेट प्रशिक्षण और मार्गदर्शन चाहिए. 
देश में १०००० से भी कम आईटीआई (निजी क्षेत्र की संस्थाओं को मिला कर के) हैं. देश में २०००० से भी कम कॉलेज और अन्य प्रशिक्षण संस्थान हैं. यूनिवर्सिटीज की संख्या भी ५०० से कम हैं हैं. ज्यादातर संस्थान सिर्फ गिने चुने प्रशिक्षण कार्यक्रम ही चलते हैं. हर कॉलेज / यूनिवर्सिटी का भवन साल में सिर्फ २०० दिन ही काम आता है. इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के बावजूद भी  हमारे देश में न तो नवाचार हो पा रहा है न नवाचार करने दिया जा रहा है. कोई भी कॉलेज / यूनिवर्सिटी आराम से १-२ महीने के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम शुरू कर सकती है ताकि अधिक से अधिक लोगों को प्रशिक्षण मिले - पर ऐसा नहीं करने दिया जाता है. कोई भी यूनिवर्सिटी / कॉलेज उद्योगों की जरुरत के अनुसार नए कोर्स शुरू कर सकती है लेकिन ऐसा नहीं करने दिया जाता है. एक कॉलेज अगर उसी भवन में होटल मैनेजमेंट का नया कोर्स शुरू करने की सोचेगा तो उसको सरकारी संस्थांन से इजाजत लेनी पड़ेगी जो नहीं मिलेगी अतः लोगों के प्रशिक्षण का काम नहीं हो पायेगा. 

लोग सरकारी नियमों को सही मानते हैं क्योंकि उनको लगता है की इससे स्टैंडर्ड्स बने हुए हैं. जबकि सरकारी नियमों के कारण नवाचार कम हो रहा है. १ से १.५ करोड़ लोगों को हर साल प्रशिक्षण कैसे दे सकते हैं आप? क्या आप के पास वो साधन हैं? नहीं. तो फिर क्यों नहीं नवाचार करिये और करने दीजिये? 
अगर निजी क्षेत्र को शिक्षा के क्षेत्र में वैसे ही आने दिया जाता है जैसे टेलीकॉम के क्षेत्र में तो फिर निजी क्षेत्र की भागीदारी से कोई भी व्यक्ति बिना प्रशिक्षण के नहीं रहेगा जिससे बेरोजगारी की दर  बहुत कम हो जायेगी. 

सरकारी संस्थाएं अपने पाठ्यक्रम  वर्षों तक बदलती नहीं है. जैसे कम्प्यूटर इन्जिनीरिंग का विद्यार्थी आज भी vohi पढ़ रहा है जो ५ साल पहले पढ़ा जाता था जब की इस बीच में तकनीक में जबरदस्त बदलाव हो गया है. इन सब कारणों से आज उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षत्र की भागीदारी जरुरी है. सरकार को निजी क्षेत्र की मदद करनी चाहिए और विद्यार्थियों को जरुरत के अनुसार स्कालरशिप प्रदान करनी चाहिए न की उच्च शिक्षा में अपनी दखलबाजी. सरकार के द्वारा लगभब ३०० यूनिवर्सिटी व् उच्च शिक्षा संष्टां संचालित की जाती है. इन सभी संस्थाओं में जो राशि सरकार व्यय कर रही है वो राशि अगर विद्यार्थियों को स्कालरशिप के रूप में प्रदान कर दी जाती है तो विद्यार्थी अपनी पसंद से दुनिया के श्रेष्ठतम संस्थान से पढ़ाई कर के आ सकते हैं और फिर भी सरकारी बजट बच जाएगा. प्रश्न है की ऐसे प्रश्न कौन करे?