Tuesday, August 29, 2017

शिक्षा प्रशिक्षण और नौकरी : प्रगति की सीढ़ियां

शिक्षा प्रशिक्षण और नौकरी :  प्रगति की सीढ़ियां 



कम्पनियाँ कहती हैं - "सक्षम लोग नहीं मिलते"  लोग कहते हैं "रोजगार नहीं मिलता". सरकार कहती है "हमने इतने सारे रोजगार मार्गदर्शन केंद्र खोले हैं". किसकी बात में दम है? खैर इन सबको छोड़ कर उस युवा की तरफ देखते हैं जिसको आज सब तरफ अन्धकार नजर आ रहा है. उस बालक को देखो जिको नहीं पता की वो अपनी जिंदगी में क्या कर पायेगा. उसको क्या कोई ऐसी नौकरी मिल पाएगी जिसमे वो पूरी जिंगदी अपने सपनो का काम कर सके? क्या वो कोई ऐसा काम कर पायेगा जिससे उसके सपने पुरे हों और देश और समाज को उस पर फक्र हो? हर युवा बेहतरीन काम करना चाहता है लेकिन क्या करे? कैसे आगे बढे? जो थोड़ा सा समय उसको स्कुल - कॉलेज के लिए मिलता है वो हड़ताल, आवारगी आदि के चपेट में चला जाता है. ये तो समाज की जिम्मेदारी है की उसको सक्षम बनने में मदद करें. कॉलेज को नहीं पता की उसको क्या सिखाएं? पारिवारिक आर्थिक संकट के कारण हर व्यक्ति महँगी शिक्षण संस्थान में नहीं जा पाता है. 


मैं जब छोटा था तब मेरे कुछ साथी कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण पढ़ाई नहीं कर पाए - और उन्होंने अपनी मज़बूरी पर अफ़सोस जताया. उस समय में कुछ शिक्षण संसथान शाम को संचालित होते थे ताकि नौकरी पेशा करने वाले लोग भी पढ़ाई कर सकें. उस समय की जरुरत को देखते हुए वो पर्याप्त थे. वक्त गुजरता गया पर न तो लोगो की समस्याएँ बदली न संस्थाओं का काम करने का तरीका 

हाल ही में मैं रेल से यात्रा कर रहा था. मेरी मुलाकात मीधिलेश गौड़ नामक एक युवक से हुई. उसने मुझे बताया की पारिवारिक परिस्थिति के कारण उसको १६ साल की उम्र में नौकरी करनी पड़ी. वो फुलेरा का रहने वाला है लेकिन नौकरी करने के लिए बंबई गया. वहां पर वो एक डायमंड कम्पनी में कटिंग पॉलिशिंग का काम करने लगा. लेकिन उसको बड़ा अफ़सोस हुआ की उसकी पढ़ाई छूट गयी थी. उसकी बड़ी इच्छा थी की वो भी अपनी पढ़ाई पूरी करे और शानदार नौकरी हासिल करे. बहुत हिम्मत जुटा कर उसने अपनी नौकरी छोड़ दी और ऐसी नौकरी ढूंढने लगा जिसके साथ उसकी पढ़ाई हो सके. उसने जयपुर आकर के काम पैसे में काम करना शुरू किया और साथ में एक आईटीआई में भी प्रवेश ले लिया. उसने अब जो नौकरी की वहां पर उसको रविवार को भी जाना पड़ता था लेकिन उसको उसके बदले में एक दिन छूती मिल जाती थी. उसने सप्ताह में एक दिन जा कर के पढ़ाई शुरू की लेकिन उसको बड़ा अफ़सोस हुआ जब वो परीक्षा में कुछ विषयों में फ़ैल हो गया. उसने अपने मालिक से समय बदलने के लिए अनुरोध किया और फिर उसका समय दोपहर का हो गया. अब वो रोज आईटीआई जाता है वहां से ११ बजे अपने काम के लिए निकल जाता है और नौकरी करता है. आज वो पढ़ाई भी करता है और नौकरी भी करता है. उसको उम्मीद है की उसकी आईटीआई डिप्लोमा जल्दी ही पूरी हो जायेगी फिर वो भी एक अच्छी नौकरी करने लग जाएगा. 

श्री गौड़ के जैसे आज हजारों विद्यार्थियों के सामने अपने भविष्य को संवारने का एक ही विकल्प है - शिक्षा - लेकिन इस क्षेत्र में शिक्षण संस्थाओं ने क्या किया? जब मैं अपने बचपन में सांध्यकालीन शिक्षण संस्थान देख सकता था - तो आज क्यों नहीं? आज फिर से ऐसे शिक्षण संस्थान चाहिए जो नौकरी करने वाले विद्यार्थिओं को ध्यान में रख कर इस प्रकार अपना समय रखें ताकि वो विद्यार्थी अपना भविष्य संवार सके. आज तो तकनीक से सब कुछ संभव है. तो क्यों नहीं ऐसे माध्यम शुरू किये जाएँ ताकि नौकरी के बाद विद्यार्थी अपने सुविधानुसार समय पर अपने मोबाइल पर लेक्चर सुन सके या अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्याताओं से संपर्क कर के उनसे ज्ञान प्राप्त कर सके. 

शिक्षण संस्थाओं को अपनी पहली प्राथमिकता किसी सरकारी फरमान की अनुपालना नहीं बल्कि उन विद्यार्थियों को सक्षम बनाना रखनी चाहिए जो कुछ सीख कर अपनी जिंदगी को बदलना चाहते हैं. शिक्षण संस्थाओं का आदर्श वो "स्टैंडर्ड्स" नहीं है जो किसी विदेशी या देश की शिक्षण संस्थान ने बना दिया है - परन्तु उनके आदर्श तो  आस पास के शिक्षातुर विधार्थियों को प्रशिक्षित करने के लिए जी जान से काम करने वाले लोग हैं. आज भी हमारे देश में अनेक लोग अवसरों की कमी के कारण अपनी किस्मत को दोष दे कर मौन रह जाते हैं. अनेक प्रतिभावान विद्यार्थी अपनी पढ़ाई छोड़ देते हैं. अद्भुत प्रतिभा दब जाती है. कई विद्यार्थियों को उनका मनचाहा रास्ता ही नहीं मिल पाटा है. आज भी अनेक ऐसे लोग हैं जो कुछ करना चाहते हैं लेकिन कर नहीं पाते हैं. 

इग्नू जैसे अनेक खुला विश्वविद्यालओं की स्थापना सरकार ने इन्ही उद्देश्यों से की थी - लेकिन अफ़सोस ये की ज्यादातर संस्थान उस विद्यार्थी की पीड़ा को नहीं समझ पा रहे हैं जो सीखना चाहते हैं लेकिन नौकरी करना उनकी मज़बूरी है. ये शिक्षण संस्थान अपने "नियम-आधारित" व्यवस्थाओं के तहत काम करते हैं और भूल जाते हैं की उनका असली मकसद विद्यार्थियों को प्रशिक्षित कर उसकी प्रतिभा को निखारना है न की नियमों की दुहाई देना है. शिक्षण संस्थाओं को शिक्षण प्रणाली, कक्षा के समय, शिक्षण के प्रारूप में लचीलापन लाना चाहिए लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाते हैं. जो काम उनको करना है वो वे नहीं कर पा रहे हैं. 

आज कई युवा सामने आये हैं जिन्होंने अपने दम पर ऐसे एप्प बना लिए हैं जीने विद्यार्थियों को अपने आप पढ़ाई करने का मौका मिल सके. आज उन युवाओं ने देश के खुला विश्वविद्यालयों को एक चुनौती दी है. उन्होंने ये साबित कर दिया है की बिना बजट के भी वो लोग वो काम कर रहे हैं जिसको करने के लिए देश में करोड़ों रूपये का बजट खुला विश्वविद्यालयों को आवंटित किया जाता है. 

देश में अनेक ऐसे स्वय सेवी संगठन सामने आ रहे हैं जो स्वेच्छा से कॅरिअर गाइडेंस प्रोग्राम, युवा प्रशिक्षण कार्यक्रम और इस प्रकार के अन्य कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं. जो काम देश के रोजगार प्रशिक्षण संस्थाओं और रोजगार ब्यूरो को करने हैं वो काम आज हमारे देश के अनेक स्वयं सेवी संगठन कर रहे हैं. 

देश के युवाओं को प्रशिक्षित करना इस देश की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए - क्योंकि अगर आज प्रतिभावान विद्यार्थी बेरोजगार हैं तो वो देश और समाज के लिए कलंक की बात है. प्रशिक्षित और सक्षम युवा अपने देश, अपने समाज, अपने क्षेत्र के विकास के लिए सबसे बड़ी सौगात है. 

सैलानियों के लिए अद्भुत है लुप्त होती सांस्कृतिक विरासत

सैलानियों के लिए अद्भुत है लुप्त होती सांस्कृतिक विरासत  

राजस्थान नाम आते ही एक खूबसूरत इतिहास, संस्कृति, और वैभव का परिदृश्य हर व्यक्ति के आंखों के सामने होता है. जो भी राजस्थान में नहीं हैं वो एक बार तो राजस्थान आना ही चाहता है.  प्रदेश में अद्भुत सांस्कृतिक वैबव है. यहाँ के संगीत, चित्रकला, हस्तशिल्प, और सुन्दर गहनों की पूरी दुनिया कद्रदान है. प्रदेश में अद्भुत कलाकार हैं जो अपने हुनर से जादू कर डालते हैं. उनकी अद्भुत कला की पूरी दुनिया दीवानी है. इस खूबसूरत प्रदेश में सालाना १५-२० लाख विदेशी पर्यटकों का आना आम बात है. विदेशी पर्यटकों के अलावा करीब ३.५ करोड़ भारतीय भी इस प्रदेश को देखने के लिए हर साल आते हैं. 

पर्यटकों को क्या चाहिए - कुछ नया पन, कुछ अद्भुत, कुछ ऐसा अनुभव जो उनको फिर से जीवन की ताजगी से भर दे. राजस्थान में विविधता और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत संगम है. कोई यहां कुम्भलगढ़ का किला देखने आता है तो कोई यहाँ जयपुर का कठपुतली शो देखने आता है. कोई यहाँ बीकानेर और शेखावाटी की हवेलियां देखने आता है तो कोई माऊंट आबू की पहाड़ियों का आनंद लेने आता है. प्रदेश में पर्यटकों के लिए इतिहासिक इमारतों की कमी नहीं हैं. 

एक समालोचक की दृस्टि से देखें तो हम ये पाते हैं की इस प्रदेश की अद्भुत सांस्कृतिक धरोहर को उस तरह से प्रस्तुत नहीं किया गया है जिस तरह से किया जाना चाहिए. आज भी अनेक विदेशी ये ढूंढ़ते रहते हैं की बीकानेर के धोरों पर ऊंटों की सवारी करने के लिए किससे संपर्क करें? आज भी अनेक विदेशी लोगों को राजस्थान के गावों में रहने और यहाँ की गावों की संस्कृति को सीखने की चाह यहाँ खींच लाती है लेकिन उनको इस हेतु आगे किससे संपर्क करें ये नहीं पता. आज भी राजस्थान के अद्भुत परम्परागत सांस्कृतिक व्यवस्थाओं और रीति रिवाजों को बताने वाला कोई जीवंत संग्रहालय नहीं है. विदेशी पर्यटक यहाँ की संस्कृति से सीखना चाहता है और इस सांस्कृतिक विरासत को अपनी यादों में ले जाना चाहता है लेकिन इस हेतु कोई व्यवस्थित प्रयास नहीं हैं. 

पर्यटकों को राजस्थान का कमजोर प्रशासन तंत्र बहुत अखरता है. उनको अनेक जगह के लिए तो हवाई यात्रा नहीं मिलती है. कई जगह पर पर्यटक सुचना केंद्र नहीं मिलते हैं. वे यहाँ के पर्यटन स्थलों की खस्ताहाल व्यवस्था को देख के क्षुब्ध हो जाते हैं. पर्यटकों को स्वागत करने के लिए तो बड़े सारे बोर्ड मिल जाते हैं लेकिन उनकी सुविधा के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं मिलता है. वे राजस्थान के परम्परागत उत्पाद और हस्त-शिल्प खरीदना कहते हैं लेकिन उनको इस हेतु उचित बाजार नहीं मिल पाते हैं. 

राजस्थान सरकार पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं बना रहीं हैं. जरुरत है की राजस्थान में ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा दिया जाए. जरुरत है की रेगिस्तान के जहाज ऊंट को संरक्षित करने और ऊंट पालने वालों को सहारा देने के लिए प्रयास हों, जरुरत है की लोक-कलाकारों और हस्त-शिल्पकारों को मदद हो. जरुरत है की परम्परागत कलाओं को सहारा दिया जाए. जरुरत है की बड़े शहरों को छोड़ कर अन्य छोटे शहरों की अद्भुत विरासत को भी सही तरह से प्रस्तुत की जाए, जरुरत है की खस्ताहाल सड़कों और यातायात व्यवस्था को सुधारा जाए. लेकिन राजस्थान सरकार के प्रयास कुछ और हैं. सरकार का ध्यान जयपुर के पास में गोल्फ कोर्स बनाने, सांभर लेक को पर्यटन के लिए तैयार करने, जयपुर में रात्रि पर्यटन और ग्रीष्मकालीन पर्यटन को बढ़ावा देने आदि पर है. सरकार पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए जयपुर और कुछ अन्य शहरों पर ज्यादा ध्यान दे रही है. 

पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ ये भी ध्यान देना जरुरी  है की पर्यटक एक सकारात्मक याद ले कर लौटें और  पर्यटन के कारण हमारी धरोहर को कोई नुक्सान न हो. पर्यटन से अनेक लोगों को रोजगार मिलता है और अनेक लोगों को आर्थिक लाभ मिलता है. लेकिन पर्यटकों को हमें हमारी गौरव-मई संस्कृति का नजारा दिखाना है और ये प्रयास करने हैं की वे जब लोट कर जाएँ तो हमारी विरासत के बारे में तारीफ कर सकें. ज्यादातर पर्यटक राजस्थान की खस्ताहाल प्रशाशनिक व्यवस्था को देख कर एक नकारात्मक सन्देश के साथ लौटते हैं. एक पर्यटक मुझे बोलै की यहाँ की सरकार जितना खर्च कमरतोड़ स्पीड-ब्रेकर बनाने पर करती है उतने में तो कैमरे लगाए जा सकते हैं जिससे यातायात नियम तोड़ने वाले पर जुर्माना किया जा सके. एक पर्यटक राजस्थान के लोगों से बात कर के आम लोगों की समझ देख के अभिभूत हो गया लेकिन प्रशाशन की कमजोर व्यवस्था देख कर हैरान रह गया. 

कुछ लोग राजस्थान को अंधविश्वासों  और अनपढ़ लोगों का प्रदेश के रूप में स्थापित करते हैं.  उन लोगों का प्रतिकार करना जरुरी है. अन्धविश्वार पूरी दुनिया में है - कहाँ नहीं है. अगर आप राजस्थान में अंधविश्वास देख रहें हैं तो आप हैरान रह जाएंगे ये सुन कर की अमेरिका में होटल में १३ या ११३ नंबर के कमरे ही नहीं मिलेंगे. चीन में लाफिंग बुद्धा , ड्रेगन, और फेंग शुई जैसे कितने ही अंधविश्वास हैं, यूरोप में कोई सीढ़ी के नीचे से नहीं गुजरता, काली बिल्ली को वे अशुभ मानते हैं आदि आदि. पूरी दुनिया आज किसी न किसी अन्धविश्वास से जकड़ी है. अगर राजस्तान के अंधविश्वास आपको ज्यादा लग रहे हैं तो गौर करें की कई विस्वास तो पूरी तरह से वैज्ञानिक आधार पर स्थापित है तथा उनसे लोगों को फायदा मिलता है - जैसे लोग तुलसी को अपने घर के आंगन में स्थापित करते हैं और उसकी पूजा करते हैं - तो इससे उनको फायदा मिलता है आदि आदि. 

राजस्थान के अद्भुत सांस्कृतिक वैभव और सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षण करने और प्रचारित करने की जरुरत है. हम सबको इस हेतु पहल करनी पड़ेगी. जो विरासत हम को मिली - उसे अगली पीढ़ी तक ले जाना है. नयी पीढ़ी में इस के प्रति उचित सम्मान और आदर का भाव स्थापित करना है. राजस्तान सिर्फ महलों और हवेलियों का प्रदेश ही नहीं ये उन लोगों का प्रदेश है जो पानी की कीमत जानते हैं, जो रिश्तों का आदर करना जानते हैं, जो इस प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करना जानते हैं. यहाँ कला और संस्कृति जड़ों में बसी हैं और हर मेला, त्यौहार और आयोजन एक सार्थक प्रयोजन के साथ आयोजित किया जाता है. पर्यटन से भी ज्यादा जरुरी है की पर्यटक हमारी सांस्कृतिक विरासत का एक सकारात्मक पक्ष समझ कर लोटे. अगर हम ही इसे नहीं समझेंगे तो कोई विदेशी  कैसे इसे सर-आँखों पर बिठायेगा. कस्तूरी मृग की तरह अपनी अद्भुत विरासत को पहचानना आज हर राजस्थानी के लिए एक चुनौती है. 

क्या करें परमाणु हथियारों के खिलाफ ?

क्या करें  परमाणु हथियारों के खिलाफ ? 

क्या आप जानते हैं की दुनिया में गरीबी, अशिक्षा, और बेरोजगारी को मिटाने के लिए जितने साधन चाहिए  - वो मानवता को समाप्त करने के लिए काम आ रहे हैं. क्या आपने 'लिटिल बॉय' और 'फैट मैन' का नाम सुना है? क्या आपने मेनहट्टन प्रोजेक्ट का नाम सुना है? क्या अपने 'ट्रिनिटी' का नाम सुना है? क्या आपने 'एनोला गे' और 'बॉकस्कार' नामक कुख्यात लड़ाकू हवाई-जहाजों का नाम सुना है? क्या आपने हिरोशिमा और नाकासाकि का नाम सुना है जहाँ पर हजारों निर्दोष लोगों को नेस्ताबूद कर दिया गया था? 

६ अगस्त और ९ अगस्त इंसानी सभ्यता के लिए सबसे ज्यादा दुखद यादें ले कर आते हैं - वो है हिरोशिमा और नागासाकी की. इंसान ने जो भी आविष्कार किये हैं उनमे सबसे ज्यादा घातक है - परमाणु बम्ब. जर्मनी के वैज्ञानिकों ने इन खतरनाक हथियारों का विचारईजाद किया और फिर क्या था - अमेरिका ने इन हथियारों को बना डाला और फिर द्वितीय विश्व युद्ध के समय इंग्लैंड और कनाडा से मशविरा करने के बाद इनका इस्तेमाल भी कर डाला. १९३९ से १९४४ के बीच अमेरिका ने २ बिलियन डॉलर खर्च कर लोगों की मौत का सामान बनाया.  लाखों निर्दोष लोगों को नेस्तनाबूद कर दिया गया. इससे ज्यादा दुखद और घृणित कृत्य नहीं हो सकता. कोई भी व्यक्ति लाखों निर्दोष लोगों की इस प्रकार हत्या का समर्थन नहीं कर सकता.  मानवीय सभ्यता ने इससे सबक नहीं सीखा है. परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ता ही जा रहा है. आज भी कोई न कोई हैवान इनके इस्तेमाल की धमकी दे रहा है - जो भी इनका इस्तेमाल करेगा वो इंसानियत का दुश्मन होगा. हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदियों के बाद शांतिप्रिय लोगों ने परमाणु हथियारों के खिलाफ आवाज उठायी. लेकिन क्या हुआ? आज तक अमेरिका ने अकेले ५.५ ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का खर्च सिर्फ परमाणु हथियारों पर किया है. अमेरिका हर साल ६० बिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च परमाणु हथियारों पर कर रहा है. वो पूरी दुनिया को इस प्रकार विनाश की तरफ ले जा रहा है. उसके बाद रूस, चीन, फ़्रांस आदि देश हैं जो परमाणु हथियारों पर अंधाधुंध खर्च कर रहे हैं. अफ़सोस तो इस बात का है की कई गरीब देश भी इस होड़ में लग गए हैं. अमेरिका का तो ये धंधा है - वो तो अन्य देशों को हथियार बेचने के लिए ये हथकंडे अपनाता है लेकिन  उन गरीब लोगों का क्या होगा जिनकी सरकारें उनकी जरूरतों को ताक पर रख कर परमाणु हथियार बनाने के काम में लग गयी हैं. 
२४  जनवरी १९४९ को यूनाइटेड नेशंस एक प्रस्ताव पारित कर के परमाणु हथियारों का विरोध व्यक्त करता है. तो क्या हुआ? अगस्त  १९४९ में रूस, १९५२ में इंग्लैंड ने परमाणु हथियारों का परिक्षण किया और १९५२ में अमेरिका ने हइड्रोजन बम्ब का परिक्षण कर डाला. १९५५ में रुसेल और आइंस्टाइन ने पूरी दुनिया से परमाणु हथियार बंद करने के लिए आह्वान किया. १९५८ में इंग्लैंड में परमाणु हथियारों के खिलाफ आंदोलन तेज हुआ. जन आन्दोलनों के कारण अंटार्कटिका पर परमाणु बम्ब न प्रयोग करने का प्रस्ताव पारित हुआ. पर विक्सित देश तो अपने रास्ते पर चलते रहे. फ़्रांस ने १९६० में परमाणु बम्ब का परीक्षण किया तो रूस ने १९६१ में दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु बम्ब बना डाला. विकसित देशों में सत्ता में जो भी आया उसने परमाणु बम्ब बनाये. जनता बिचारि परमाणु बम्ब के खिलाफ लड़ाई लड़ती रही. जनता की मांग के कारण ५ अगस्त १९६३ को एक समझौता किया गया जिसमे परमाणु बम्ब का अंतरिक्ष में इस्तेमाल न करने की बात कही गयी. लेकिन विकसित देश उसी तरह परमाणु बम्ब पर खर्च करते रहे. १९६४ में चीन ने परमाणु बम्ब का परिक्षण  किया. 

१९६७ में लेटिन अमेरिका के देशों ने पहल करते हुए ये फैसला किया की वो परमाणु बम्ब का इस्तेमाल नहीं करेंगे. १ जुलाई १९६८ को एनपीटी लागू हुई जिसमे ये प्रावधान है की जिन देशों के पास परमाणु बम्ब नहीं है वो अब उनको हासिल नहीं करेंगे और जिनके पास हैं वो उनको काम करेंगे. २४ सितबंर १९९६ को कम्प्रेहैन्सिव नुक्लेअर टेस्ट बेन ट्रीटी नामक संधि लागू की गयी.  भारत ने इन  पर हस्ताक्षर नहीं किया है क्योंकि इस संधियों के  बाद भी चीन जैसे विकसित देशों के पास परमाणु बम्ब बने रहेंगे. 

ये सच है की नुक्लिएर हथियारों को समाप्त करना इंसानियत के लिए एक बड़ी जीत होगी. २७ अक्टूबर २०१६ को यूनाइटेड नेशंस की जनरल असेंबली की मीटिंग में १२३ देशों ने परमाणु हथियारों को समाप्त करने के लिए एक कॉनफेरेन्स बुलाने के लिए सहमति व्यक्त की, हालांकि ३८ देशों ने इसका विरोध भी किया. २७ मार्च से ७  जुलाई २०१७ तक चली मंत्रणा के बाद यूनाइटेड नेशंस ने परमाणु हथियारों को समाप्त करने का प्रस्ताव पारित किया. 

 भारत ने परमाणु बम्ब का परिक्षण मई १९७४ और १९९८ में किया. पाकिस्तान ने भी मई १९९८ में परमाणु बम्ब का परीक्षण किया. भारत, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देशों को इस होड़ में शामिल होने से बहुत नुक्सान हुआ है - ये जनता के पैसे का उन कार्यों में इस्तेमाल है जो जनता को लाभान्वित नहीं कर सकते. लेकिन कई देश हैं जहाँ पर जन आंदोलन प्रभावकारी साबित हुए और सरकारों को मजबूर हो कर परमाणु हथियारों के खिलाफ कदम उठाने पड़े. आज अफ्रीका, दक्षिण पूर्व एशिया और नूज़ीलैण्ड पूरी तरह से परमाणु हथियार मुक्त प्रदेश हो गए हैं. जहाँ जहाँ पर हथियारों की होड़ कम हो रही है वहां वहां पर विकास परिलक्षित हो रहा है. जो देश हथियारों की होड़ में उलझ रहे हैं वहां पर बर्बादी के बादल मंडरा रहे हैं. 

ये सच है की विकसित देशों के राष्ट्राध्यक्ष आम जनता की आवाज को दरकिनार कर हथियारों की होड़ फैलाने में लगे हैं. आम जनता हर जगह अमन पसंद है और ये चाहती है की परमाणु हथियारों की होड़ बंद हो. १२ जून १९८२ को दस लाख लोगों ने न्यू यॉर्क में रैली निकाली और पूरी दुनिया के लोगों का प्रतिनिधित्व किया. लेकिन सत्ता के मदहोश लोगों को आम लोगों की आवाज से कोई मतलब नहीं होता है. १९८५ में परमाणु हथियारों के विरोध में आवाज उठाने वाले "रैंबो वारियर" नामक जहाज को फ़्रांस सरकार ने तबाह कर दिया. लेकिन उसी साल परमाणु हथियारों के विरोध में आवाज उठाने वाले भौतिक शास्त्रियों को नोबेल पुरस्कार मिला. 

९ अक्टूबर २००६ को उत्तरी कोरिया ने पूरी दुनिया को परमाणु बम्ब का परिक्षण कर के चौंका दिया. उस दिन से वो दुनिया के लिए एक सिरदर्द बन गया है. लेकिन आज अधिकांश विश्व परमाणु हथियारों के खिलाफ खड़ा है. नॉर्वे ने २०१३ में एक कांफ्रेंस की जिसमे १२८ देशों ने परमाणु हथियारों के खिलाफ आवाज उठाई. फिर २०१४ में मेक्सिको और विएन्ना में इसी तरह की कांफ्रेंस हुई. एक तरफ कुछ मुट्ठी भर राष्ट्राध्यक्ष हैं जो हथियारों का जखीरा फैला रहे हैं और एक तरफ आम जनता. आइये आज ६ अगस्त के दिन हम भी पूरी दुनिया की आवाज से आवाज मिलाये और परमाणु हथियारों के खिलाफ अपनी आवाज उढ़ायें. ये आम जनता की आवाज ही थी कि १९७२ में जैविक हथियारों पर बेन लगा, १९९३ में केमिकल हथियारों पर, १९९७ में बारूदी सुरंगो पर और २००८ में क्लस्टर मुनिसन्स (एक प्रकार के खतरनाक हथियार)  पर बेन लगा. जीत तो आखिर आवाम की  ही होगी. तो यकीन रखिये आपकी आवाज पर - एक दिन हथियारों की जगह पर लोगों के विकास के लिए बजट बनेंगे. विश्वास के साथ अपनी आवाज उठाईये - परमाणु हथियारों के खिलाफ खड़े होइए - शांति, अमन और विकास के लिए अपनी आवाज को बुलंद करिये. अमन का रास्ता हमको ही बनाना है. 

आ फिर बटोरें, और लुटाएं :- वो खजाने जो हमने गवां दिए

आ फिर बटोरें, और लुटाएं :- वो खजाने जो हमने गवां दिए  


आईआईएम अहमदाबाद में विद्यार्थियों के रेस्टोरेंट का नाम है "टेनस्टाफेल" जिसका मतलब मुझे शुरू में समझ नहीं आया. वहां प्रोफ़ेसर देवधर से उसका मतलब पूछा तो उन्होंने बताया की दुनिया में इंसान को कोई भी चीज मुफ्त में नहीं लेनी चाहिए - जो मिल रहा है उसके बदले में इस ब्रह्माण्ड को वापस देने का भाव होना चाहिए. उन्होंने इस शब्द का पूरा विस्तार बताते हुए कहा की हम विद्यार्थियों को ये कहना चाहते हैं की दुनिया में कुछ भी मुफ्त नहीं है - न ही मुफ्त लेने की इच्छा होनी चाहिए - ताकि हम सब में देने का भाव हो.
 
विद्यार्थी जीवन से ही इस दुनिया को कुछ देने का भाव जगाना  बहुत महत्वपूर्ण है. समझ पकड़ने से बाद से हर व्यक्ति को इस दुनिया को ज्यादा देने की होड़ में लग जाना होता है - जो ज्यादा दे पाता है वो ही ज्यादा खुश रह पाता है और उसी को दुनिया भी ज्यादा सम्मान और इज्जत देती है. लेकिन हम इस दुनिया को तभी ज्यादा दे सकते हैं जब हम - स्वस्थ रहें - फिर से वही मूल मन्त्र - पहला सुख निरोगी काया. हमें विद्यार्थियों को फिर से ये समझाना है कि स्वास्थ्य, उम्र, और हमारी कार्यदक्षता हमारे अपने प्रयासों और हमारी जीवनशैली पर निर्भर है. विद्यार्थी जीवन से ही योग, प्राणायाम, स्वस्थ जीवन-शैली, खेल-कूद, और शारीरिक श्रम पर जोर दिया जाना चाहिए. विद्यार्थियों के लिए रोज एक कालांश तो शारीरिक - मानसिक स्वास्थ्य और जीवनशैली पर ही होना चाहिए.  पैदल चलना स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक है - अतः घर के आस - पास के काम के लिए सबको पैदल ही जाने के लिए प्रेरित करना चाहिए - इसी बहाने वो पड़ोसियों से बातचीत भी कर पाएंगे और इसी बहाने वो स्वस्थ भी रह पाएंगे. तथाकथित आधुनिक जीवनशैली के दुष्परिणाम नजर आ रहे हैं - बचपन से ही मोटापा बढ़ रहा है और कार्य-करने की क्षमता कम हो रही है. बीमारियां लगातार बढ़ रही है और रोग-प्रतिरोधी क्षमता कम हो रही है. सौभाग्य से आज भी हमारे देश की आधी से ज्यादा जनसँख्या गावों में रहती है जो अभी भी हमारी परम्पराओं को जी रही है अतः आज भी स्वस्थ और तंदुरुस्त है. 

मैं लोगों को ६० साल की उम्र में और ज्यादा जोश और उत्साह से नयी पारी शुरू करते देखता हूँ तो  हैरान रह जाता हूँ. उनका तर्क होता है ६० साल की उम्र सरकार ने रेटीररेमेंट की उम्र घोषित की हुई है लेकिन इस का मतलब ये नहीं है की ६० साल की उम्र में हम सारे काम काज छोड़ कर आराम करना शुरू  कर देवें . सरकारी नीति का उद्देश्य युवाओं को रोजगार का मौका देना है और ६० साल के लोगों को समाज के कल्याण के लिए कार्यमुक्त करना है ताकि वो लोग अपने अनुभवों का लाभ लोगों को दे सकें. ६० साल की उम्र में एक व्यक्ति परिपक्व और अनुभवी बन जाता है - यानी इस उम्र में उस व्यक्ति को आम लोगों की भलाई के लिए कोई न कोई कार्य तो जरूर करना ही चाहिए. उसके जीवन भर के अनुभव का फायदा युवाओं को मिलना चाहिए. हम ये  कह सकते हैं की ६० साल तक का जीवन परिवार और पैसे के लिए जिया - लेकिन उसके बाद का जीवन पूरी तरह से समाज और देश के लिए न्योछावर. 

मैंने ६० साल के बाद जीवन की शानदार पारियों की शुरुआत करने वाले अनेक लोग देखे हैं. उनको देख कर ये लगता है की ६० साल उनके लिए एक नया जन्म ले कर आया - यानी कर्तव्य और कल्याण के लिए एक नया तोहफा. ये लोग जितने समय तक सक्रीय रहते हैं उतने ही ज्यादा स्वस्थ और प्रसन्न रहते हैं. 

व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती उसकी सोच और उसकी जीवनशैली पर निर्भर है. कुछ उदाहरणों से अपनी बात स्पस्ट करता हूँ.  पश्चिमी हिमालय में गिलगिट क्षेत्र में रहने वाले हुंजा जनजाति के लोगों की बात करते हैं . ये वो लोग हैं जो आम तौर पर १४५ साल की उम्र जीते हैं. इस क्षेत्र के लोगों को कैंसर, हार्ट अटैक जैसी बीमारियां नहीं होती है. यहाँ जीवन का मध्यान ही १०० वर्ष की उम्र में होता है. क्या कारण है यहाँ के लोगों की ज्यादा उम्र का राज? 

दक्षिणी अमेरिका में बोलीविया के अमेज़न क्षेत्र में रहने वाले टसिमने जनजाति के लोगों की बात करते हैं. ये भी १००-१२० से ज्यादा ही जीते हैं. इन लोगों को भी कैंसर व् हार्ट अटैक जैसी बीमारियां नहीं होती हैं. वैज्ञानिकों ने पाया की  इन लोगों की धमनियां दुनिया की सबसे बेहतरीन धमनियां हैं - जिनमे हार्ट अटैक होने की सम्भावना नहीं के बराबर है.  आखिर क्या  है इन लोगों के स्वास्थ्य का राज? 

उपरोक्त वर्णित दोनों जनजातियों में कुछ बाते समान हैं : -   ये लोग भोजन में ज्यादातर फल, कंदमूल और अनाज लेते  हैं. ये लोग दिन में दो बार ही भोजन करते हैं. ये लोग कम खाते हैं. ये लोग दिन में ५-६ घंटे पैदल चलते हैं. ये लोग वर्तमान में जीते हैं और खुश रहते हैं. और हाँ - इनमे आपको मोटापा नहीं नजर आएगा. 

हुंजा जनजाति के  लोगों का मुख्य भोजन है आड़ू, बादाम, आलूबुखारे, और अखरोट. ये लोग बहुत कम  भोजन करते हैं लेकिन इस भोजन से इनको अपने काम करने के लिए जरुरी ऊर्जा और ताकत मिल जाती है. ये लोग पीढ़ियों से आसन और प्राणायाम करते आये हैं और दिन में कई बार आसन  करते हैं. ये लोग अक्सर उपवास करते हैं और लम्बे समय तक उपवास पर रहते हैं. 

जो लोग ये सोचते हैं की जीवन, स्वास्थ्य, और हमारी तंदुरुस्ती सिर्फ भाग्य की देन है वो गलत हैं.  जहाँ जहाँ पर लोग जैसे जीते हैं वैसे ही उनका स्वास्थ्य और भविष्य बन जाता है. यानी अपने स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती के निर्माता हम स्वयं हैं. अपने जीवन के भाग्य निर्माता हम स्वयं हैं. अपने जीवन की उम्र को तय करने वाले हम स्वयं हैं. 

हमें विरासत में अद्भुत परम्पराएं मिली - जो हमें स्वस्थ जीवन और स्वस्थ सोच प्रदान करती थी. पश्चिमीकरण और शहरीकरण के दौर में हम लोगों ने स्वस्थ जीवन के अपने अद्भुत सूत्र गवां  दिए. आज हर सातवा व्यक्ति किसी न किसी बीमारी से ग्रसित है. हार्ट अटैक, ब्लड प्रेशर, शुगर और कैंसर की बीमारियां घर-घर फ़ैल रही है. इन बिमारियों के इलाज के लिए तो हम सब लोग चिंतित हैं और उस के लिए स्वास्थ्य - बीमा   भी करवा लेते हैं लेकिन इन बिमारियों को रोकने के लिए हम नहीं सोचते हैं. 

ईश्वर ने हमें ये क्षमता दी है की हम अपनी जरूरत से कई गुना ज्यादा भोजन कर सकते हैं और अपनी भूख को भी बर्दाश्त कर सकते हैं. ये ईश्वर की दी हुई वो चाबी है जिससे हम सारी समस्याओं के तालों को खोल सकते हैं. यानी अगर हम फिर से अपनी परम्पराओं को अपना लें तो हमें भी हुंजा जनजाति के लोगों की तरह स्वस्थ और आनंददायक जीवन मिल सकता है. हमें क्या करना है? - वही जो हमारे पूर्वज किया करते थे लेकिन हमने छोड़ दिया. जैसे : - 

ज्यादा भोजन नहीं करना है - उतना ही करना है जितना हमारे लिए जरुरी है
बार बार भोजन नहीं करना है - दिन में २-४ बार ही भोजन करना है. 
अधिक से अधिक फलाहार, अनाज और ताजा वनस्पतियों का सेवन करना है
अधिक से अधिक पैदल चलने पर बल देना है. 
अधिक से अधिक समय शारीरिक  रूप से सक्रिय रहना है. 

मन हल्का - कठोती में गंगा - हर कोई रहे चंगा

मन हल्का - कठोती में गंगा -  हर कोई  रहे चंगा 

क्या कभी सोचा है की बच्चे इतने प्यारे, इतने जोशीले, और इतने जीवंत क्यों नजर आते हैं - क्योंकि उनकी स्मृति में किसी के प्रति नफरत या नाराजगी के लिए जगह नहीं होती है. अगर वे गुस्सा होते हैं तो ये क्षणिक होता है - वे शीघ्र भूल जाते हैं और फिर से उनलोगों को गले लगा लेते हैं जिनसे वे गुस्सा थे. उनकी ये विशेषता ही उनको हर पल प्रफुल्लित रह कर जीने का मौका देती है और हम तो उनके इस बाल रूप में ही ईश्वर का दर्शन कर लेते हैं. जैसे जैसे उम्र बढ़ती जाती है हम जीने की कला भूलने लग जाते हैं और अनावश्यक स्मृतियों को अपने मन-मस्तिष्क में जगह देना शुरू कर देते हैं. जैसे जैसे अनुभव बढ़ता जाता है वैसे वैसे दिमाग में द्वेष, घृणा और नफरत का भार बढ़ता जाता है और ये भार हमारी सारी जिजीविषा को समाप्त कर के हमें जीते जी हरा देता है. 

जितना हम दिमाग में भार ले कर जीते हैं - उतने ही हम कम जी पाते हैं - जितना भार कम करते जाते हैं - उतने ही ज्यादा जी पाते हैं - तो क्यों न हम ज्यादा जियें. इस दुनिया में कौन ऐसा है जिसको धोखा, फरेब, झूठ, और मक्कारी का सामना नहीं करना पड़ता? इस दुनिया मैं कौन ऐसा है जिसको अपने ही सामने अपने सपनों को टूटते हुए नहीं देखना पड़ता? कभी न कभी  तो हम सब लोगों को इस दुनिया के नकारात्मक पहलु का सामना करना ही पड़ता है. यही तो इस दुनिया का सच है. फिर भी इस दुनिया में सबको माफ़ करना ही तो सबसे बड़ी जीने की कला है. इसा मसीह ने तो उनको भी माफ़ कर दिया जिन्होंने उनकी जिंदगी ले ली. इससे बड़ा माफ़ क्या होगा. दुनिया में जीवन को जीना सबसे मुश्किल कला है और जो इस कला को सीख लेता है वो हर पल खुश रह सकता है हर पाल का आनंद ले सकता है. 

हर इंसान से भूल होती है - उन भूलों को याद रखने से जीवन एक भार बन जाता है और जीवन जीने का आनंद ही खत्म हो जाता है. उन भूलों को भूल मानते हुए  भुला देना ही जीवन जीने की कला है. अतः सबसे पहले तो हमें अपने आप को माफ़ करना आना चाहिए. अपने आप को तभी प्यार कर पाएंगे जब हम अपने आप को खुल कर माफ़ कर पाएंगे. कई व्यक्ति पछतावे और अफ़सोस को अपने दिमाग  में जगह दे देते हैं और फिर पूरी जिंदगी मन ही मन उसको याद कर के अपने आपको कोसते रहते हैं. एक गलती हम से अनेक गलती करवाती जाती है. गौतम बुद्ध ने हम से कहा है की वर्तमान में जीवो. जो भूतकाल आप याद कर रहे हो वो बीत गया - और उस वक्त का आप भी बदल गया. आज आप हैं और आज का वक्त - आज पूरी ताकत से अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करो और अपने आपको आह्लादित करो. 

जितना हम अपने आपको या दूसरों को कोसते रहते हैं उतने ही दुखी होते जाते हैं और जीवन के आनद से वंचित होते जाते हैं. ये स्थिति  अगर लगातार लम्बे समय तक जारी रहे तो हमें अनेक बीमारियां घेर लेती है और फिर हमारे लिए जीना दुश्वार हो जाता है. आज विज्ञान भी मानने लगा है की हमारी मानसिक दशा हमारी बीमारियों के लिए जिम्मेदार है और स्वस्थ होने के लिए सबसे ज्यादा जरुरी है की हम स्वस्थ विचार लाएं - स्वस्थ चिंतन रखें और सदैव खुश रहने का प्रयास करें. 


दुनिया की जानी मानी  अस्पताल जॉन हॉपकिंस अस्पताल (मेरीलैंड अमेरिका) के डॉक्टर कारेन स्वार्ट्ज़ मरीजों को स्वस्थ रहने के लिए सबसे ज्यादा "फॉरगिवनेस्स हीलिंग" अपनाने के लिए कहते हैं. फॉरगिवनेस्स यानी माफ़ करना. डॉक्टर स्वार्ट्ज़ कहते हैं की जब लोग दूसरे लोगों को और स्वयं अपने आप को माफ़ करना सीख जाते हैं तो जीवन को हल्का बना लेते हैं और तनाव और कुंठा से मुक्त हो जाते हैं और इस प्रकार वे स्वस्थ जीवन की शुरुआत करते हैं. अपने इन प्रयोगों से डॉक्टर स्वार्ट्ज़ ने अनेकों मरीजों को स्वस्थ किया है. उनकी तरह आज पूरी दुनिया में इसे लोगों को स्वस्थ रखने के लिए अपनाया जाता है.  जिसे आज का विज्ञान एक जरुरी दवाई के रूप में इस्तेमाल कर रहा है उस व्यवस्था को एक  परम्परा के रूप में भारत में अनंत काल से मनाया जा रहा है. भारत में हर धर्म - हर व्यवस्था में लोगों को त्योंहारों के मोके पर एक दूसरे को गले लगाने की व्यवस्था है - और असल में वो ही असली त्योंहार है - जिसका उद्देश्य है गीले शिकवे दूर कर अपनापन फैलाना -एक दूसरे को क्षमा करना और अपने आपको भी क्षमा कर के हल्का होना - और इस प्रकार अपने मन को सभी वैचारिक बाधावों से मुक्त करना. 

जैन धर्म मानने वाले लोगों के लिए क्षमा  सबसे बड़ा पर्व है. पर्युषण महापर्व के आखिरी दिन क्षमावाणी या क्षमापना का दिन होता है जिस दिन हर व्यक्ति से क्षमा मांगी जाती है. 

शताब्दियों से जैन लोग इस दिन निम्न वाक्यों का उच्चारण करते आये हैं - 

खामेमि  सव्वे  जीवा  यानी मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ. 
सव्वे  जीवा  खमंतु  में  यानी मैं सभी जीवों से क्षमा माँगता हूँ. 
मिति में  सव्वा  भूसु  यानी मैं सभी प्राणियों से मित्रवत हूँ. 
विराम  मज्झम  न  केन  वि  यानी मेरा किसी प्राणी से बैर नहीं है. 
मिच्छामि  दुक्कडम यानी मेरे सारे क्लेश भाव समाप्त हो जाएँ. 
इस प्रकार सभी जैन धर्मावलम्बी प्राणी मात्र से क्षमा मांगते हैं और क्षमा प्रदान करते हैं. वे इस दिन बार बार ये वाक्य दोहराते हैं : - 
 खम्मामि सव्व  जीवेषु सव्वे जीवा खमन्तु में, मित्ति में सव्व भू ए सू वैरम् मज्झणम् केण इ यानी   सब जीवों को मै क्षमा करता हूं, सब जीव मुझे क्षमा करे सब जीवो से मेरा मैत्री भाव रहे, किसी से वैर-भाव नही रहे

जहाँ पश्चिमी विज्ञान में क्षमा मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक जरुरी तत्व है - वहां भारतीय दर्शन में क्षमा मोक्ष की तरफ अग्रसर होने के लिए जरुरी पहला कदम है. जहाँ पश्चिमी दर्शन में क्षमा मन को हल्का करने के लिए जरुरी माना जाता है वहां भारतीय दर्शन में हमारे पुद्गलों की निर्जरा के लिए इसे जरुरी माना गया है.

क्षमा की व्यापकता : 
यहाँ क्षमा बहुत ही व्यापक है. हम अपने आप से क्षमा मांगते हैं तो इस दुनिया में हर प्राणी से क्षमा मांगते हैं. क्षमा की इस प्रक्रिया से हम स्वयं भी प्रतिक्रिया से मुक्त होते हैं और वैर - वैमनस्य के भाव से अपने आपको मुक्त करने का प्रयास करते हैं. 

व्यक्ति जैसे जैसे क्षमा को अपने जीवन में उतारता जाता है वैसे वैसे वो जीवन को एक निरपेक्ष भाव से जीने लग जाता है और इस प्रकार क्षमा जीवन को एक नया नजरिया प्रदान करता है. क्षमा एक जीवन दर्शन है जो जीवन को उसके आखिरी मंजिल यानी मोक्ष की तरफ ले जाने की शुरुआत है. 

जैन धर्म में अनेक कहानियां है जो इसके सिद्धांतों को व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करती है. ये कहानियां क्षमा को जीवन में कैसे अपनाना इस बात का व्यवहारिक पक्ष प्रस्तुत करती है. क्षमा वो शक्ति है जो व्यक्ति का स्वयं का कल्याण तो करती है ही परन्तु दूसरे व्यक्तियों को भी कल्याण के रास्ते पर ले जाती है.  ये कहानियां निश्चित रूप से जीवन का आदर्श स्वरुप प्रस्तुत करती है. २४वे तीर्थंकर  श्री महावीर स्वामी को चंडकौशिक नामक जहरीले कोबरा  सांप ने काटने की कोशिश की. क्षमा भाव से महावीर स्वयं भी वीतराग रहे और उस सांप को भी वीतराग बना दिया. 

क्षमापना महापर्व को मनाना एक जीवन दर्शन को स्वीकार करने जैसा है जिसमे इंसान प्राणी मात्र से अपने कर्मों के लिए क्षमा मांगता है और अपने आपको भी क्षमा प्रदान करके मुक्त हो जाता है. 

Saturday, June 4, 2016

मेरे शहर को गाव बना रहने दो ( पांच शताब्दियों का अपनापन यानि : बीकानेर)


किसी भी शहर का स्थापना दिवस उस शहर के लोगों के लिए बहुत महत्व्पूर्ण होता है और उस शहर के लोग उसको बड़े दिल से मानते हैं. बीकानेर की स्थापना दिवस पर मैं तो ये ही कामना करता हूँ की इस शहर की अद्भुत संस्कृति और इस शहर का अपनापन बना रहे. कुछ लोग अफ़सोस कर रहे हैं की बीकानेर को स्मार्ट सिटी का दर्जा नहीं मिला. मैं तो बहुत खुश हूँ मेरे इस शहर मैं और मैं तो नहीं चाहता की इस शहर की आबोहवा को कोई नजर लगे और कोई इस शहर को मेट्रो शहर के जैसा बनने की कोशिश करें. मुझे इस शहर के तथाकथित पिछड़ेपन में इसका अद्भुत सौंदर्य और अद्भुत वात्सल्य नजर आता है. 

बीकानेर एक शाहर नहीं एक कुनबा, एक गाव, या एक बड़ा परिवार है. ये एक अद्भुत संस्कृति है जहाँ पर लोगों में अपनापन, आपसी भाईचारा, और सहजता है. इस शहर के समकक्ष शहर अपने आप को स्मार्ट सिटी घोषित करवा क्र गर्व महसूस कर सकते हैं लेकिन बीकानेर जीतन संतोष और आनंद कहीं और कहाँ है  अतः, जिसको आनंद और उल्लास चाहिए उसको तो बीकानेर ही आना पड़ेगा. 

आज जब पूरा शहर अपने स्थापना दिवस को मनाने की तयारी कर रहा है तो जरूरत है की इस शहर को अद्भुत बनाने   वाली इसकी संस्कृति को बचाने और पल्लवित करने की कोशिश की जाए 

कहाँ मिलेंगे पाटे
लोगों में आपसी तालमेल बनाये रखने के लिए पाटे की संस्कृति अद्भुत  और अद्वितीय  है - इसको  आगे  कैसे  फैलाएं ? 

कहाँ मिलेंगे मोहल्ला पुस्तकालय 
बीकानेर में हर मोहल्ले में पुस्तकालय होते थे. उस परम्परा को अजित फाउंडेशन ने चालु रख और मोहल्ला पुस्तकालय की परम्परा  को जीवंत  रखा . इस अभिनव प्रयास को साधुवाद.  साहित्य और संस्कृति का आपस में गाढ़ा   रिश्ता होता है. पुस्तकालय ही हमारे   शहर को बचा  पाएंगे   

कहाँ मिलती है ऐसी मिठास 
"भइला" "भतीज" "काकोसा" शब्द तो ऐसे जो दिल को छू जाए. शब्दावली ऐसी जहाँ पर हर इंसान को अपनेपन से सम्बोधन. यही तो मेरे शहर को अद्भुत बनता है. 

शहरी सभ्यता खतरे में 
भारत   ही नहीं पूरी दुनिया में शहरी सभ्यता खतरे में है. गाव और ढाणी ही जीवन को सुरक्षित रख पा  रही है. शहरी सभ्यता को जंग लग रही है. शहर के शहर तबाह  हो  रहे  हैं. अबकी   बार  चुनौती इटरनेट से आ रही है. अश्लील फ़िल्में और परिवारों को तबाह  करने की संस्कृति इंटरनेट  से बरस  रही है. इस aandhi में परिवार के परिवार उजड़ रहे हैं. तथाकथित विकसित देशों में तलाक, टूटते  परिवार, और चरित्रहीन समाज  की विभीषिका  शहरों  को नेस्तनाबूद  कर रही है. हमारे शहर को अभी  तक  अगर  किसी  ने बचा रखा है तो वो हैं शहर के प्रबुद्ध चिंतक लोग  (जैसे संवित सोमगिरि जी ) जिन्होंने  शहर की आध्यात्मिकता  को आज भी बचा कर रखा है. उस बची  खुची  आध्यात्मिकता  के कारण ही ये शहर अाज भी बीकानेर की अद्भुत संस्कृति का रखवाला  बना  हुआ  है. 

जिंदगी के मकसद से दूर भागती मेट्रो शहरों की संस्कृति 
देश में आर्थिक विकास के साथ ही मेट्रो शहरों का भौतिक विकास होता जा रहा है. बीकानेर जैसे शहरों के लिए तो बजट नहीं होता है पर मेट्रो शहरों के विकास को देख क्र कोई भी चकित हो जाता है और हम जैसे लोग उन शहरों की चकाचौंध से एक बार तो आकर्षित हो ही जाते हैं. शहरों की खूबसूरती और ढांचागत विकास से शहरों की प्रमाणिकता का कोई सम्बन्ध नहीं है. उस शहर का क्या जहाँ पर जा क्र मैं जिंदगी के मकसद को भूल जाऊं. उस शहर का क्या जहाँ पर जा कर लोग इंसानियत ही भूल जाएँ. उस शहर का क्या जयन पर जा कर लोगों में आपसी भाईचारा और अपनापन ही न रहे. भौतिकता का चरम अगर हमें अपने मकसद से दूर करता है तो उस भौतिकता का क्या मकसद? मेरे शहर में आज भी आध्यात्मिकता जिन्दा है. मेरे शहर में आज भी लोगों को जिंदगी का मकसद पता है. मेरे शहर में आज भी लोगों इंसान को भौतिकता से ज्यादा तबज्जो देते हैं. तो मेरे इस शहर की इस खासियत को मैं दिल से सलाम करता हूँ. 

आइए शहर को अपने मौलिक स्वरूम में बनाये रखें. आइए मेरे शहर को गाव ही बना रहने दें. आइए देश के आलाकमान को कहदें की आपने हमारे शहर को स्मार्ट सिटी के लिए उचित नहीं मान कोई बात नहीं  लेकिन जब भी आपको अपनेपन की मिसाल देने की लिए किसी शहर की जरुरत पड़े तो वो बीकानेर ही होगा. आइये अपने इस शहर को इसकी अद्भुत पहचान के लिए नमन करें और इसकी इस खुशबु को पूरी दुनिया में फैलाने का प्रयास करें. 

टूटते परिवार - शिक्षा व् प्रशिक्षण से - जुड़ते परिवार

१५ मई को अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस के रूप में मनाया जाता है. परिवार व्यवस्था के बारे में बात करने के लिए ये दिवस एक सुनहरा मौका है.  परिवार व्यवस्था हमारी समाज व्यवस्था का महत्व्पूर्ण आधार स्तम्भ है. परिवार का मतलब है की लोग किस प्रकार एक दूसरे के लिए त्याग, समर्पण, प्रेम और अद्भाव रखते हैं. ये हमारे समाज के अस्तित्व के लिए जरुरी है. पर क्या हम परिवार व्यवस्था को मजबूत बनने के लिए कुछ कर रह हैं. 
जिस तेजी के साथ मीडिया और प्रचार तंत्र "लिवइन रिलेशनशिप" के पाठ पढ़ा रहा है और जिस तेजी से परिवार टूट रहे हैं - हम जल्द ही एक समाज विहीन भीड़ का निर्माण करने वाले हैं जहाँ पर व्यक्ति के विकास या उसके संरक्षण के लिए कोई जिम्मेदार नहीं होगा. परिवार एक सस्था के रूप में टूट रहा है क्योंकि उसको तोड़ने की साजिश हो रही है. 
परिवार नामक संस्था हमारे विकास, संरक्षण, सामजिक सुरक्षा प्रेम और अपनापन की सबसे मजबूत नींव रही है. परिवार में बच्चों को संस्कार, बड़ो को सम्मान, और युवाओं को प्रेम और अपनापन मिल जाता है. परिवार वो संस्था है जहाँ पर हर व्यक्ति खुश रह सकता है और जहाँ पर हर व्यक्ति के विकास के लिए कोई न कोई उपाय है. परिवार लोगों को जिम्मेदारी भी देता है तो उनको अनुशाशन में भी बांधता है. परिवार सामाजिक सुरक्षा का सबसे सशक्त माध्यम है. परिवार विकलांग, असहाय, मंदबुद्धि, और लाचार लोगों को भी प्रश्रय देता है तो सक्षम लोगों को और अधिक सक्षम बनाने में मदद करता है. 

विद्वानों ने पाया है की एक स्वस्थ परिवार मिलने से व्यक्ति का व्यक्तित्व सकारात्मक हो जाता है लेकिन टूटते परिवारों और परिवार में द्वेष के होने से व्यक्ति हिंसक हो जाता है. जहाँ जहाँ पर परिवार ज्यादा टूट रहे हैं वहां पर अपराध बढ़ रहे हैं. 
परिवार के विकास और पारिवारिक जीवन को सीखने के लिए कुछ जरुरी शर्तें हैं जैसे : - 
परिवार के विकास के लिए समर्पण का भाव होना जरुरी है. 
परिवार के प्रति निष्ठां, आदर, विश्वास, व् सम्मान की भावना का होना जरुरी है. 
परिवार में मिल- बाँट कर संसाधनों का उपयोग करने की प्रवृति होना जरुरी है. 
परिवार में सभी लोगों के साथ समय निकालना और सबके साथ सुख दुःख में हाथ बंटाना जरुरी है. 
उपर्युक्त शर्तें पूरी होगी तभी परिवार सफल होगा और व्यक्ति परिवार को और परिवार व्यक्ति को अपना पाएगा. लेकिन ये अपने आप नहीं हो सकता है. पारिवारिक जीवन शैली को सीखना पड़ता है. पारिवारिक व्यवस्था को सिखाने के लिए पहले परिवार वयवस्था में प्रशिक्षण की व्यवस्था थी. लेकिन आधुनिक समय में माँ बाप बच्चे को तुरंत हॉस्टल में दाल देते हैं और वो सार प्रशिक्षण स्कुल व् कॉलेज से ही अपेक्षा करते हैं. न तो स्कुल और न कॉलेज में पारिवारिक व्यवस्था का प्रशिक्षण दिया जाता है. हॉस्टल में जिस प्रकार की स्वतंत्र जीवनशैली फ़ैल रही है वो परिवार व्यवस्था के लिए घातक है. आजादी के नाम पर जिस प्रकार की जीवनशैली युवा वर्ग अपना रहा है वो हमारे लिए खतरा है. हमारे सामने एक खतरनाक भविष्य है. अगर परिवार और समाज को बचाना है तो पारिवारिक जीवन शैली का प्रशिक्षण शुरू करना पड़ेगा.

एक शोध में विद्यार्थियों से उनकी  ५ प्राथमिकताओं को लिखने के लिए कहा गया. ३०० विद्यार्थियों पर हुए उस शोध में परिवार को किसी भी विद्यार्थी ने अपनी प्राथमिकता में नहीं लिखा. कक्षा प्लेग्रुप से  स्नातकोत्तर तक की लगभग १८-१९ साल की पढ़ाई में एक कोर्र्स भी परिवार व्यवस्था के सफल सञ्चालन के प्रशिक्षण के लिए नहीं है. एक तरफ देश में ऐसे लोग उभर कर सामने आ रहे हैं जो सेक्स एजुकेशन, लिव इन रिलेशनशिप,  फ्री इंटरनेट आदि की वकालत कर रहे हैं लेकिन परिवार व्यवस्था के प्रशिक्षण के लिए शिक्षा पर कोई भी नहीं बोल रहा है. मीडिया भी हॉबी क्लासेज, कुकिंग,  करियर, व् स्टार्टअप पर इतनी चर्चा कर सकता है लेकिन परिवार व्यवथा पर तो ये भी मौन है. क्या वाकई हम परिवार व्यवस्था के महत्त्व को समझ पा रहे हैं या नहीं? 

हमारे देश की संस्कृति की आधारशिला हमारी अद्भुत परिवार व्यवस्था को बचाने के लिए आप हम सबको प्रयास शुरू करना पड़ेगा और हर स्कुल और कॉलेज को परिवार व्यवस्था के विषय पर प्रशिक्षण को शुरू करना पड़ेगा. बचपन से ही परिवार व्यवस्था का प्राशिसं जरुरी  है. इससे हमारे देश, समाज, और संस्कृति को बचने में मदद मिलेगी. मैं मीडिया से भी अनुरोध करूँगा की हमारे परिवार व्यवस्था को बचने में मदद करें और "लिव इन रिलेशनशिप" जैसे सामाजिक जहर को न फैलाए. व्यक्तिगत आजादी के नामं पर विकृतियां समाज में फ़ैल रही हैं जो हमारे समाज को खत्म कर सकती है. आइये समय रहते हम कुछ ठोस प्रयास शुरू करें.